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By : Vishal Sharma
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कुरोसावा की कही 16 बातें: फिल्में देखना और लिखना सीखने वालों के लिए विशेष
इन महान फिल्म राइटर और डायरेक्टर को उनके बर्थडे वीक में याद कर रहे हैं जिनका क्रेज़ दुनिया भर के लैजेंडरी फिल्ममेकर्स पर छाया रहा है. जैसे कि हॉलीवुड के दिग्गज फ्रांसिस फोर्ड कोपोला, जॉर्ज लुकस, स्टीवन स्पीलबर्ग और मार्टिन स्कॉरसेज़ी उनके मोटे प्रशंसक हैं. लिस्ट बहुत लंबी है.

Don’t miss these 16 quotes by legendary filmmaker Akira Kurosawa!
अकीरा कुरोसावा 1910-1998.

जो हॉलीवुड मस्त फिल्में बनाने के लिए दुनिया भर में जाना जाता है उसे सांप सूंघ गया था जब उसने पहली बार अकीरा कुरोसावा की फिल्में देखी थीं. ग्रिपिंग, फ्रैश, तीक्ष्ण, प्राकृतिक, रंगीन, रिच, आसान और ताकतवर फिल्में. 1954 में उन्होंने अपनी सबसे पॉपुलर फिल्म ‘सेवन सामुराई’ बनाई जिसे 1960 में हॉलीवुड में ‘द मैग्नीफिसेंट सेवन’ नाम से रीमेक किया गया. अभी पिछले साल ही इसे बड़ी स्टारकास्ट के साथ फिर बनाया गया. हिंदी में ‘चाइना गेट’ तक इस तरह के प्रयास दिखे. बहुत से देशों की फिल्मों ने इस कहानी से प्रेरणा ली. कहानी जिसमें सात सामुराई एक गांव को डाकुओं के आक्रमण से बचाते हैं. मसाला फिल्मों के लिए ये अल्टीमेट रेफरेंस बनती चली गई. कोई फिल्ममेकर नहीं होगा जिसने ये नहीं देखी होगी. बॉलीवुड का सबसे निचले स्तर का दर्शक भी ‘सेवन सामुराई’ देखे और एंजॉय न करे, ऐसा हो नहीं सकता.

जिन्होंने कुरोसावा की फिल्में नहीं देखी उन्होंने जोरदार एंटरटेनमेंट मिस किया है.

उनकी फिल्मों में कलात्मकता बहुत आला दर्जे की होती है. एक-एक फ्रेम किसी क्लासिक चित्र जैसा रखा गया होता था, जिन्हें पढ़कर आज भी भारत और दुनिया के शीर्ष फिल्म संस्थानों में बच्चे सिनेमैटोग्राफी सीखते हैं.

प्रकृतिक तत्वों और मनोविज्ञान के अलावा उनकी फिल्मों में विचार बहुत अहम रूप से होते हैं. इतने अहम कि सत्तर बरस बाद भी उनकी फिल्म ‘राशोमॉन’ वस्तुपरकता और सत्य को देखने के नजरियों पर शुरुआती रेफरेंस पॉइंट सी बनी हुई है. 1950 में रिलीज हुई इस फिल्म की कहानी एक पुजारी, एक लड़कहारे और एक आम आदमी के सिरों से चलती है जो जंगल में हुई एक घटना के बारे में अपने वर्जन बताते हैं. जंगल में एक सामुराई की लाश मिली होती है और उसकी पत्नी के साथ रेप होने की बात कही जा रही है. पकड़ा गया डाकू ताजोमारू दोनों अपराधों का आरोपी है. फिल्म में हम सच के चार वर्जन देखते हैं और पाते हैं कि आमतौर पर हम लोग सच से कितना दूर होते हैं और त्रासदियां होती जाती हैं.

‘राशोमॉन’ ऐसी मिसाल फिल्म है जिसे जर्नलिज़्म के प्रशिक्षण संस्थानों में भी अनिवार्य रूप से दिखाया जाता है और जहां नहीं दिखाया जाता है वहां दिखाया जाना चाहिए. उससे भी ज्यादा 2017 में भारत के न्यूज़रूम्स में जरूर दिखाई जानी चाहिए. 2015 में विशाल भारद्वाज के स्क्रीनप्ले वाली फिल्म ‘तलवार’ रिलीज हुई. वो भी ‘राशोमॉन’ के ढांचे पर ही बनी है. 2008 के आरुषि तलवार और हेमराज डबल मर्डर केस की घटना को डायरेक्टर मेघना गुलज़ार ने इस फिल्म में दिखाया है. उन्होंने इस घटना में ‘सच’ के तीन वर्जन दिखाए.

फिल्म राशोमॉन का पोस्टर.
फिल्म राशोमॉन का पोस्टर.
कुरोसावा की बहुत सारी फिल्में हैं जो बहुत मजेदार और मस्ट वॉच है लेकिन उपरोक्त दो फिल्में उनकी सबसे ज्यादा चर्चित और उनके काम की प्रतिनिधि हैं. ‘राशोमॉन’ के लिए कहा जाता है कि इसने दुनिया भर के लोगों का परिचय जापान के सिनेमा से करवाया था. 1910 में 23 मार्च को जन्मे कुरोसावा की फिल्मों को देखना शुरू करना हो तो इन्हीं दो से करें. बाकी फिल्मों के बारे में चाहें तो फिर पूछें.

50 के दशक के बाद से शुरू होकर 1998 में कुरोसावा की मृत्यु के बाद आज तक भी उनसे दुनिया की हर भाषा का सिनेमा शिक्षा ले रहा है और प्रेरणा ले रहा है. ‘द गॉडफादर’ और ‘स्टार वॉर्स’ जैसी एपिक फिल्में बनाकर दुनिया में फिल्ममेकर्स की पीढ़ियों को प्रभावित करने वाले फ्रांसिस फोर्ड कोपोला और जॉर्ज लुकस तक कुरोसावा के दीवाने रहे. स्टीवन स्पीलबर्ग और मार्टिन स्कॉरसेज़ी जैसे लैजेंड भी ऐसे प्रशंसक थे कि कुरोसावा के नाम से उनके रोएं खड़े होते रहे होंगे. आज की पीढ़ी के लिए जो हॉलीवुड डायरेक्टर कल्ट हैं उन सबके लिए कुरोसावा और उनकी फिल्में शाश्वत ऊर्जा और प्रेरणा का स्त्रोत हैं. ऐसे दिग्गज निर्देशक भी हैं जो अपनी हर फिल्म शुरू करने से पहले कुरोसावा की फिल्म देखते हैं.

ये आभास यदि है कि उनकी फिल्में मुश्किल होंगी या बोरिंग होंगी तो बिलकुल निराधार बात है. उल्टे इतनी एंगेजिंग फिल्में नहीं बनीं. ये कुरोसावा का बर्थडे हफ्ता है और इसमें उन्हें याद कर रहे हैं. प्रस्तुत है उनके द्वारा कही 16 ऐसी बातें जो हमें जीवन पर उनकी फिलॉसफी बताती है, सिनेमा को लेकर उनकी समझ बताती है, उनके विचार बताती है और सबसे खास स्क्रीनप्ले राइटिंग पर उनके अनमोल टिप्स देती है. आकांक्षी लेखकों और स्क्रीनराइटर्स को जरूर पढ़ना चाहिए.

कुरोसावा की कही 16 बातें: फिल्में देखना और लिखना सीखने वालों के लिए विशेष
इन महान फिल्म राइटर और डायरेक्टर को उनके बर्थडे वीक में याद कर रहे हैं जिनका क्रेज़ दुनिया भर के लैजेंडरी फिल्ममेकर्स पर छाया रहा है. जैसे कि हॉलीवुड के दिग्गज फ्रांसिस फोर्ड कोपोला, जॉर्ज लुकस, स्टीवन स्पीलबर्ग और मार्टिन स्कॉरसेज़ी उनके मोटे प्रशंसक हैं. लिस्ट बहुत लंबी है.

filmmaker Akira Kurosawa!
अकीरा कुरोसावा 1910-1998.

जो हॉलीवुड मस्त फिल्में बनाने के लिए दुनिया भर में जाना जाता है उसे सांप सूंघ गया था जब उसने पहली बार अकीरा कुरोसावा की फिल्में देखी थीं. ग्रिपिंग, फ्रैश, तीक्ष्ण, प्राकृतिक, रंगीन, रिच, आसान और ताकतवर फिल्में. 1954 में उन्होंने अपनी सबसे पॉपुलर फिल्म ‘सेवन सामुराई’ बनाई जिसे 1960 में हॉलीवुड में ‘द मैग्नीफिसेंट सेवन’ नाम से रीमेक किया गया. अभी पिछले साल ही इसे बड़ी स्टारकास्ट के साथ फिर बनाया गया. हिंदी में ‘चाइना गेट’ तक इस तरह के प्रयास दिखे. बहुत से देशों की फिल्मों ने इस कहानी से प्रेरणा ली. कहानी जिसमें सात सामुराई एक गांव को डाकुओं के आक्रमण से बचाते हैं. मसाला फिल्मों के लिए ये अल्टीमेट रेफरेंस बनती चली गई. कोई फिल्ममेकर नहीं होगा जिसने ये नहीं देखी होगी. बॉलीवुड का सबसे निचले स्तर का दर्शक भी ‘सेवन सामुराई’ देखे और एंजॉय न करे, ऐसा हो नहीं सकता.

जिन्होंने कुरोसावा की फिल्में नहीं देखी उन्होंने जोरदार एंटरटेनमेंट मिस किया है.

उनकी फिल्मों में कलात्मकता बहुत आला दर्जे की होती है. एक-एक फ्रेम किसी क्लासिक चित्र जैसा रखा गया होता था, जिन्हें पढ़कर आज भी भारत और दुनिया के शीर्ष फिल्म संस्थानों में बच्चे सिनेमैटोग्राफी सीखते हैं.

प्रकृतिक तत्वों और मनोविज्ञान के अलावा उनकी फिल्मों में विचार बहुत अहम रूप से होते हैं. इतने अहम कि सत्तर बरस बाद भी उनकी फिल्म ‘राशोमॉन’ वस्तुपरकता और सत्य को देखने के नजरियों पर शुरुआती रेफरेंस पॉइंट सी बनी हुई है. 1950 में रिलीज हुई इस फिल्म की कहानी एक पुजारी, एक लड़कहारे और एक आम आदमी के सिरों से चलती है जो जंगल में हुई एक घटना के बारे में अपने वर्जन बताते हैं. जंगल में एक सामुराई की लाश मिली होती है और उसकी पत्नी के साथ रेप होने की बात कही जा रही है. पकड़ा गया डाकू ताजोमारू दोनों अपराधों का आरोपी है. फिल्म में हम सच के चार वर्जन देखते हैं और पाते हैं कि आमतौर पर हम लोग सच से कितना दूर होते हैं और त्रासदियां होती जाती हैं.

‘राशोमॉन’ ऐसी मिसाल फिल्म है जिसे जर्नलिज़्म के प्रशिक्षण संस्थानों में भी अनिवार्य रूप से दिखाया जाता है और जहां नहीं दिखाया जाता है वहां दिखाया जाना चाहिए. उससे भी ज्यादा 2017 में भारत के न्यूज़रूम्स में जरूर दिखाई जानी चाहिए. 2015 में विशाल भारद्वाज के स्क्रीनप्ले वाली फिल्म ‘तलवार’ रिलीज हुई. वो भी ‘राशोमॉन’ के ढांचे पर ही बनी है. 2008 के आरुषि तलवार और हेमराज डबल मर्डर केस की घटना को डायरेक्टर मेघना गुलज़ार ने इस फिल्म में दिखाया है. उन्होंने इस घटना में ‘सच’ के तीन वर्जन दिखाए.

फिल्म राशोमॉन का पोस्टर.
फिल्म राशोमॉन का पोस्टर.
कुरोसावा की बहुत सारी फिल्में हैं जो बहुत मजेदार और मस्ट वॉच है लेकिन उपरोक्त दो फिल्में उनकी सबसे ज्यादा चर्चित और उनके काम की प्रतिनिधि हैं. ‘राशोमॉन’ के लिए कहा जाता है कि इसने दुनिया भर के लोगों का परिचय जापान के सिनेमा से करवाया था. 1910 में 23 मार्च को जन्मे कुरोसावा की फिल्मों को देखना शुरू करना हो तो इन्हीं दो से करें. बाकी फिल्मों के बारे में चाहें तो फिर पूछें.

50 के दशक के बाद से शुरू होकर 1998 में कुरोसावा की मृत्यु के बाद आज तक भी उनसे दुनिया की हर भाषा का सिनेमा शिक्षा ले रहा है और प्रेरणा ले रहा है. ‘द गॉडफादर’ और ‘स्टार वॉर्स’ जैसी एपिक फिल्में बनाकर दुनिया में फिल्ममेकर्स की पीढ़ियों को प्रभावित करने वाले फ्रांसिस फोर्ड कोपोला और जॉर्ज लुकस तक कुरोसावा के दीवाने रहे. स्टीवन स्पीलबर्ग और मार्टिन स्कॉरसेज़ी जैसे लैजेंड भी ऐसे प्रशंसक थे कि कुरोसावा के नाम से उनके रोएं खड़े होते रहे होंगे. आज की पीढ़ी के लिए जो हॉलीवुड डायरेक्टर कल्ट हैं उन सबके लिए कुरोसावा और उनकी फिल्में शाश्वत ऊर्जा और प्रेरणा का स्त्रोत हैं. ऐसे दिग्गज निर्देशक भी हैं जो अपनी हर फिल्म शुरू करने से पहले कुरोसावा की फिल्म देखते हैं.

ये आभास यदि है कि उनकी फिल्में मुश्किल होंगी या बोरिंग होंगी तो बिलकुल निराधार बात है. उल्टे इतनी एंगेजिंग फिल्में नहीं बनीं. ये कुरोसावा का बर्थडे हफ्ता है और इसमें उन्हें याद कर रहे हैं. प्रस्तुत है उनके द्वारा कही 16 ऐसी बातें जो हमें जीवन पर उनकी फिलॉसफी बताती है, सिनेमा को लेकर उनकी समझ बताती है, उनके विचार बताती है और सबसे खास स्क्रीनप्ले राइटिंग पर उनके अनमोल टिप्स देती है. आकांक्षी लेखकों और स्क्रीनराइटर्स को जरूर पढ़ना चाहिए.

अपनी फिल्म रेन (1985) के सेट पर अकीरा कुरोसावा.
अपनी फिल्म रेन (1985) के सेट पर अकीरा कुरोसावा.

1.

” मैं किसी से नफरत नहीं कर सकता हूं. मेरे पास इतना टाइम नहीं है. “

2.

” क्या है सिनेमा? इस सवाल का जवाब आसान नहीं है. बहुत बरस पहले जापानी नॉवेलिस्ट शीगा नाओया ने अपने पोते के लिखे एक लेख को अपने काल के सबसे उल्लेखनीय गद्यों में से एक की तरह प्रस्तुत किया. उन्होंने उसे एक साहित्यिक पत्रिका में छपवाया. इसका शीर्षक था “मेरा कुत्ता” और इसमें कुछ यूं लिखा था, “मेरा कुत्ता एक भालू जैसा दिखता है; वो बिज्जू जैसा भी दिखता है; और वो लोमड़ी जैसा भी दिखता है… .” इस लेख में आगे भी कुत्ते की चारित्रिक विशेषताओं को यूं ही किसी न किसी दूसरे जानवर से तुलना करके विस्तार से बताया गया. इससे ये एनिमल किंगडम की एक पूरी लिस्ट जैसा बन गया. हालांकि इस लेख का अंत कुछ यूं किया गया था, “लेकिन चूंकि वो एक कुत्ता है, इसलिए वो सबसे ज्यादा कुत्ते जैसा ही लगता है.” मुझे याद है मेरी हंसी फूट पड़ी थी जब मैंने इस लेख को पढ़ा था, लेकिन इसमें एक गंभीर बात भी है. सिनेमा कई सारी दूसरी कलाओं जैसा लगता है. अगर सिनेमा में साहित्य की चारित्रिक विशेषताएं हैं तो इसमें रंगमंच के गुण भी हैं, इसका दार्शनिक पक्ष भी है, इसमें पेंटिंग और मूर्तिकला और संगीत के तत्व भी हैं. लेकिन सिनेमा अपने अंतिम विश्लेषण में सिनेमा ही है. “

3.

” लोग आज भूल गए हैं कि वो सब इस प्रकृति का ही एक हिस्सा मात्र हैं. फिर भी वो इसी प्रकृति को नष्ट करते हैं जिस पर हमारी जिंदगियां टिकी हैं. उन्हें हमेशा लगता है कि वो कुछ बेहतर बना सकते हैं. खासकर वैज्ञानिकों को ऐसा लगता है. वो भले ही स्मार्ट होंगे लेकिन वो प्रकृति के दिल को नहीं समझते हैं. वो सिर्फ ऐसी चीजों का आविष्कार करते हैं जो आखिरकार लोगों को बस खुश करती हैं. लेकिन फिर भी उन्हें अपने आविष्कारों पर गर्व है. और भी बद्तर ये है कि ज्यादातर लोगों को भी उन पर गर्व है. वो उनको ऐसे देखते हैं जैसे कि वो कोई करिश्मे हों. वो उनकी पूजा करते हैं. लोगों को नहीं पता लेकिन वो इस प्रकृति को खो रहे हैं. वो नहीं देखते कि नष्ट होने जा रहे हैं. इंसानों को लिए संसार में सबसे जरूरी चीजें हैं – साफ हवा और साफ पानी. “

4.

” सभी इंसानों को एक जैसी ही समस्याएं होती हैं. एक फिल्म को सिर्फ तभी समझा जा सकता है जब वो इन्हें सही तरीके से चित्रित करती हो. “
..

5.

” स्क्रिप्ट लिखने के लिए आपको सबसे पहले वर्ल्ड के ग्रेट नॉवेल्स और ड्रामा पढ़ने होंगे. आपको सोचना होगा कि आखिर इन्हें महान क्यों माना जाता है. जब आप उन्हें पढ़ते हो तो आपको क्या लगता है वो इमोशन कहां से आ रहा होता है? लेखक ने अपने किरदारों और घटनाओं को जिस तरह से चित्रित किया है, वैसा करने के लिए उसे किस हद तक पैशन रखना पड़ा होगा और किस स्तर की बारीकी पर उसने कमांड हासिल की होगी? आपको इन्हें बहुत गहराई से पढ़ना होगा, उस बिंदु तक कि ये सब चीजें समझ में आ जाएं. आपको सब महान फिल्में भी देखनी ही होंगी. आपको महान स्क्रीनप्ले पढ़ने होंगे और महान फिल्म डायरेक्टर्स की फिल्म थ्योरीज़ स्टडी करनी होंगी. अगर आपका लक्ष्य एक फिल्म डायरेक्टर बनना है तो आपको स्क्रीनराइटिंग पर राज करना होगा. “

6.

” मुझे लगता है मेरी सभी फिल्मों में एक कॉमन थीम है.
वो यह सवाल है किः लोग एक साथ खुश क्यों नहीं हो सकते हैं? “
..

7.

” मैं भूल रहा हूं कि किसने कहा था रचना ही स्मृति है. मेरे अपने अनुभव और जो भी अलग-अलग चीजें मैंने पढ़ी हैं वो मेरी स्मृति में रहती हैं और वो आधार बनती हैं जिस पर मैं कुछ नया निर्मित करता हूं. मैं इसे शून्य में से निकालकर तो नहीं बना सकता न. इसी कारण से, जब से मैं एक नौजवान था मैं जब भी किताब पढ़ता मैंने हमेशा एक नोटबुक अपने साथ रखी है. मैं अपने रिएक्शन इनमें लिखता चलता हूं और ये भी कि कौन सी खास चीज मुझे भावुक कर रही है. मेरे पास ऐसी कॉलेज नोटबुक्स के ढेर के ढेर हैं. जब भी मैं एक स्क्रिप्ट लिखने जाता हूं तो इन्हें ही पढ़ता हूं. कहीं न कहीं, ये हमेशा गतिरोध तोड़कर मुझे आगे बढ़ने का एक बिंदु देती हैं. यहां तक कि डायलॉग्स की एक-एक लाइन के लिए मैंने इन नोटबुक्स से हिंट लिए हैं. जो मैं कहना चाह रहा हूं वो ये कि बेड पर लेटे-लेट किताबें मत पढ़ो. “
..

8.

” मुझे अनगढ़े कैरेक्टर पसंद हैं. ये शायद इसलिए हो सकता है क्योंकि
चाहे मैं कितना भी बूढ़ा हो जाऊं मैं खुद भी अनगढ़ा ही हूं. “
..

9.

” चाहे वर्ल्ड में मैं कहीं भी जाता हूं, हालांकि मैं कोई भी विदेशी भाषा नहीं बोल सकता हूं लेकिन मैं उस जगह से अलगाव महसूस नहीं करता हूं. मैं समझता हूं कि ये धरती मेरा घर है. अगर हर किसी ने इस तरह से सोचा तो लोग देखेंगे कि ये अंतरराष्ट्रीय टकराव कितना मूर्खतापूर्ण है और उसका अंत हो जाएगा. हम ऐसे बिंदु तक पहुंच चुके हैं जहां सिर्फ भौगोलिकता को केंद्र में रखकर सोचना बहुत संकीर्ण दिमाग वाला होना है. इंसानों ने अंतरिक्ष में सैटेलाइट लॉन्च कर दिए और फिर भी वो अपने पैरों की ओर देखते हुए धरती पर लोटते हैं जैसे जंगली कुत्ते हों. हमारे इस ग्रह का हो क्या गया है? “

10.

” एक फिल्म वाकई में अच्छी है तो वो एंजॉय करने लायक भी है.
इसमें कुछ भी जटिल नहीं होता. “
..

11.

” 1944 में आई मेरी फिल्म द मोस्ट ब्यूटीफुल की स्क्रिप्ट को सेंसर ने अश्लील माना. अपना फैसला सेंसर के एक व्यक्ति ने मेरे हाथ में थमाया. वो इतने सटके हुए थे कि उन्हें ये वाक्य अश्लील लगाः “तड़प में खुले हुए फैक्ट्री के गेट ने स्टूडेंट वर्करों का इंतजार किया.” मुझे समझ नहीं आया कि इस वाक्य में उनको अश्लील क्या लगा. शायद आपको भी नहीं लगेगा. लेकिन मानसिक रूप से विकृत सेंसर के लिए ये वाक्य निर्विवाद रूप से अश्लील था. उसने मुझे बताया कि ‘गेट’ शब्द उसे यहां महिला की योनि की ओर इशारा लग रहा है! सेक्स के रोगों से ग्रस्त इन लोगों को तो हर चीज से ही कामुक इच्छाएं हो जाती थीं. क्योंकि वो लोग खुद ही अश्लील थे. उनकी अश्लील आंखों से देखी गई हर चीज ही अश्लील हो जाती थी. ये पूरी तरह यौन विकृति विज्ञान का मामला था. “

12.

” यह बहुत पर्याप्त होगा यदि कोई एक क्षेत्र हो जिसमें कोई औरत या आदमी बहुत मजबूत हो. अगर इंसान हर क्षेत्र में मजबूत होते तो ये बाकी इंसानों के लिए अच्छा नहीं होता. “

13.

” मैंने 1940 के करीब दो अन्य लोगों के साथ मिलकर स्क्रिप्ट लिखना शुरू किया. तब तक मैं अकेले ही लिखता था, और मैंने पाया कि मुझे इसमें कोई दिक्कत नहीं थी. लेकिन अकेले लिखने में खतरा ये है कि किसी दूसरे मानव को लेकर आपकी व्याख्या एकतरफा होगी. अगर आप दो अन्य लोगों के साथ मिलकर उस मानव के बारे में लिखते हो तो तब आप उस पर कम से कम तीन अलग-अलग नजरिए पाते हो और आप उन बिंदुओं पर बात कर सकते हो जिस पर असहमत हो. इसके अलावा, डायरेक्टर लोगों की ये प्रवृत्ति होती है कि वो हीरो और कहानी को ऐसे पैटर्न में साथ धकेल देते हैं जो उनके लिए डायरेक्ट करने में बहुत आसान हो. दो अन्य लोगों के साथ मिलकर लिखते हुए आप इस खतरे को भी टाल सकते हो. “
..

14.

” एक कलाकार होने का मतलब ये है कि वो कभी भी अपनी नजरें नहीं फैरता. “
..

15.

” एक बढ़िया स्क्रिप्ट के साथ एक बढ़िया डायरेक्टर एक मास्टरपीस बना सकता है. उसी स्क्रिप्ट के साथ एक औसत डायरेक्टर ऐसी फिल्म बना सकता है जिसे टाला जा सकता है. लेकिन एक बुरी स्क्रिप्ट के साथ एक बढ़िया डायरेक्टर भी किसी स्थिति में एक बढ़िया फिल्म नहीं बना सकता है. सच्चे सिनेमैटिक एक्सप्रेशन के लिए ये होना चाहिए कि कैमरा और माइक्रोफोन दोनों ही आग और पानी को पार करके गुजर सकें. यही वो है जिससे एक असली फिल्म बनती है. आपकी स्क्रिप्ट कुछ ऐसी होनी चाहिए जिसमें ऐसा करने की ताकत हो. “

16.

” खास ध्यान में रखने वाली बात है कि जो भी बेस्ट स्क्रिप्ट होती हैं उनमें बहुत कम विवरणात्मक पैसेज होते हैं. एक स्क्रीनप्ले के वर्णनात्मक पैसेज के साथ विवरण भी जोड़ना सबसे खतरनाक जाल है जिसमें आप फंसते हो. एक विशेष पल में आपके कैरेक्टर की मनोवैज्ञानिक अवस्था क्या है इसका स्पष्टीकरण देना बहुत आसान है लेकिन इसे डायलॉग और एक्शन की नाजुक बारीकियों के जरिए बताना बहुत कठिन है. लेकिन ऐसा करना असंभव भी नहीं है. इस बारे में बहुत व्यापक तौर पर महान नाटकों के अध्ययन से सीखा जा सकता है और मुझे लगता है कि अच्छी तरह पके हुए डिटेक्टिव नॉवेल भी इसमें बहुत अच्छे निर्देश दे सकते हैं. “

#अंतिम

जब कुरोसावा को 1990 में ऑनररी ऑस्कर से सम्मानित किया गया. देखें उन्होंने अपनी स्पीच में क्या कहा. उनका नाम अनाउंस करने के लिए स्टेज पर हॉलीवुड के दो दिग्गजों को बुलाया गया – जॉर्ज लुकस और स्टीवन स्पीलबर्ग को. सामने जितने भी एक से एक सेलेब्रिटी बैठे थे जब खड़े हो चुके थे.

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  1. Vishal sharma (theatre actor, writer)
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