निर्णय

भारत और विश्व के समस्त दर्शनों की चेतना हमेशा एक आग्रह मनुष्य के जीवन के लिए करती रही है, वह आग्रह रहा है कि मनुष्य इस जीवन में कोशिश करे एक ऐसे “महाजीवन” को खोजने की जहाँ वह संसार के समस्त गुणों से स्वयं को मुक्त कर सके, भारत ने इसे कहीं “मोक्ष” कहीं “निर्वाण” कहीं “परम स्वतंत्रता” कहा है। चाहे हो वह भारत का वैदिक दर्शन हो, या महात्मा बुद्ध का सन्देश, अथवा परमवीर श्री महावीर का प्रेम वाक्य , वह मनुष्य से आग्रह करता रहा है जीवन के लक्ष्य परम स्वतंत्रता के प्रयास की, और जिन भी लोगों ने प्रयास किया उन्होंने उसे पाया भी। इस आग्रह के साथ सिर्फ एक नियम था, वह नियम था, जीवन के परम सूत्र “मोक्ष” तक जाने की मात्र अभिलाषा न हो बल्कि हो इसका निर्णय।
भारतीय सहिंता ने मनुष्य के लिए समस्त मार्ग खोले हैं, भारतीय सहिंता कहती भी है कि जीवन का कोई भी मार्ग पाया जा सकता है, नर से नारायण की यात्रा, मनुष्य से ईश्वर का प्रयाण और उसकी यात्रा को ही मानव जीवन का लक्ष्य कहा है पर उसके लिए जरुरी है हमारा व्यक्तिगत निर्णय, अगर हमारा निर्णय नहीं है तो हम कभी गंतव्य को, मंज़िल को पा भी नहीं सकते।
“ निर्णय” भारतीय दर्शन का महत्त्वपूर्ण आधार है, एक बार की घटना है जब श्री मंत महावीर जी एक जंगल से जा रहे थे, तभी उनके पास एक भील आया, उसने महावीर जी से पूछा क्या वो भगवान को प्राप्त कर सकता है? इतनी अनैतिक घटनाओं के बाद भी क्या वो ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चल सकता है ? क्या वे उसे अपना शिष्य स्वीकारेंगे? महावीर जी ने उस भील से कहा था, अगर ईश्वर प्राप्ति उसका निर्णय है तब इसके लिए उसे कोई नहीं रोक सकता। उस भील ने कहा की फिर क्या होगा मेरे इतिहास का जहाँ पाप है, लोभ है, अपराध है ? महावीर जी ने कहा था इतिहास अपना कार्य कर चूका, उससे भविष्य का बीज जरूर बनेगा, पर उसके आज के निर्णय की क्षमता भी नए बीज तैयार करेगी, जो निर्णय अपराध का था, और जो निर्णय ईश्वर प्राप्ति का है, इनमें से कौन सा ज्यादा पक्का है, उस पर निर्भर करेगा की तेरे आने वाले भविष्य में किस बीज का पेड़ जीवित बचेगा। न तो तेरा इतिहास, आज के निर्णय को प्रभावित कर सकता, और न तो तेरा आज का निर्णय, तेरे इतिहास को, ये सदा अपना क्रम लेंगे।
बात लम्बी हो रही थी और महावीर जी के सेवक श्री मंत से आगे जाने के लिए कह रहे थे, तभी भील ने कहा क्या मैं भी आपका शिष्य हो सकता हूँ ? महावीर जी के आस पास के लोग एक दूसरे को देखने लगे, उन्हें लगा यह भील और महावीर जी का शिष्य? तभी महावीर जी ने कहा, अगर तेरा निर्णय मेरे शिष्य बनने का होगा तो तू जरूर शिष्य बनेगा, क्योंकि यही तेरा निर्णय है। भील ने कहा निर्णय तो है, पर आपको गुरु बनाकर मैं आपसे सीखूं कैसे? आप तो आगे निकल जायेंगे? श्री मंत महावीर जी ने कहा तू अपना निर्णय देख इसकी फ़िक्र मत कर मैं कैसे अपने शिष्यों को संभालता हूँ, तू निर्णय कर, अगर तेरा निश्चय है, तब मैं कहीं बादलों से, कहीं सूरज की किरणों से, कहीं फूल कहीं पत्तों से, कहीं धरा से, कहीं आकाश से प्रति क्षण तेरे साथ मौजूद रहूँगा, अगर मैं रहना ना भी चाहूँ तो भी तेरा निर्णय मेरी मौजूदगी को प्रकट कर देगा , यह तेरे निर्णय की क्षमता और भाव होगा।
मजे की बात है, की हमारे जीवन में हमारे निर्णय ही सबसे कमजोर होते हैं, या अपरिपक्व होते हैं, हमारे जब निर्णय कमजोर होते है तब हमारा भाव अपने आप ही कमजोर हो जाता है, हमारा भाव कमजोर होता है वैसे ही हमारी कार्य करने की क्षमता कमजोर हो जाती है। क्योंकि निर्णय एक संतुलित मन का कार्य है, निर्णय एक निरंतरता है, बिना किसी ऊब के, नहीं तो जीवन के कई पहलुओं से हम ऊब से जाते हैं, कहीं कोई उमंग नहीं होती, जीवन अकसर लोग एक मुर्दे की भांति जीते हैं, चलते फिरते तो हैं पर एक पत्थर की तरह, जीवन एक बोझ बन जाता है।
जीवन उमंग से भरा हो इसके लिए निर्णय की केवल क्षमता नहीं उसका आधार भी देखना होगा, निर्णय पैदा होता है संवाद से, संवाद पैदा होता है दर्शन से, दर्शन पैदा होता है जीवन में कुछ मूल सवाल से, अगर हम जीवन के कुछ मूल सवाल नहीं कर पाते तो दर्शन भी पैदा नहीं कर सकते, और बिना दर्शन से संवाद कभी हो ही नहीं सकता, और बिना संवाद निर्णय नहीं होते सिर्फ क्षणिक निश्चय किये जाते हैं, जिन पर हम कभी खरे नहीं उतरते। संवाद एक महत्त्वपूर्ण अंश है किसी भी निर्णय के लिए क्योंकि संवाद से संशय मिट जाते हैं, संशयों के मिटे बिना निर्णय कभी हो ही नहीं सकते, बल्कि मज़ा तो यह है की संशय के गर्भ से निकलकर ही निर्णय अपना आधार रखता है, जो कभी संशित नहीं हुआ उसने कभी निर्णय ही नहीं लिए, बस कुछ निश्चय किये होंगे।
एक बड़ी मार्मिक कहानी है, एक बार श्री रमन महर्षि जी पूछा गया था की उन्होंने सन्यासी बनने का निर्णय कैसे लिया ? उन्होंने ने कहा था ईश्वर से सवाल करके मैंने सन्यासी बनने का निर्णय किया था, सवाल करने वाले ने पूछा ईश्वर से सवाल? क्या मतलब है ? श्री रमन महर्षि जी ने कहा था, मैंने ईश्वर से पूछा था, क्या ईश्वर है ? उसने कहा, हाँ है, मैंने मानी नहीं, फिर मैंने कहा कहाँ है ? ईश्वर ने कहा सब तरफ, तुझमें भी, बस उसी दिन मैंने निर्णय लिया कि अपने अंदर के ईश्वर को जरूर बाहर लाऊंगा और अनंत में फैले ईश्वर को, समस्त में फैले ईश्वर को, अपने जीवन के अधिकार से इस धरा में पुनः प्रकट करूँगा।
जीवन की सबसे बड़ी क्रांति तब होगी जब हम जीवन में निर्णयों को उतारने लगेंगे, जीवन में धर्म तब पैदा होगा जब निर्णय हमारी भूमिका में हमको एकाग्र करते रहेंगे, अध्यात्म पैदा तब होगा जब हम आत्मा के आधार से निर्णयों का संवाद पैदा करेंगे। चलें निर्णयों के आधार में, संवादों की धरा से, संशयों के भेद से, धर्म की भूमिका में, एक महा क्रांति में।
आपका
