व्रज एवं व्रजरज

यथा भागवतं श्रेष्ठं शास्त्रे कृष्णकलेवरम्।
तथैव पृथिवीलोके सवनं व्रजमण्डलम्।। (व्रजभक्तिविलास)

सन्त गोस्वामी नारायणभट्टजी कहते हैं — ’जैसे शास्त्रों में श्रेष्ठ श्रीमद्भागवत भगवान श्रीकृष्ण का वांग्मयविग्रह है, वैसे ही पृथ्वीलोक में वनों सहित व्रजमण्डल भी श्रीकृष्ण का ही स्वरूप है।’

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श्रीगिरिराज तलहटी में बन्दर[/caption]

श्रीराधामाधव एवं उनके सखा एवं गोपियों की नित्य लीलाओं को जहां आधार प्राप्त हुआ उस धाम को रसिकों, भक्तों ने व्रजधाम या व्रजमंडल कहा है। पाँच हजार वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीराधाजी, ललिता, विशाखा आदि अष्टसखियों, गोप-गोपियों, श्रीयमुनाजी, और पवित्र गौओं के साथ इस दिव्य भूमि में विचरण किया था। यही गोकुल, नन्दगांव व वृन्दावन है, जहां सर्वत्र कण-कण में श्रीकृष्ण के स्वरूप का दर्शन पाकर भाव-विभोर हुए ब्रह्माजी अपने नयनाश्रुओं से यहां के रजकणों (धूल) का अभिषेक करने के लिए बाध्य हुए थे। सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी श्रीमद्भागवत में स्वयं कहते हैं —

‘इस धरातल पर व्रज में और उसमें भी गोकुल में किसी कीड़े-मकोड़े की योनि पाना ही परम सौभाग्य है, जिससे कभी किसी व्रजवासी की चरणरज से मस्तक को अभिषिक्त होने का सौभाग्य मिले।’

भगवान शंकर अपने इष्ट का दर्शन पाने के लिए ही यहां आठ स्वरूपों में (बूढ़े बाबा, भूतेश्वर, गोकर्णेश्वर, कामेश्वर, गोकुलेश्वर, उत्तरेश्वर, चक्रेश्वर एवं गोपेश्वर) स्थान-स्थान पर प्रतिष्ठित हुए हैं। साथ ही योगीन्द्र शिव गोपी रूप धारणकर वंशीवट में महारास में सम्मिलित हुए थे —

‘नारायन’ ब्रजभूमि कौं को न नवाबै माथ।
जहाँ आप गोपी भए श्रीगोपेस्वर नाथ।।

पद्मपुराण में वर्णन है कि इस प्रेमरस को प्राप्त करने के लिए भगवान शंकर ने जब श्रीकृष्ण से प्रार्थना की तब उन्होंने शंकरजी को द्वापरयुग में व्रज आने की सलाह दी। भगवान श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार शंकरजी व्रज में आए और श्रीराधाकृष्ण का दर्शन कर प्रेममग्न हुए।

पार्वतीजी यहां कात्यायनीजी के रूप में केशवधाम वृन्दावन में निवास करती हैं। साक्षात् लक्ष्मी इसकी प्राप्ति के लिए यहां तपोवन में तपस्या कर रही हैं। महात्मा अक्रूर यहीं इस ब्रजरज में प्रेम-विह्वल होकर लोटने लगे थे। श्रीकृष्ण के अभिन्न सखा ज्ञानी उद्धव भी इस व्रजधाम में गुल्मलता अथवा तृण हो जाने में अपना सौभाग्य समझते थे। क्यों न समझें? परब्रह्म यहां कण-कण में ‘ब्रजन्’ करता है मतलब यहां व्याप्त रहता है। परब्रह्म की इसी व्याप्ति के कारण यह व्रज है। यहां की भूमि चिन्तामणिमय है। यहां के नग, खग, मृग, कुंज, लता आदि काल के प्रभाव से अतीत और दिव्य-स्वरूप हैं। यहां के रजकणों के समान तो वैकुण्ठ भी नहीं है क्योंकि यहां की भूमि का चप्पा-चप्पा श्रीप्रिया-प्रियतम (श्रीराधाकृष्ण) के चरणचिह्नों से मण्डित है। श्रीयुगलजोड़ी के प्रेमसिन्धु का अद्भुत रस यहां कण-कण में रचा-बसा है। उनके दिव्य-अंगों के सौरभ (खुशबू) से यहां की दिशाएं सुवासित हैं। उनके वेणुनाद का माधुर्य यहां जड़-चेतन सभी को मदमस्त कर रहा है। देवगण इसी रस के लिए सदा लालायित बने रहते हैं। व्रजमण्डल की यह भूमि ऋषि-मुनियों, संत-महात्माओं व विभिन्न सम्प्रदायों के आचार्यों की भी वंदनीय रही है। स्वयं ब्रह्मा, शिव, सूर्य, सप्तऋषि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, दुर्वासा, नारद , सौभरि, पिप्पलाद, जमदग्नि, परशुराम, गौतम, पाराशर, व्यास, शुकदेव एवं अम्बरीष आदि मुनियों ने इसी व्रज के चौरासी कोस को अपनी तपस्थली बनाया।

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कात्यायनीजी [/caption]

श्रीचैतन्यमहाप्रभु लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व व्रज मे आए और उन्होंने राधाकुण्ड को प्रकट किया और अपने प्रिय शिष्यों — रूपगोस्वामी और सनातन गोस्वामी को व्रज-निवास के लिए प्रेरित किया। पुष्टिमार्ग के आराध्य श्रीनाथजी यहां श्रीगिरिराजजी की तलहटी में प्रकट हुए और पुष्टिमार्ग के प्रतिष्ठाता श्रीवल्लभाचार्यजी भी व्रज में आए और उन्होंने ब्रज-चौरासी कोस की परिक्रमा की परम्परा चलाई जो आज भी चल रही है। वृन्दावन में स्वामी हरिदासजी ने बिहारीजी को और श्रीहितहरिवंशजी ने श्रीराधावल्लभजी को प्रकट किया। मीराबाई भी कई वर्षों तक व्रज में रहीं। सूरदासजी, अष्टछाप के कवि, नामदेवजी आदि का आधार तो यह व्रजभूमि ही है।

कहा जाता है कि गोवर्धन की तलहटी में जो बन्दर हैं वे भी संत-महात्मा हैं जो वर्षों से कृष्ण-तत्त्व को पाने के लिए गोवर्धन में वास कर रहे हैं। ये बन्दर परिक्रमार्थियों द्वारा दी गई खाने की वस्तु ले लेते हैं पर किसी भी व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं पहुँचाते हैं।

वृन्दावन के जो वृक्ष हैं, वे महात्मा हैं और साधना में लीन हैं। निधिवन और सेवाकुँज के वृक्ष तो साक्षात् गोपीरूप ही हैं। और आज भी श्रीबिहारीजी और श्रीराधाजी की दिव्य लीलाओं के साक्षी हैं।

वृन्दावन के वृक्ष को मरम न जाने कोय।
डाल-डाल और पात-पात पर राधे-राधे होय।।

इस सम्बन्ध में एक बहुत ही सुन्दर प्रसंग है — स्वामी हरिदासजी निधिवन में ठाकुर श्रीबांकेबिहारीजी की भजन सुनाकर सेवा करते थे। एक दिन जीव गोस्वामी ने श्रीहरिदासजी से कहा — ’सबके पास ठाकुर है आपके पास नहीं।’ कहा जाता है कि स्वामी हरिदास ठाकुर-ठकुरानी (श्रीराधाकृष्ण) की स्तुति करने लगे। तभी दोनों उनकी दोनों हथेलियों पर आ विराजे और थिरकने लगे, साथ ही स्वामीजी भी थिरकने लगे। इतने में दोनों विग्रह मिलकर एक हो गए। वही बांकेबिहारी हुए। बांकेबिहारी की छवि ऐसी है कि कभी उसमें से राधा झाँकती दिखाई पड़ती है, कभी स्यामसुन्दर। श्रीबांकेबिहारीजी का प्राकट्य मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी संवत् 1562 को हुआ।

BIHARIJI

व्रज का सर्वस्व श्रीकृष्ण के लिए है। कोई भी अपने लिए कुछ नहीं चाहता, सब कुछ कृष्ण के लिए है। व्रज के कण-कण में कृष्ण व्याप्त हैं; चाहे वह जड़ हो या चेतन। गिरिराज पर्वत, कृष्णप्रिया यमुना, कदम्ब के पेड़, करील की कुँजें, यमुनाजी के तट सभी कुछ कृष्णप्रेम से ओतप्रोत हैं। माधुर्य तो यहां प्रत्यक्ष होकर विहार करता है।

भगवान के भी इतने अटपटे नाम (कनुआ, कान्हा, लाला, माखनचोर, नटवरनागर) सुनने में मिलते हैं कि लगता है चाशनी में घोल दिए हों। नागरीदासजी का एक पद —

ब्रज-सम और कोउ नहिं धाम।
या ब्रज में परमेसुरहूके सुधरे सुंदर नाम।।
कृष्ण नाँम यह सुन्यो गर्ग तें, कान्ह-कान्ह कहि बोलैं।
बालकेलि रस मगन भये सब, आनँदसिंधु कलोलैं।।

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की यहां कुछ भी पूछ नहीं है, बल्कि ब्रह्मज्ञानियों की तो यहां दुर्गति ही समझो।

चारि पदारथ करत मजूरी, मुक्ति भरै जहँ पानी।
करम, धरम दोउ बटत जेंवरी, घर छावैं ब्रह्मग्यानी।।

ज्ञानी उद्धव ने भी योगसाधना के लिए गोपियों को उपदेश देना चाहा पर गोपियां श्रीकृष्ण के विरुद्ध एक शब्द नहीं सुनना चाहतीं, और उद्धव को ही खरी-खोटी सुनाती हैं। उद्धव मुँह की खाकर सबक लेकर लौटे —

ऊधौ जू ! जोग की रीति कहौ,
हम जोग ना दूजो वियोगतें जानैं।।

श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण ऐसे भक्तों के लिए कहते हैं कि — ‘उनकी चरणरज से अपने को पवित्र करने के लिए मैं सदा उनके पीछे-पीछे घूमा करता हूँ।’

जिसे ऋषि-मुनि, वेद-पुरान सारा ब्रह्माण्ड ढूँढ रहा है, वही ब्रह्म व्रज के निकुंज वनों में श्रीराधा के पैरो को पलोट रहा है —

ब्रह्म में ढूँढ्यौ पुरानन गानन, बेद-रिचा सुनि चौगुने चायन।
देख्यो सुन्यो कबहूँ न कितै, वह कैसे सरूप औ कैसे सुभायन।।
टेरत हेरत हारि पर्यौ, रसखानि, बतायो न लोग-लुगायन।
देखौ, दुर्यौ वह कुंज-कुटीर में बैठ्यौ पलोटत राधिका-पायन।। (रसखानि)

शेष, महेश, गणेश, सुरेश इस मजे को क्या जानें। वे जिस परब्रह्म को पाने के लिए रात-दिन नाक रगड़ते रहते हैं, वही सलौना श्यामसुन्दर व्रज में छाछ रूपी प्रेमरस को पाने के लिए अहीर की छोकरियों (ग्वालिनों) के इशारों पर नाचता है —

सेस, महेस, गनेस, दिनेस,
सुरेसहू जाहि निरन्तर गावैं।
जाहि अनादि, अनन्त, अखण्ड,
अछेद, अभेद, सुबेद बतावैं।।
नारद-से सुक ब्यास रटैं,
पचिहारे, तऊ पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ,
छछियाभरि छाछ पै नाच नचावैं।। (रसखानि)

व्रज की इस मिठास का रसास्वाद तो वे ही रसिक कर सकते हैं जिनके हृदय में अपने श्यामसुंदर, रंगीले-छबीले बनवारी, बांकेबिहारी के प्रति दृढ़ अनुराग व विश्वास हो और जो ‘आठहु सिद्धि नवो निधि को सुख नंद की गाइ चराइ बिसारौं’ के लिए तैयार हो। ऐसी ही अपनी इच्छा ब्रज के एक रसिक संत श्रीललितकिसोरीजी ने व्यक्त की है —

‘कब मैं श्रीवृंदावन में कदम्बकुँज बनूंगा जिसकी छांह में लाड़िलेलाल श्रीकृष्ण विहार करते हैं। कब मैं श्रीयमुनातट पर किसी वृक्ष की डाल होऊंगा जिस पर लाड़िलेलाल श्रीकृष्ण झूला झूलते हैं। कब मैं कालीदह की ठंडी समीर बनूंगा जहां लाड़िलेलाल श्रीकृष्ण के खेलते समय मैं उनके श्रीअंग का स्पर्श कर सकूंगा जिससे उनके नूतन वस्त्र उड़ें। कब मैं गहवरवन की गलियों में चकोर बन कर श्रीयुगल जोड़ी के सुन्दर मुख का दर्शन कर सकूंगा।’

यहां तक कि पशु-पक्षी बनकर भी वे व्रज में ही रहने की इच्छा रखते है — कोयल बनकर यमुनातट और गहवरवन में कुहू-कुहू करता रहूँ। भँवरा बनकर श्रीश्यामसुंदर के चरणों में मधुर गुंजार करता रहूँ। कुत्ता बन के व्रज की गलियों में घूम-घूम कर संतों की जूठन का प्रसाद पाऊँ। श्रीललितकिसोरीजी की तो यही अभिलाषा थी कि वह व्रजरज को छोड़कर कहीं भी न जाएं। उनकी अंतिम समय की अभिलाषा भी अत्यन्त सुन्दर और कितनी अनोखी है —

कदम की छांह हो, यमुना का तट हो,
अधर मुरली हो, माथे पर मुकुट हो।
खड़े हों आप, इक बांकी अदा से,
मुकुट झोके में हो, मौजे हवा से।
गिरै गरदन, ढुलक कर, पीतपट पर,
खुली रह जायें आंखें ये मुकुट पर।।

संत रसखानि की कृष्ण-प्रेम प्राप्त करने की कैसी मधुर अभिलाषा है; वे कहते हैं कि यदि अगले जन्म मैं मेरा मनुष्य के रूप में जन्म हो तो व्रज में गोकुल का ग्वाला बनूँ। यदि पशु का जन्म हो तो नंदबाबा की गायों के बीच में ही चरने जाऊँ। पत्थर का जन्म हो तो गिरि-गोवर्धन का पत्थर बनूँ और पक्षी का जन्म हो तो यमुनातट पर कदम्ब के वृक्ष की डालियों पर ही बसेरा करूँ —

मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन।।
पाहन हो तो वही गिरि को, जो धर्यौ कर छत्र पुरन्दर-धारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन।।

भक्त ही नहीं, भगवान श्रीकृष्ण भी द्वारका जाने के बाद इस व्रज की याद में कितने अधीर हो उठते हैं। श्रीकृष्ण उद्धवजी से कहते हैं —

ऊधौ ! मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।
बृंदाबन-गोकुल-सुधि आवति, सघन तृननि की छाँहीं।।

श्रीकृष्ण आगे कहते हैं —

सुन ऊधौ ! मोहि नैक न बिसरत वे ब्रजवासी लोग।
हम उनकों कछु भली न कीनी, निस-दिन दियौ वियोग।।
जदपि यहाँ बसुदेव-देवकी, सकल राजसुख भोग।
तद्धपि मनहिं बसत बंसीवट, ब्रज जमुना-संयोग।।
वे उत रहत प्रेम-अवलंबन, इतते पठयौ जोग।
‘सूर’ उसाँस छाँड़ि, भरि लोचन, बढ़ो बिरह-जुर-सोग।।

व्रज की याद करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं — ग्वाल बालों के संग वन में भोजन करना, गाय चराना, गायों का चरते हुए दूर जाने पर उनको नाम लेकर पुकारना आदि बातों को सोचकर उद्धव मेरे नेत्र फड़कने लगते हैं। गुंजामाला पर यहां की गजमुक्ताओं की माला भी न्यौछावर है। वो कुँजों मे घूमना, व्रज में गोबर की गन्ध और गोष्ठ (गौशाला) के सामने द्वारिका के ऊंचे-ऊंचे मणिमय महल भी मुझे अच्छे नहीं लगते। इस व्रज की सुध आते ही मेरा हृदय धड़कने लगता है और प्राणों में हूक सी उठने लगती है।

व्रज में आज भी किसी-न-किसी रूप में श्रीकृष्ण का अस्तित्व है, उन्होंने स्वयं कहा है — ’वृन्दावनं परितज्य पादमेकं न गच्छति’ अर्थात् ’व्रज को छोड़कर एक पग जाना भी मेरे लिए सम्भव नहीं।’ व्रज में कृष्ण की आत्म-परमात्ममिलन की लीला सदा से होती रही है और कब तक होगी — यह कहना सम्भव नहीं है। आत्मा में रमण करने वाले परमात्मा की यह प्रेमलीला कृष्ण और राधा के रूप में दर्शित होती है। कृष्ण की आत्मा राधा है और राधा ही कृष्ण हैं। परब्रह्म के प्रेमरूप का दर्शन व्रज में ही सम्भव है। आज भी ब्रजवासियों की यही मान्यता है कि लाला (श्रीकृष्ण) भी यहीं है और लाली (श्रीराधाजी) ही श्रीवृन्दावन की धरती बन गई है, लाला इस धरती को छोड़कर जाएंगे कहाँ? अक्रूर के साथ जो गए वे विष्णु के वैभवशाली चतुर्भुजरूप थे। वह किशोर चपल बालक तो श्रीवृन्दावन में ही रह गया। आज भी भक्त लोग व्रजरज में लोट-लोटकर (ढंडौती परिक्रमा लगाकर) उसको कण-कण में ढूंढ़ने का प्रयास करते हैं। लाखों लोग हर मौसम में श्रीगिरिराजपर्वत की परिक्रमा लगाते हैं। वृन्दावन की परिक्रमा भी अनेक भक्त रोज लगाते हैं। इसके अलावा सम्पूर्ण व्रज की चौरासी कोस की परिक्रमा भी लगती है। इन परिक्रमाओं में भक्त राधेकृष्ण नाम का जप करते हुए चलते हैं और व्रजरज को अपने मस्तक पर लगाकर अपने को भाग्यशाली समझते हैं।

धनि यह बृंदाबन की रेनु।
नंद-किसोर चरावत गैयाँ, मुखहिं बजावत बेनु।
मन-मोहन कौ ध्यान धरैं जिय, अति सुख पावत चैनु।
चलत कहाँ मन और पुरी तन, जहाँ कछु लैन न दैनु।
इहाँ रहहु जहँ जूठनि पावहु, ब्रजवासिनि कैं ऐनु।
सूरदास ह्याँ की सरबरि नहि, कलपबृच्छ सुर-धैनु।। (सूरसागर)

सूरदासजी कहते हैं कि वृन्दावन की रेणु (रज) धन्य है क्योंकि इसमें नन्दनंदन ने गाय चराईं और बंशी बजाई। अब और कहीं जाकर क्या करना? मैं तो यहीं व्रज में रहकर व्रजवासियों की जूठन प्रसाद पाना चाहता हूँ।

इस व्रजरज के पवित्र रजतकण मानो मुक्ति को भी मुक्त करने वाले हैं। नागरीदासजी के शब्दों में —

मुक्ति कहै गोपाल सों, मेरी मुक्ति बताय।
ब्रजरज उड़ि मस्तक लगै, मुक्ति मुक्त ह्वै जाय।।

भगवान श्रीकृष्ण यशोदामाता को सत्य ही कहते हैं कि माँ ! मैंने माटी नहीं खायी अर्थात् यह माटी नहीं यह तो व्रजरज है। जिन भक्तों ने अपनी सारी भावनाएं और सारे कर्म समर्पित कर रक्खे हैं, वे मेरे लिए प्रणम्य हैं, यह तो मेरे भक्तों की चरणरज हैं और स्वयं उसे मुख में रखकर कृतज्ञता प्रकट करते हैं। वास्तव में यह भगवान की भक्तवत्सलता ही है। आज भी अनेक भक्त श्रीगिरिराजजी और वृन्दावन की व्रजरज अपने पूजागृह में रखते हैं और भवरोगों की इस औषधि को मस्तक पर धारण करते हैं।

व्रज की हवा में भी भक्ति घुली है। तभी एक कवि श्रीमुकुन्द गोस्वामी ने क्या खूब कहा है —

ब्रजबयार ! तुम सी उदार तो सुनी जगत में कहीं न अन्य।
हरिपदरज के महादान से क्या न करोगी मुझको धन्य।।
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