मुमुक्षुता की भूमिका — भाग 2/3

श्रीमद् राजचंद्रजी ने अपने काव्य ‘इच्छे छे जे जोगिजन’ में मुमुक्षुता की तीन भूमिकाएँ लिखी है। उन्हीं तीन भूमिकाओं के लक्षणों को समझाते हुए श्री बेन प्रभु इन ३ लेखों की शृंखला से हमें कुछ महत्वपूर्ण शब्द समझाते हैं । यह लेख दूसरी भूमिका पर आधारित है।
{ लेख का पहला भाग पढ़िए }

मनुष्य जीवन का अनमोल सुअवसर मिलना तभी सार्थक है जब इस जीवन में मोक्ष अनुभव की यात्रा का आरम्भ हो या अंत हो। सभी धर्म संप्रदाय मोक्ष की प्राप्ति के प्रयत्न का ही मार्ग बताते हैं परंतु लक्ष्य की दृढ़ता-स्पष्टता-सुनिश्चितता के अभाव में या तो जीव मार्ग में ही उलझ जाते हैं या मोक्ष के नाम पर संसार में ही भटकते है। स्मरण रहे, मोक्ष कोई भूगोलिक स्थान का नाम नहीं है, मोक्ष यानि ‘निज शुद्धता’।

मोक्ष यानि निज शुद्धता

मनुष्य में राग, द्वेष व अज्ञान की जो परतें है उसी के कारण स्वयं की ‘निज शुद्धता’ का अनुभव नहीं हो रहा है। मोक्ष कहीं से लाना या कहीं पर जाना नहीं है परंतु स्वयं में रही राग, द्वेष, अज्ञान की परतों को हटाना है। ज्यों-ज्यों ये परतें गिरती जाती है त्यों-त्यों स्वयं में रही निज शुद्धता प्रकटती जाती है।जब ज्ञान और राग के बीच का भेद स्पष्ट होता जाता है तभी यह सुनिश्चिता होती है कि राग आदि क्षणिक भाव मेरे नहीं है परंतु मैं तो सत्-चित्-आनंद स्वरूप ही हूँ। इस प्रकार जो व्यवहार शुद्धि से क्रमिक विकास करते हुए निज शुद्धता के अनुभव के मार्ग पर चलता है — वह मुमुक्षु कहलाता है। इसलिए मुमुक्षु कोई धर्म सम्प्रदायों के क्रिया-काण्ड में उलझा व्यक्ति नहीं है अपितु मुमुक्षु वह है जो स्वयं के भीतर रहे राग द्वेष आदि परिणामों को पहचान कर उनसे निवृत होकर निज शुद्धता प्रकट करने में संलग्न है।

स्वयं में रही मुमुक्षुता के लक्षणों को पहचानने व उघाड़ने के लिए हम मुमुक्षुता की तीन भूमिकाओं की चर्चा श्रीमद् राजचंद्र जी द्वारा रचित लघु काव्य के आधार पर कर रहे हैं। शास्त्रों में कथित जघन्य पात्रता यानि मुमुक्षु की प्रथम भूमिका का वर्णन पिछले लेख में हुआ। अब इस लेख के अंतर्गत मुमुक्षुता की दूसरी भूमिका के लक्षण समझ कर अपने भीतर देखना होगा कि निज शुद्धता के इस अंतर मार्ग पर हम कितने क़दम चले हैं।

दूसरी भूमिका (मध्यम पात्रता)

श्रीमद् राजचंद्र जी द्वारा रचित काव्य में मुमुक्षु की दूसरी भूमिका का वर्णन करते हुए वह लिखते हैं कि -

रोकें शब्दादिक विषय, संयम साधन राग।
जगत इष्ट नहीं आत्म से, मध्य पात्र महाभाग्य ।।

रोकें शब्दादिक विषय — मनुष्य के पास पाँच इंद्रियों की महत्वपूर्ण संपत्ति है। प्रत्येक इन्द्रिय के अपने अपने विषय हैं जैसे कान का विषय है सुनना, आँख का विषय है देखना, जीभ का विषय है चखना इत्यादि। इन इंद्रियों और इसके विषयों का उपस्थित होना हमारे मोक्ष में न ही साधक है और न ही बाधक है। परंतु इनके अनुचित उपयोग के कारण ही हमें यह इंद्रियाँ मोक्ष मार्ग पर बाधक लगती है। मुमुक्षु वह होता है जो अपनी इंद्रियों के विषयों का मालिक होता है। मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होने के लिए कान को क्या सुनना, आँख से क्या देखना और जीभ से क्या चखना इसका निर्णय जब मनुष्य के विवेक से उठता है तब मुमुक्षुता की दूसरी भूमिका आरम्भ होती है। मनुष्य का मन इन इन्द्रिय-विषयों के इतने आधीन है कि जब भी यह विषय संसार की ओर भागते हैं तब उन पर अंकुश लगाना नामुमकिन सा लगता है। परंतु प्रथम भूमिका का आधार ठोस होने के कारण अब इन्द्रिय विषयों की ग़ुलामी और परतंत्रता टूटती है और इन्द्रिय विषयों का ग्रहण मनुष्य के विवेक के आधार पर होता है, आदतों की ग़ुलामी के कारण नहीं।

“कान को क्या सुनना, आँख से क्या देखना और जीभ से क्या चखना इसका निर्णय जब मनुष्य के विवेक से उठता है तब मुमुक्षुता की दूसरी भूमिका आरम्भ होती है।”

संयम साधन राग — मनुष्य की अधिकांश शक्ति इन्द्रिय-विषयों की ग़ुलामी को भोगने या उनसे संघर्ष करने में ही नष्ट हो जाती है। जीवन में इंद्रियों के माध्यम से आवश्यक कर्म करने अनिवार्य है परंतु विषयों का दासत्व होने से अनावश्यक, व्यर्थ कर्मों को करने में ही शक्ति का ह्रास होता है। इससे विपरीत जब शब्दादिक विषयों की मालिकी प्रकटती है तो मुमुक्षु अपने भीतर शक्ति की मात्रा की अधिकता महसूस करता है। चूँकि भीतर मुमुक्षुता की भूमि तैयार है इसलिए इस शक्ति का स्वाभाविक बहाव संयम को पुष्ट करने वाले साधनों के प्रति ही होता है। दूसरी भूमिका में प्रविष्ट हुआ मुमुक्षु अनुभव करता है कि संयम मार्ग पर आश्रय रूप साधन जैसे की सत्संग, समागम, स्वाध्याय, भक्ति, ध्यान, तप, त्याग आदि के प्रति मन में सहज ही आकर्षण है। इन साधनों में रस-रुचि-एकाग्रता-लीनता आदि भी क्रमशः बढ़ते जाते हैं — यह मुमुक्षु की दूसरी भूमिका का प्रमाण है।

जगत इष्ट नहीं आत्म से — शब्दादिक विषयों की मालिकी और संयम के साधनों के प्रति राग प्रकटने से यह मुमुक्षु, जगत में रह कर सभी कर्तव्य कर्म करता है परंतु स्वयं के आत्मा होने की दृढ़ प्रतीति भीतर होती है। यह आत्मा होने की दृढ़ प्रतीति क्या? मुमुक्षु किसी भी प्रसंग में इतना सजग होता है कि संसार के कार्य करते हुए भी निज शुद्धता पर राग-द्वेष-अज्ञान के आवरण नहीं आने देता। यदि यह भाव उठते भी हैं तो विवेक बल से उन्हें तत्काल ही हटाता है। यह मुमुक्षु क्षण-क्षण में, कार्य-कार्य में, प्रसंग-प्रसंग में आत्मशुद्धि के प्रति जागृत होता है जिसके परिणाम स्वरूप आत्म-रस की पूर्व प्रतीति आनंद व शांति की संवेदना के रूप में उसमें उठने लगती है। यह अपूर्व संवेदन मुमुक्षु की मध्यम पात्रता को सुदृढ़ करते हैं और मनुष्य का मोक्ष-मार्ग के प्रति का बाह्य-अंतर उल्लास दिन प्रतिदिन बढ़ता जाता है।

इस प्रकार मध्यम भूमिका में मनुष्य की अपने इन्द्रिय विषयों और मन के ऊपर मालिकी आती है, संयम के साधनों के प्रति आकर्षण होता है और अंततः जगत में रहते हुए ही निज शुद्धता के प्रति सावधान होता है। इस भूमिका के अंदर सात्विक आनंद जब भीतर से उठता है तो राग द्वेष आदि परिणामों से मुड़ना सुलभ हो जाता है।

– श्री बेन प्रभु


श्रीमद् राजचंद्रजी के अन्य वचनामृत पर श्री बेन प्रभु के सत्संग –

See complete playlist here: https://www.youtube.com/playlist?list=PLuCukL6BJnFh1CBECQrgibUqfvPjTn10v

One clap, two clap, three clap, forty?

By clapping more or less, you can signal to us which stories really stand out.