The Blessed Sujit

Vijay Bhavsar
Jul 28, 2017 · 1 min read

याद हैं मुझे वह दिन, ज्यों का त्यों।
रिश्ते-नाते, यार-दोस्ती, वह सब छोड़ चला गया,
ना जाने क्यों?
उस भयावह मंजर को स्मरण कर, यकायक आँखे हो जाती है नम,
अनहोनी का पूर्वाभास होते हुए भी, कमबख्त कुछ कर न सके हम।
ना जाने कितनो के लिए, वो मसीहा बन चुका था,
बाहर से जितना कठोर, भीतर से उतना ही विनम्र था।
सिखाया था उसने, सभी मित्रों को, “अपने उसूलों पर जीना”,
क्षणभर में ही साथ छोड़ चला गया, वह बागी — कमीना।
असंख्य मतभेदों के बावजूद , जब कभी भी वह मिलता-जुलता,
भूलाकर बिती बातों को, उसका चेहरा अद्भुत स्मित से खिलता।
उसके ना होने पर भी, वह हमें याद आता है,
वक्त-बे-वक्त, हमारी यादों में मुस्कुराता हैं।
चाहकर भी नैनों से अश्क ,ओझल ना हो पाता है,
जब कोई आपका अपना, "हैं" से "था" हो जाता है।
माना कि , अब इन बातों का कोई मोल नहीं,
क्योंकि ये श्रद्धांजलि दिल से हैं, इसमें कोई झोल नहीं।
यूं ही स्वयं से सवाल, करता रहता हूं बारंबार,
सांसारिक मोह-जाल को त्याग, परमधाम चला गया वह क्यों?
याद हैं मुझे वह दिन,
ज्यों का त्यों, ज्यों का त्यों।

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