यदि आपने लखनऊ का नगर- भ्रमण किया है तो भूल-भुलैया अवश्य देखा होगा और गाइड से लखनवी अंदाज़ में यह अवश्य सुना होगा- "जिसको न दे मौला उसको दे आसफुद्दौला"
यह सच है कि आसफी इमामबाड़ा (भूल भुलैया) और रूमी दरवाज़ा, लखनऊ के हस्ताक्षर हैं जिसे नवाब आसफुद्दौला ने अकाल में लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए बनवाया था.
इसी उदारमना नवाब की एक माँ थी जिसका नाम था उन्मातुज़ोहरा बानो, जो बहू बेगम के नाम से जानी जाती थी. कहते हैं कि अपनी माँ के प्रभाव से मुक्त होने के लिए ही नवाब ने १७७५ में अवध की राजधानी फैज़ाबाद से हटा कर लखनऊ किया था और अपनी माँ को वहीँ छोड़ दिया. कुछ दिनों तक तो नवाब अपनी माँ का व्यय वहन करता रहा परन्तु कालांतर में उसने धन भेजना बंद कर दिया. स्थिति यहाँ तक बिगड़ गयी कि बेगम के कर्मचारियों ने वेतन न मिलने के कारण उपद्रव करना शुरू कर दिया. फैज़ाबाद में नियुक्त अंग्रेज रेज़िडेंट, जो स्थानीय शासकों के आतंरिक मामलों में घुसने का कोई बहाना ढूंढते थे, के हस्तक्षेप से ही इस विवाद का हल निकला. ढेर सारे स्मारकों के निर्माता नवाब की माँ के १८१६ में निधन के बाद उनका मकबरा उनके उनके विश्वस्त सेवक दराब अली खान ने बनवाना शुरू किया और उनके बाद बेगम की दत्तक पुत्री के पुत्र मिर्ज़ा हैदर ने पूरा किया जिसे अब 'बहू बेगम का मकबरा' के नाम से जाना जाता है.
हर युग के अति महत्वाकांक्षी पुत्रों की जननी की एक ही कहानी है - "आँचल में है दूध और आखों में पानी"
