ऐसा समझो कि भोग यानी शूद्र।

तृष्णा यानी वैश्य।

संकल्प यानी क्षत्रिय।

और जब संकल्प पूरा हो जाए,

तभी समर्पण की संभावना है।

तब समर्पण यानी ब्राह्मण।

समर्पण यानी ब्रह्म।

जो मिटा, उसने ब्रह्म को जाना।

ये चारों तुम्हारे भीतर हैं।

देह तुम्हारे भीतर है।

मन तुम्हारे भीतर है।

आत्मा तुम्हारे भीतर।

परमात्मा तुम्हारे भीतर।

अगर तुमने अपने ध्यान को

देह पर लगा दिया,

तो तुम शूद्र हो गए।

तुमने अपने ध्यान को

वासना-तृष्णा में लगा दिया,

लोभ में लगा दिया,

तो तुम वैश्य हो जाओगे।

तुमने अगर अपने ध्यान को

संकल्प पर लगा दिया,

तो क्षत्रिय हो जाओगे।

तुमने अपने ध्यान को

अगर समर्पण में डुबा दिया,

तो तुम ब्राह्मण हो जाओगे।

जन्म तो शूद्र की तरह हुआ है,

ध्यान रखना,

मरते समय ब्राह्मण कम से कम हो जाना।

ओशो

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