رسالة إلى شاعر في قبره!

تمام السيد يكتب لـ عربي21: رسالة إلى شاعر في قبره!

ماذا عساك أن تقول.. والموت يمتلك القلوب؟ 
 ماذا عساك أن تبوح.. وبلادنا اليوم تنوح؟ 
 وشعبنا العربي يُقهر.. وصوتنا الأبي يُدفن،
 في سجون أو لحود..! 
 
 يا سيدي، ماذا ستنبئ.. والصمتُ يقتل كل دِين؟ 
 والجبنُ يهدم كل جيل.. والعجزُ يحتل الوجوه!
 ماذا عساك أن تقول؟ 
 أتراه ينطلق اليراع، أم هل يولي دون قيل!
 فالحادثات مهولةٌ.. يا ويلنا أين المصير؟ 
 
 أنا يا سيدي لي همسة ٌفي حالنا هذا المصاب! 
 أنا يا سيدي لي غضبةٌ في عرضنا، هل من نصير؟ 
 قتلٌ يُباح، وينتهك عرضٌ.. فأين هم الأباة؟ 
 العُرب بات مهددا في دينه، أين الحماة؟ 
 قرآننا لا ينتهك.. فالله أقسم أن يحفظه 
 حبيبنا لا يُنتقص.. فالله قد عصم الرسل 
 ماذا عساك أن تقول؟ 
 زمنَ الوقاحة والجحود..! 
 
 يا سيدي نم هانئا واحذر.. فلا تلحظْ بطرفِك من وراء 
 كي لا تمسَّك نارُ ذلٍ أو هوان أو سواء.. 
 نم يا سيدي.. فرفاتك المحفوظ صاح:
 
 هذا زمان الهُزء والذبح المباح.. 
 زمنَ الوقاحة والنذالة والقتل الصُراح..!
 لكنّ صمتا دائما لا يُستطاع .. 
 فثورة الأُسْد الغضاب قد ابتدت..
 وحربنا قد انبرت.. 
 لكنها لا لن تكون.. حربَ حزيرانَ الكلمات.

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