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खुदकुशी #1

अकेला

अक्सर खुदकुशी अकेले नहीं होती| 
वो रस्सी लिपटती है
कई गलों से|
हलक कुछ इस कदर कसती है,
न निवाला अंदर जाता है,
न बोल बाहर| 
जैसे उस कटी नस से रुकता नहीं खून,
कुछ सूजी हुई आँखों से
थमते नहीं आंसू | 
एक दोपहर जो गोलियाँ निगली जाती हैं,
कड़वा कर जाती हैं चाय को,
कई-कई शामों तक|
कंक्रीट पर पड़े खून के वो धब्बे
कई बारिशों बाद भी,
सुर्ख लाल दिखते हैं|
उस अनजान, आखिरी नोट के बाद,
नादान, मुझ जैसे कुछ और,
कलम कुरेदते हैं| 
उम्मीद? जो हुआ, अब और न हो| 
क्यों भूल जाते हैं लोग,
वो अकेले नहीं हैं|


हलक: throat