
मौसम — mousam (season)
Aug 25, 2017 · 1 min read
आज मौसम ने लाठी उठाई थी,
दौड़ दौड़ के पगडंडी बनाई थी,
रास्ते का कोई पता नहीं था,
लाठी के डर से वो बनता चला था,
पर जो कुदरत की करामत है,
शायद इसे ही कहते है।
उसी दौड़ के बीच एक ख़ूबसूरत फूल मिला,
खूबसूरती की मिशाल या खूशबू का जुनून।
लाठी का डर था जो , इसे फूल ने मिटाया,
ख़ुशियों की दावत जो इसने खिलाया,
दौड़ तो फिर भी है एक सवाल के साथ
कब तक रहेगा इस फूल का सुहाना साथ।
फिर ये बदलता मौसम आएगा
और नयी छड़ी उठाएगा
क्या होगा कोई चमत्कार कुदरत का,
फिर मिलेगा क्या वो स्वाद खुशियों का,
आज मौसम ने लाठी उठाई थी ।
- विरल
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