स्वतंत्रता की ओर चार कदम

Artwork dedicated by Tanvi Shah | © Shrimad Rajchandra Mission, Delhi, 2018

August के महीने में जब पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारियाँ चलती है और हर प्रांत अलग अलग ढंग से स्वतंत्रता का उत्सव मनाता है वहीं मुझमें भी यह प्रश्न उठता है कि स्वतंत्रता यानि क्या? सरहद के इस पार हम जन्में हैं तो हम 15 August को स्वतंत्रता दिवस मानते हैं और यदि हम उस पार जन्मे होते तो 14 August को यह उत्सव मनाते। यदि हम अमेरिका में जन्मे होते तो 4 July को आज़ादी का उत्सव मनाते और यदि हम कनाडा में जन्मे होते तो 1 July को स्वतंत्रता दिवस मानते।

अध्यात्म की मेरी इस यात्रा में यह सुनिश्चित हुआ है कि जो कुछ भी बदलता है वह मैं नहीं हूँ। मैं वही हूँ जो सदा से था, सदा है और सदा के लिए रहेगा। तो वास्तविक स्वतंत्रता भी वही है जो सदा से थी, सदा है और सदा रहेगी। किसी देश में जन्म ले कर वहाँ के स्वतंत्रता उत्सव को मानना और मनाना यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है पर स्वतंत्रता के सम्पूर्ण पहलू को समझ का स्वतंत्रता की ओर चार कदम उठाने का प्रयास मात्र मनुष्य जीवन में ही हो सकता है।

स्वतंत्रता उत्सव का स्वरूप

जो भी तंत्र स्वयं की ओर ले जाए उसका उत्सव मनाना स्वतंत्रता उत्सव है। अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ते हमारे जीवन उत्सव-विरोधी कदापि नहीं है परंतु हम ऐसे उत्सव मनाने में उत्सुक होते हैं जो हमारे जीवन में कुछ मूल्य-वृद्धि (value addition) करें। एक दिन का उत्सव और फिर वही अनुत्साह और निराशा यह अध्यात्म पथ के साधक की जीवन शैली नहीं होती। हम तो उस तंत्र का उत्सव मनाते हैं जो हमें ‘स्व’ की अनंत, शाश्वत सत्ता से जोड़े और ऐसे जोड़े कि हमारा अस्तित्व ही उसी रूप हो जाए।

स्वतंत्रता — वैकल्पिक या अनिवार्य ? (optional or mandatory?)

प्रत्येक मनुष्य की खोज एकांत स्वतंत्रता ही है। स्वतंत्रता यानि किसी की ग़ुलामी में नहीं रहने की इच्छा। चाहे वह शारीरिक ग़ुलामी हो या मानसिक या सामाजिक परंतु यह निश्चित है कि मनुष्य को ग़ुलामी से घृणा है क्योंकि ग़ुलामी में शोषण की अनुभूति होती है। मनुष्य के भीतर कुछ ऐसा तत्त्व है जो जानता है कि मैं स्वयं में परिपूर्ण हूँ तो दूसरों की ग़ुलामी में क्यों रहूँ? विवशता बस यही है कि वह परिपूर्ण तत्त्व क्या है और कैसा है — इस समझ से मनुष्य अनजान है। इसी अज्ञान के कारण वह वस्तु, व्यक्ति, स्थिति का संग्रह तो करता है परंतु ग़ुलामी की अनुभूति होने के कारण स्वयं उन्हीं से थक जाता है, ऊब जाता है। समग्र अध्यात्म की यही खोज है कि किसी प्रकार से मनुष्य को उसकी ऐसी अनंत संपदा से परिचित कराया जाए कि वस्तु, व्यक्ति, स्थिति की मौजूदगी होते हुए भी उसकी ग़ुलामी का अनुभव न हो।

स्वतंत्रता की ओर पहला कदम — सद्गुरू की खोज

प्रचलित लोकोक्ति है कि जिसके पास जो है वो वही दे सकता है। दीये के पास प्रकाश है तो वह रोशनी ही दे सकता है। फूल के पास सुगंध है तो वह खुशबू ही बिखेर सकते हैं और पानी के पास शीतलता है तो वह हमें शीतलता की, ठंडक की अनुभूति से भर सकता है। यदि पानी से प्रकाश और दीये से शीतलता की इच्छा करेंगे तो सिवाय निराशा के कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। इसी तरह से स्वतंत्रता की खोज में निकले मनुष्य को सबसे पहले ऐसे सद्गुरू की तलाश होनी चाहिए जो स्वतंत्रता के अनुभव से भरा है, जो इस मार्ग से चला है और जो हमें भी मार्ग दिखाने की क्षमता रखता है। सद्गुरू का ज्ञान-सामर्थ्य और ध्यान-संपन्नता मनुष्य में रहे हर प्रकार के अज्ञान को नष्ट करने का सामर्थ्य रखती है। ऐसे किसी सद्गुरू की शोध करते हुए यदि वर्षों भी लग जाए तो धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करके ईश्वर से गुरु-मिलन की प्रार्थना करनी चाहिए। श्री गुरु का मिलना ही स्वतंत्रता की ओर उठा पहला कदम है।

स्वतंत्रता की ओर दूसरा कदम — स्वरूप की समझ

सिद्धांत ऐसा है कि जो स्वतंत्र हो सकता है वही होगा परंतु जिसका स्वरूप ही आश्रय में या किसी के आधार से रहने का है वह कभी भी स्वतंत्र नहीं हो सकता। जैसे — यह शरीर अनेक प्रकार के आधार से टिका हुआ है अन्न, जल, हवा आदि कितने ही मूल-भूत तत्त्व इस शरीर को टिकाने के लिए अनिवार्य है तो शरीर की स्वतंत्रता कभी भी संभव नहीं है। दूसरी ओर मन की स्वतंत्रता की बात करें तो यह भी संभव नहीं क्योंकि मन की हस्ती ही विचारों के कारण है। जो किसी दूसरे के कारण से टिका है उसकी आज़ादी संभव ही नहीं है। यदि हम सामाजिक स्वतंत्रता की बात करें तो वह भी असंभव है क्योंकि समाज बना ही है लोगों के समूह से जो स्वयं ही ग़ुलामी से सज्ज हैं। इस प्रकार जब हम संपूर्ण विश्व व्यवस्था की ओर नज़र घूमा कर देखेंगे तो पता चलेगा कि यहाँ सभी कुछ अन्योन्य आश्रित (mutually dependent) है। ऐसे में, सद्गुरू निश्रा में, मनुष्य को स्वरूप की समझ होने पर यह स्पष्ट समझ में आने लगता है कि स्वतंत्रता के अनुभव के लिए किस दिशा में जाना है और किस प्रकार का जीवन होना चाहिए।

स्वतंत्रता की ओर तीसरा कदम — समझ अनुसार जीवन

किसी सद्गुरू के आश्रय में यथार्थ स्वरूप को समझ पाना संभव हो पाता है अन्यथा मनुष्य जीवन सांप्रदायिक मान्यताओं और क्रिया-काण्ड की उलझन से ही निकल नहीं पाता है। जीवन-दर-जीवन हम जन्म-मरण के चक्रव्यूह में बँधे हुए पैदा होते हैं और बँधे हुए ही मर जाते हैं परंतु सद्गुरू की निश्रा में बंधन का स्वरूप समझ कर स्वतंत्रता की अनुभूति करने वाले जीवन का आरंभ होता है। जीवन में आमूल रूपांतरण होते ही जन्मोजन्म की विपरीत मान्यताओं के बंधन गिरने लगते हैं। जो मन वस्तु, व्यक्ति, स्थिति की मालिकी में स्वतंत्रता खोजता था वही मन स्वरूप को समझने के कारण मालिकी भाव से आज़ाद हो जाता है। सिद्धांत यही कहता है कि जो मालिकी भाव से मुक्त हो गया वह उसी क्षण ग़ुलामी के भाव से भी रिहा हो जाता है ! यही अवस्था स्वतंत्रता की व्यक्तिगत अनुभूति का महत्वपूर्ण चरण है।

स्वतंत्रता की ओर अंतिम कदम — समग्रता से लौटाना

स्वतंत्रता का यह अंतिम कदम लेने में कई बार मनुष्य को कुछ और जन्म लेने पड़ जाते हैं। स्वयं की परम-स्वतंत्र अनुभूति का आस्वाद लेने की इस यात्रा में जाने-अनजाने कितने ही जीवित और नैसर्गिक (living and natural) तत्त्वों ने हमारी मदद करके इस यात्रा को गति और दिशा दी है। मनुष्य स्वाभाविक रूप से उन सभी का ऋणी हो जाता है। इस ऋण से मुक्त होने के लिए मनुष्य को सहृदयता और करुणा पूर्वक पुनः स्वतंत्रता के मार्ग को दूसरों के लिए उघाड़ना होगा। चाहे परिचित-अपरिचित हो या फिर निकट-दूर — परम-स्वतंत्रता के पैगाम को जब तक सद्गुरू दूसरों तक नहीं पहुँचाते तब तक यात्रा संपन्न नहीं होती। इस संदर्भ में यह समझ लेना भी आवश्यक है कि प्रत्येक मनुष्य के जीवन में यह संभावना नहीं होती कि वह जन-जगत का नेतृत्व करे और उन्हें मार्गदर्शन दें परंतु यह तो मुमकिन हो ही सकता है कि किसी-न-किसी ढंग से सद्गुरू के किए आयोजन में सहभागी बन जाए। दूसरों को स्वतंत्रता का पैगाम देने का नेतृत्व करने से ले कर सहभागी होने तक के संपूर्ण कर्मों में ऋण-मुक्ति का ही आलेखन होता है जब वह निष्कामता पूर्वक किया गया हो।

स्वतंत्रता के इन चार कदम में ही स्वतंत्रता की दिव्य अनुभूति और मुक्ति का संपूर्ण मार्ग है। चाहे आप इस जीवन में इस मार्ग को समझे या फिर अभी और जन्मों की प्रतीक्षा करें परंतु इसी मार्ग से होते हुए ऐसी स्वतंत्रता का उत्सव मनाया जा सकता है जो शाश्वत है, अनंत है और परम है।

Artwork dedicated by Tanvi Shah | © Shrimad Rajchandra Mission, Delhi, 2018