तुलसीसेवा, श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए श्रीराधाजी द्वारा तुलसीसेवा-व्रत

नरा नार्यश्वच तां दृष्ट्वा तुलनां दातुमक्षमा:।
तेन नाम्ना च तुलसीं तां वदन्ति पुराविद:।।

‘स्त्री-पुरुष जिस पौधे को देखकर उसकी तुलना करने में समर्थ नहीं हैं, उसका नाम तुलसी है। ऐसा पुरातत्त्ववेता लोग कहते हैं।’ पुष्पों में अथवा देवियों में किसी से भी इनकी तुलना नहीं हो सकी इसलिए उन सबमें पवित्ररूपा इनको तुलसी कहा गया। इनका महत्व वेदों में वर्णित है। तुलसीजी लक्ष्मीजी (श्रीदेवी) के समान भगवान नारायण की प्रिया और नित्य सहचरी हैं; इसलिए परम पवित्र और सम्पूर्ण जगत के लिए पूजनीया हैं। अत: वे विष्णुप्रिया, विष्णुवल्लभा, विष्णुकान्ता तथा केशवप्रिया आदि नामों से जानी जाती हैं। भगवान श्रीहरि की भक्ति और मुक्ति प्रदान करना इनका स्वभाव है।

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भगवती तुलसी का प्रादुर्भाव

तुलसी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पुराणों में अनेक कथाएं हैं और कल्पभेद से उनमें कई स्थानों पर कुछ भिन्नता भी प्राप्त होती है — एक कथा के अनुसार क्षीरसागर का मन्थन करने पर ऐरावत हाथी, कल्पवृक्ष, चन्द्रमा, लक्ष्मी, कौस्तुभमणि, दिव्य औषधियां व अमृत कलश आदि निकले। सभी देवताओं ने लक्ष्मी एवं अमृत कलश भगवान विष्णु को अर्पित कर दिए। भगवान विष्णु अमृत कलश को अपने हाथ में लेकर अति प्रसन्न हुए और उनके आनन्दाश्रु उस अमृत में गिर पड़े, जिनसे तुलसी की उत्पत्ति हुई। इसीलिए तुलसी भगवान विष्णु को बहुत प्रिय हो गयीं और तबसे देवता भी तुलसी को पूजने लगे।

कुछ पुराणों के अनुसार भगवती तुलसी मूलप्रकृति की ही प्रधान अंश हैं। वे गोलोक में तुलसी नाम की गोपी थीं और भगवान के चरणों में उनका अतिशय प्रेम था। रासलीला में श्रीकृष्ण के प्रति अनुरक्ति देखकर राधाजी ने इन्हें मानवयोनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। गोलोक में सुदामा नाम का एक गोप श्रीकृष्ण का मुख्य पार्षद था; उसे भी राधाजी ने क्रुद्ध होकर दानवयोनि में जन्म लेने का शाप दे दिया जो अगले जन्म में शंखचूड़ दानव बना। ब्रह्माजी की प्रेरणा से दोनों का गांधर्वविवाह हुआ। शंखचूड़ ने देवताओं को स्वर्ग से निकालकर उस पर अपना अधिकार कर लिया। भगवान विष्णु ने देवताओं को उसकी मृत्यु का उपाय बताते हुए उसे मारने के लिए भगवान शंकर को एक त्रिशूल दिया और कहा कि तुलसी का सतीत्व नष्ट होने पर ही शंखचूड़ की मृत्यु संभव हो सकेगी। भगवान विष्णु ने छलपूर्वक तुलसी का सतीत्व नष्ट किया और शंकरजी ने त्रिशूल से शंखचूड़ का वध कर डाला। भगवान विष्णु ने जो अनुग्रह कर इन्हें अपनी पत्नी बनाने के लिए छल का अभिनय किया, उससे रुष्ट होकर इन्होंने उन्हें शिला बनने का शाप दिया और स्वयं तुलसी के शरीर से गण्डकी नदी उत्पन्न हुई और भगवान श्रीहरि उसी के तट पर मनुष्यों के लिए पुण्यप्रद शालग्राम बन गये। भगवान ने तुलसी के सामने प्रकट होकर कहा — ’तुम मेरे लिए बदरीवन में रहकर बहुत तपस्या कर चुकी हो, अब तुम इस शरीर का त्यागकर दिव्य देह धारणकर मेरे साथ आनन्द करो। लक्ष्मी के समान तुम्हें सदा मेरे साथ रहना चाहिए। तुम्हारा यह शरीर गण्डकी नदी के रूप में प्रसिद्ध होगा, जो मनुष्यों को उत्तम पुण्य देने वाली बनेगी। तुम्हारे केशकलाप पवित्र वृक्ष होंगे जो तुलसी नाम से प्रसिद्ध होंगे। तीनों लोकों में देवताओं की पूजा के काम में आने वाले जितने भी पत्र और पुष्प हैं, उन सबमें तुलसी प्रधान मानी जाएगी। स्वर्गलोक, मर्त्यलोक, पाताल तथा वैकुण्ठलोक में सर्वत्र तुम मेरे पास रहोगी। वहां तुम लक्ष्मी के समान सम्मानित होओगी। तुलसी-वृक्ष के नीचे के स्थान परम पवित्र होंगे। तुलसी के गिरे पत्ते प्राप्त करने के लिए समस्त देवताओं के साथ मैं भी रहूंगा।’

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तब तुलसी अपना वह शरीर त्यागकर और दिव्य रूप धारण करके श्रीहरि के वक्ष:स्थल पर लक्ष्मी की भांति सुशोभित होने लगीं। इस प्रकार लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी, गंगाजी और तुलसीजी — ये चारों देवियां भगवान श्रीहरि की पत्नियां हुईं।

तुलसा महारानी नमो नमो,
हरि की पटरानी नमो नमो।
छप्पन भोग छतीसों व्यंजन,
बिन तुलसी हरि एक न मानीं।।

भगवान श्रीहरि द्वारा सर्वप्रथम तुलसी पूजा

भगवान श्रीहरि ने तुलसी को गौरव प्रदान करके उन्हें लक्ष्मीजी के समान सौभाग्यशाली बना दिया। लक्ष्मीजी और गंगाजी ने तो तुलसी के नवसंगम, सौभाग्य और गौरव को सहन कर लिया परन्तु सरस्वतीजी क्रोध के कारण इसे सहन नहीं कर सकीं। सरस्वतीजी के कलह से लज्जा व अपमान के कारण तुलसीजी अन्तर्धान हो गयीं। ज्ञानसम्पन्न देवी तुलसी सर्वसिद्धेश्वरी थीं अत: उन्होंने श्रीहरि की आंखों से अपने को ओझल कर लिया। जब भगवान श्रीहरि ने तुलसीजी को कहीं नहीं देखा तो सरस्वतीजी को समझाकर वे तुलसीवन को गए और तुलसीजी की भक्तिपूर्वक स्तुति की।

तुलसी की पूजा का मन्त्र

भगवान श्रीहरि ने तुलसी का ध्यान करके लक्ष्मीबीज (श्रीं), मायाबीज (ह्रीं), कामबीज (क्लीं) और वाणीबीज (ऐं) — इन बीजों को पूर्व में उच्चारण कर ‘वृन्दावनी’ शब्द के अन्त में चतुर्थी विभक्ति लगाकर अंत में वह्निजाया (स्वाहा) का प्रयोग करके दशाक्षर मन्त्र से पूजन किया था —

श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वृन्दावन्यै स्वाहा’

यह मंत्रों में कल्पतरु है। जो इस मन्त्र का उच्चारण करके विधिपूर्वक तुलसी की पूजा करता है, उसे निश्चय ही सम्पूर्ण सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं।

भगवान श्रीहरि द्वारा तुलसी की स्तुति (नामाष्टक)

जब तुलसीजी अन्तर्धान हो गईं तब भगवान श्रीहरि ने विरह से व्याकुल होकर वृन्दावन जाकर तुलसी की पूजाकर इस प्रकार स्तुति की —

जब वृन्दा (तुलसी) रूप वृक्ष तथा अन्य वृक्ष एकत्र होते हैं, तब उस वन को ‘वृन्दा’ कहते हैं। ऐसी ‘वृन्दा’ नाम से प्रसिद्ध अपनी प्रिया की मैं उपासना करता हूं। जो देवी प्राचीनकाल में वृन्दावन में प्रकट हुईं थीं, अत: जिन्हें ‘वृन्दावनी’ कहते हैं, उन सौभाग्यवती देवी की मैं उपासना करता हूं। जो असंख्य वृक्षों में निरन्तर पूजा प्राप्त करती हैं, अत: जिसका नाम ‘विश्वपूजिता’ पड़ा है, उस जगतपूज्या देवी की मैं उपासना करता हूं। तुम असंख्य विश्वों को सदा पवित्र करती हो, अत: तुम ‘विश्वपावनी’ नामक देवी का मैं विरह से आतुर होकर स्मरण करता हूं। जिसके बिना प्रचुर पुष्प अर्पित करने पर भी देवता प्रसन्न नहीं होते हैं, मैं शोकाकुल होकर ‘पुष्पसारा’ नाम से विख्यात पुष्पों की सारभूत उन तुलसी के दर्शन की कामना करता हूं। संसार में जिसकी प्राप्ति से भक्त परम आनन्दित हो जाता है, वह ‘नन्दिनी’ नाम से प्रसिद्ध तुलसी मुझ पर प्रसन्न हों। सम्पूर्ण विश्व में जिस देवी की कोई तुलना नहीं है, अत: ’तुलसी’ नाम से विख्यात उस प्रिया की मैं शरण ग्रहण करता हूं।तुलसी श्रीकृष्ण की जीवनस्वरूपा तथा उन्हें निरन्तर प्रेम प्रदान करने वाली हैं, इसलिए ‘कृष्णजीवनी’ नाम से प्रसिद्ध वह तुलसी देवी मेरे जीवन की रक्षा करें।

वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारा नन्दिनी च तुलसी कृष्णजीवनी।।
एतन्नामाष्टकं चैव स्रोतं नामार्थसंयुतम्।
य: पठेत् तां च सम्पूज्य सोऽश्वमेधफलं लभेत्।।
(देवीभागवत ९।२५।३२-३३)

अर्थ — वृन्दा, वृन्दावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी, कृष्णजीवनी — ये तुलसी के आठ नाम हैं। ये नाम स्त्रोत के रूप में ऊपर दिए हैं। जो तुलसी की पूजा करके इस नामाष्टक का पाठ करता है; उसे अश्वमेध-यज्ञ का फल प्राप्त हो जाता है।

चन्दन, सिंदूर, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य व स्त्रोत आदि से श्रीहरि ने तुलसीजी का पूजन किया और लक्ष्मीपति श्रीहरि वहीं बैठ गये। इतने में उनके सामने साक्षात् तुलसी वृक्ष से प्रकट हो गईं। तब भगवान विष्णु ने उन्हें वर देते हुए कहा — ’तुम सर्वपूज्या हो जाओ। सुन्दर रूप वाली मैं तुम्हें अपने मस्तक व वक्ष:स्थल पर धारण करूंगा और समस्त देवता आदि भी तुम्हें अपने मस्तक पर धारण करेंगे।’ तुलसीजी ने भगवान के चरणों में प्रणाम किया। अपमान के कारण वह रो रही थीं। ऐसी प्रिया तुलसीजी को देखकर भगवान ने उन्हें हृदय में स्थान दिया और सरस्वतीजी से उनका मेल करवाया। फिर सरस्वतीजी ने भी तुलसीजी को हृदय से लगा लिया। लक्ष्मीजी और गंगाजी ने भी तुलसीजी को हाथ पकड़कर महल में प्रवेश दिलाया। भगवान श्रीहरि ने तुलसीजी को वर देते हुए कहा — ’देवि ! तुम सबके लिए तथा मेरे लिए पूजनीय, सिर पर धारण करने योग्य, वन्दनीय तथा मान्य हो जाओ।’ कार्तिक पूर्णिमा को तुलसीजी का प्राकट्य हुआ था और सर्वप्रथम भगवान श्रीहरि ने उनकी पूजा की थी। अत: कार्तिक पूर्णिमा को भक्तिभाव से तुलसीजी की पूजा करने से विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।

तुलसी-दल का चयन करते समय इस श्लोक का पाठ करना चाहिए —

तुलस्यमृतजन्मासि सदा त्वं केशवप्रिये।
केशवार्थं चिनोमि त्वां वरदा भव शोभने।
त्वदंगसम्भवैर्नित्यं पूजयामि यथा हरिम्।
तथा कुरु पवित्रांगि कलौ मलविनाशिनी।।
(पद्मपुराण सृ. ६३।११-१३)

अर्थ — ’तुलसी ! तुम अमृत से उत्पन्न हो और केशव को सदा ही प्रिय हो। कल्याणी ! मैं भगवान की पूजा के लिए तुम्हारे पत्तों को चुनता हूं। तुम मेरे लिए वरदायिनी बनो। तुम्हारे श्रीअंगों से उत्पन्न होने वाले पत्रों और मंजरियों द्वारा मैं सदा ही श्रीहरि का पूजन कर सकूं, ऐसा उपाय करो। पवित्रांगी तुलसी ! तुम कलिमल का नाश करने वाली हो।’

व्रज में स्त्रियां तुलसी-चयन करते समय तुलसीजी से इस तरह प्रार्थना करती हैं —

’मत तुम हिलो, मत तुम झूलो, मत तुम झोटा लो,
श्रीकृष्ण की भेजी आई, एक दल मांगो देयो।’

तुलसी महिमा — पद्मपुराण के अनुसार जिस समय क्षीरसागर का मन्थन हुआ, उस समय श्रीविष्णु के आनन्दांश से तुलसी का प्रादुर्भाव हुआ। श्रीहरि ने तुलसी को अपने मस्तक पर धारण किया, उनके शरीर के सम्पर्क से वह पवित्र हो गईं। श्रीकृष्ण ने उन्हें गोमतीतट पर लगाया था। वृन्दावन में विचरते समय सम्पूर्ण जगत और गोपियों के हित के लिए उन्होंने तुलसी का सेवन (पूजन) किया। श्रीरामचन्द्रजी ने वशिष्ठजी की आज्ञा से राक्षसों का वध करने के लिए तुलसी को सरयू के तट पर लगाया था। दण्डकारण्य में भी भगवान श्रीराम ने अपने हित साधन के लिए तुलसी का वृक्ष लगाया और लक्ष्मणजी और सीताजी ने बड़ी भक्ति के साथ उसे पोसा था। अशोकवाटिका में रहते हुए सीताजी ने श्रीरामचन्द्रजी को प्राप्त करने के लिए तुलसी का ही ध्यान किया था। पार्वतीजी ने भगवान शंकर की प्राप्ति के लिए हिमालय पर्वत पर तुलसी को लगाया और सेवा की थी। देवांगनाओं व किन्नरों ने दु:स्वप्न नाश के लिए नन्दनवन में तुलसी सेवा की थी। गया में पितरों ने भी तुलसी सेवन (पूजा) किया था। भगवान शालग्राम साक्षात् नारायणस्वरूप हैं और तुलसी के बिना उनकी कोई भी पूजा सम्पन्न नहीं हो सकती। इसी तरह विष्णु, राम, कृष्ण, नृसिंह, वामन, लक्ष्मी-नारायण आदि भगवानों की प्रतिमा पर भी तुलसी अर्पित की जाती है, यह उनके विष्णु-प्रिया होने का प्रमुख प्रमाण है। पद्मपुराण के अनुसार मनुष्य जो कुछ भी पृथ्वी पर धर्मकर्म करता है, उसमें यदि तुलसी का संयोग नहीं होता है तो वह सब व्यर्थ हो जाता है। कमलनयन भगवान तुलसी के बिना उसे स्वीकार नहीं करते। श्रीअद्वैताचार्यजी के शब्दों में-

तुलसीदल मात्रेण जलस्य चुलुकेन वा।
विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सल:।।

अर्थ — ‘अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त स्नेहिल श्रीकृष्ण स्वयं को ऐसे भक्त के हाथों बेच देते हैं जो उन्हें केवल तुलसीपत्र और चुल्लू भर जल भी अर्पित करता है।’

भगवती तुलसी की पूजाविधि

श्रीविष्णुप्रिया तुलसी को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धा और भक्ति आवश्यक है। स्नानादि के बाद तुलसी को प्रणाम करें और फिर उनका ध्यान करें। ध्यान में सम्पूर्ण पापों को नष्ट करने की शक्ति होती है। ध्यान करने के बाद उनका षोडशोपचार या पंचोपचार (गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य) पूजन करें व नामाष्टक का पाठ करें। अंत में निम्न पंक्तियों का उच्चारण करते हुए प्रणाम करें —

जो दर्शन-पथ पर आने पर सारे पाप समुदाय का नाश कर देती है, स्पर्श किए जाने पर शरीर को पवित्र बनाती है, प्रणाम किए जाने पर रोगों का निवारण करती है, जल से सींचे जाने पर यमराज को भी भय पहुंचाती है, आरोपित किए जाने पर भगवान श्रीकृष्ण के समीप ले जाती है और भगवान के चरणों पर चढ़ाये जाने पर मोक्षरूपी फल प्रदान करती है, उन तुलसीदेवी को नमस्कार है। (पद्मपुराण)

गुणों के कारण यह कई अन्य नामों से भी जानी जाती हैं। जैसे — सुरसा (उत्तम रसवाली), ग्राम्या (गांवों में बहुलता से प्राप्त), सुलभा (हर जगह आसानी से प्राप्त), बहुमंजरी (अधिक फूलों वाली), देवदुंदुभी (देवताओं को आनन्द देने वाली), शूलघ्नी (व्याधियों को नष्ट करने वाली) आदि। इस प्रकार तुलसीजी की भक्ति मनुष्य के पापरूपी ईंधन को जलाने के लिए प्रज्वलित अग्निशिखा के समान है। वे जीवनमुक्त हैं; सबकी अभीष्ट हैं; और भुक्ति-मुक्ति देने वाली हैं।

पत्र-पत्र में देव विराजित रोग सभी करती है नाश।
तुलसी तुमको नित वंदन है, सभी तीर्थ का तुममें वास।।

श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए श्रीराधाजी द्वारा तुलसीसेवा-व्रत

एक बार रासेश्वरी राधा ने सम्पूर्ण धर्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ अपनी सखी चन्द्रानना से कहा — सखी! तुम श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए किसी देवता की ऐसी पूजा बताओ, जो परम सौभाग्यदायक, पुण्यवर्द्धक और मनोवांछित वस्तु देने वाली हो। तुमने गर्गाचार्यजी के मुख से शास्त्रचर्चा सुनी है, इसलिए तुम मुझे कोई व्रत या पूजन बताओ।

चन्द्रानना सखी ने कहा — राधे! श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए परमसौभाग्यदायक व्रत है — तुलसी की सेवा। तुम्हें तुलसी-सेवा का ही नियम लेना चाहिए क्योंकि जो प्रतिदिन तुलसी की नौ प्रकार से (नवधा — स्पर्श, ध्यान, नमन, दर्शन, नाम-कीर्तन, स्तवन, आरोपण, सेचन, तुलसीदल से भगवान का पूजन) भक्ति करते हैं वे कोटि सहस्त्र युगों तक अपने उस सुकृत्य का उत्तम फल भोगते हैं। अत: गोपनन्दिनी! तुम भी प्रतिदिन तुलसी का सेवन (पूजा) करो, जिससे श्रीकृष्ण सदा ही तुम्हारे वश में रहें।

चन्द्रानना सखी की बात सुनकर श्रीराधा ने श्रीकृष्ण को संतुष्ट करने वाले तुलसी-सेवा का व्रत आरम्भ किया। उन्होंने केतकीवन में अत्यन्त मनोहर तुलसी का मन्दिर बनवाया जिसकी दीवारें सोने से जड़ीं थी और किनारों पर पद्मरागमणि लगी थी, परकोटे पन्ने, हीरे, मोती से जड़े थे और भूमि चिन्तामणि से मण्डित थी। सुनहले चंदोवों, वैजयन्ती पताकाओं व ऊंचे तोरण से सजे उस तुलसी मन्दिर की शोभा इन्द्रभवन जैसी थी। तुलसी मन्दिर के मध्यभाग में श्रीराधा ने अभिजित् मुहूर्त में हरे पल्लवों वाली तुलसीदेवी को स्थापित किया और गर्गाचार्यजी द्वारा बताई गई विधि से आश्विन शुक्ल पूर्णिमा से चैत्र पूर्णिमा तक तुलसी-सेवा का व्रत लिया।

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व्रत प्रारम्भ करके उन्होंने प्रत्येक मास अलग-अलग रस से तुलसी को सींचा। कार्तिक में दूध से, मार्गशीर्ष (अगहन) में गन्ने के रस से, पौष में द्राक्षारस से, माघ में बारहमासी आम के रस से, फाल्गुन में मिश्री के रस से और चैत्रमास में पंचामृत से तुलसी का सिंचन किया। फिर वैशाख मास में इस व्रत के उद्यापन का उत्सव किया जिसमें दो लाख ब्राह्मणों को छप्पन भोग कराकर वस्त्राभूषण दिए। गर्गाचार्यजी को भी दिव्य मोतियों का एक लाख भार और सुवर्ण का एक कोटि भार दान किया। श्रीराधाजी की तुलसीसेवा देख देवतालोग उस तुलसी मन्दिर के ऊपर दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे। आकाश में देवताओं की दुन्दुभियां बजने लगीं और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। उसी समय स्वर्ण सिंहासन पर हरिप्रिया तुलसीदेवी प्रकट हुईं।

हरिप्रिया तुलसी का स्वरूप — हरिप्रिया तुलसी की अंगकान्ति श्यामवर्ण की है और उनकी अवस्था सोलह वर्ष की है। उनकी चार भुजाएं व कमलदल के समान विशाल नेत्र हैं। मस्तक पर हीरों का मुकुट व कानों में सोने के कुण्डल धारण किए हुए हैं। वे पीताम्बर पहने हुए हैं और केशों की बंधी नागिन जैसी वेणी में वैजयन्ती माला धारण किए हुए हैं। वे गरुड़ पर सवार हैं।

श्रीतुलसीदेवी ने गरुड़ से उतरकर श्रीराधा को अपनी भुजाओं से अंक में भर लिया और कहा — ’मैं तुम्हारे भक्तिभाव से प्रसन्न हूं। वास्तव में तो तुम पूर्णकाम हो, तुमने केवल लोकमंगल की भावना से यह व्रत किया है। यहां मन, बुद्धि और चित्त द्वारा जो-जो मनोरथ तुमने किया है, वह सब सफल हो और इसी प्रकार तुम्हारा परम सौभाग्य बना रहे।’ तब वृषभानुनन्दिनी श्रीराधा ने उनसे कहा — ’देवि! गोविन्द के युगल चरणारविन्दों में मेरी अहैतुकी भक्ति बनी रहे।’ तब तुलसीदेवी तथास्तु कहकर अन्तर्धान हो गयीं।

श्रीराधाजी की तुलसी-सेवा के रूप में की गयी तपस्या को जानकर उनके प्रेम की परीक्षा लेने के लिए एक दिन भगवान श्रीकृष्ण वृषभानुपुर में गये। उस समय उन्होंने अद्भुत गोपांगना (गोपदेवी) का रूप धारण कर लिया था। उनके पैरों में नुपुरों की झनकार, कटि में करधनी में लगी घंटियों की खनखनाहट, अंगुलियों में मुद्रिकाओं की अपूर्व शोभा, कलाइयों में रत्नजटित कंगन, बांहों में भुजबंद, कण्ठ व वक्ष:स्थल पर मोतियों के हार, बालरवि के समान चमकता शीशफूल, केशों मे वेणी, नासिका में हिलती हुई मोती की बुलाक और श्याम शरीर की दिव्य आभा उन्हें अद्भुत दिव्यता प्रदान कर रही थी।

राजा वृषभानु का महल खाई और परकोटों से घिरा था। चारों दरवाजों पर काजल की तरह काले गजराज झूमते थे। मायामयी गोपदेवी बने श्यामसुन्दर अन्त:पुर में प्रवेश करके उस आंगन में पहुंचे जहां करोड़ों चन्द्रों के समान कान्तिमयी, कोमलांगी एवं कृशांगी श्रीराधा धीरे-धीरे घूम रहीं थीं और अनेक सखियां फूलों की छड़ी लिए श्रीराधा के गुण गा रहीं थीं। उस मणिमय आंगन में उस नवीन गोपदेवी की तेजकान्ति देखकर श्रीराधा सहित सभी सखियां हतप्रभ रह गईं। जैसे चन्द्रमा के उदय होने पर तारों की कान्ति फीकी पड़ जाती है उसी प्रकार उस गोपदेवी की आभा से उस मणिमय आंगन की शोभा फीकी पड़ गयी। उस नवीन गोपदेवी का स्वागत करके श्रीराधाजी ने कहा — ’इस भूतल पर तुम्हारे समान दिव्य रूप का कहीं दर्शन नहीं होता। तुम अपने आगमन का कारण बताओ। तुम अपनी बांकी चितवन, सुन्दर दीप्ति, मधुर वाणी, मनोहर मुसकान, चाल-ढाल और आकृति से मुझे श्रीपति (नारायण) के समान दिखायी देती हो। तुम अपने निवासस्थान का संकेत प्रदान करो। तुम्हारी आकृति मेरे प्रियतम श्रीकृष्ण जैसी ही है अत: तुम मुझे बहुत प्रिय लगती हो।’

तब गोपदेवी बने श्रीकृष्ण ने श्रीराधा से कहा — ’हे कमलनयनी! गोकुल में नन्दभवन के पास मेरा निवास है। मेरा नाम ‘गोपदेवी‘ है। मैंने ललिता सखी के मुख से तुम्हारी रूप व गुणमाधुरी का वर्णन सुना है अत: मैं तुम्हें देखने तुम्हारे घर चली आई हूं। अब सन्ध्या हो गई है, अब मैं जाती हूँ, कल प्रात: फिर तुमसे मिलने आऊंगी।’ दूसरे दिन श्रीकृष्ण फिर गोपदेवी का वेष धरकर वृषभानुभवन गये। गोपदेवी को देखकर श्रीराधाजी तो बहुत प्रसन्न हुईं पर गोपदेवी (श्रीकृष्ण) दु:खी होने का नाटक करने लगे। श्रीराधा के पूछने पर गोपदेवी ने कहा — राधे! वरसानुगिरि की घाटियों में जो मनोहर संकरी गली है, उसी से होकर मैं दही बेचने जा रही थी। इतने में नंदकुमार श्यामसुन्दर ने मेरा मार्ग रोक लिया और कहा — ’गोपी मैं कर लेने वाला हूं। अत: कर के रूप में तू मुझे दही का दान दे।’ मेरे मना करने पर वह नंद का छोकरा दही की मटकी फोड़कर सारा दही पी गया और मेरी चादर उतार ली। इसलिए मैं अनमनी हो रही हूं।

हमारो दान देहो गुजरेटी।
बहुत दिनन चोरी दधि बेच्यो आज अचानक भेटी।
अति सतरात कहा धों करेगी बड़े गोप की बेटी।
कुंभनदास प्रभु गोवर्धनधर भुज ओढनी लपेटी।।

फिर गोपदेवी बने श्रीकृष्ण ने श्रीराधा से कहा — ’जात का ग्वाला, काला कलूटा रंग, न धनवान, न वीर, न सुशील और न सुरुप। ऐसे पुरुष के प्रति तुमने प्रेम किया है, यह ठीक नहीं। मैं कहती हूं, तुम आज से उस निर्मोही कृष्ण को अपने मन से निकाल दो।’ गोपदेवी के मुख से इतने कठोर वचन सुन कर श्रीराधा को बहुत विस्मय हुआ।

श्रीराधा ने गोपदेवी से कहा — सखी ! जिनकी प्राप्ति के लिए ब्रह्मा, शंकर आदि देवता, शुक, अंगिरा आदि ऋषि निरन्तर तप करते हैं, वही अजन्मा, परिपूर्ण देवता, लीलावतारधारी श्रीकृष्ण पृथ्वी का भार हरण करने के लिए यहां प्रकट हुए हैं; उन आदिपुरुष श्रीकृष्ण की निन्दा तुम कैसे कर सकती हो? तुम बड़ी ढीठ जान पड़ती हो। ग्वाले सदा गौओं का पालन करते हैं, गोरज की गंगा में नहाते हैं, रात-दिन गौओं के सुन्दर मुख का दर्शन करते हैं, गौओं के उत्तम नामों का जप करते हैं। मेरी समझ में तो इस भूतल पर गोप जाति से बढ़कर कोई जाति नहीं है। तुम उसे काला-कलूटा बताती हो। भगवान शंकर उन श्रीकृष्ण के श्यामवर्ण में मन लग जाने के कारण औरों के सुन्दर मुख को छोड़कर उस काले-कलूटे के लिए ही पागलों की भांति व्रज में दौड़ते-फिरते हैं। सिद्ध, मुनि, यक्ष, नाग, किन्नर भी जिनके चरणों में साष्टांग प्रणाम करके जिन्हें बलि (कर) समर्पित करते है, उन्हें तुम निर्धन कहती हो। पूतना, शकटासुर, अघासुर, तृणावर्त, बकासुर का वध, यमलार्जुन-उद्धार व कालियानाग दमन आदि क्या वीरता के परिचायक नहीं है? जो कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड के एकमात्र स्रष्टा व संहारक हैं, उन्हें यश की क्या आवश्यकता है? वे श्रीकृष्ण सुशील ही नहीं, समस्त लोकों के सुजन-समुदाय के चूड़ामणि हैं। वे अपने भक्तों के पीछे चलते हुए अपने रोम-रोम में स्थित लोकों को पवित्र करते रहते हैं और भजन करने वालों को वे भगवान मुकुन्द मुक्ति तो अनायास ही दे देते हैं।

तब गोपदेवी ने कहा — यदि तुम्हारे बुलाने से परमेश्वर श्रीकृष्ण यहां आ जाएं और तुम्हारी बात का उत्तर दें, तब मैं मान लूंगी कि तुम सच कह रही हो। श्रीराधाजी तुरंत उठकर आसन पर बैठकर श्रीकृष्ण का ध्यान करने लगीं। श्रीकृष्ण ने देखा — ’प्रियतमा श्रीराधा मेरे दर्शनों के लिए उत्कण्ठित है और उनका अंग-अंग पसीने से भर गया है, मुख पर आंसुओं की धारा बह चली है।’ ऐसा देखकर वे पुरुष रूप धारणकर सहसा सखियों के समक्ष ही प्रकट हो गए। श्रीकृष्ण ने कहा — ’हे चन्द्रवदने! जैसे ही मैंने सुना कि तुम कह रही हो कि ‘प्रियतम कृष्ण आओ’ मैं अपने गोकुल, गोपवृन्द को छोड़कर यमुनातट और वंशीवट से दौड़ता हुआ तुम्हारी प्रसन्नता के लिए यहां आ पहुंचा हूं। कोई सखीरूपधारणी मायाविनी तुम्हें छलने के लिए आई थी, मेरे आते ही वह यहां से चली गयी, तुम्हें उन पर विश्वास नहीं करना चाहिए।’ श्रीराधा प्रियतम श्रीकृष्ण को देखकर उनके चरणों में प्रणाम कर परमानन्द में निमग्न हो गईं और उनका मनोरथ पूरा हो गया।

नमामि शिरसा देवीं तुलसीं विलसत्तनुम्।
यां दृष्ट्वा पापिनो मर्त्या मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषात्।।
(श्रीपुण्डरीककृत तुलसीस्त्रोत)

मैं प्रकाशमान विग्रहवाली भगवती तुलसी को मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूं, जिनका कि दर्शन करके पातकी मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं।

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