स्वतंत्रता की खोज

इस पृथ्वी के धरातल पर उपस्थित दृश्य-अदृश्य सभी जातियों की मूलभूत चाहत है — स्वतंत्रता। स्वतंत्रता यानि आज़ादी, ऐसी आज़ादी जो हमारे मन के अनुकूल हो। मनुष्य के मन की यह चाहत तो वास्तविक है लेकिन इस चाहत की पूर्ति का ढंग ढूंढता हुआ मनुष्य आज तक स्वयं को ही धोखा दे रहा है। हमारे जीवन की सबसे गहन विचित्रता ही यही है कि स्वयं को धोखा देते हुए भी हम इतने निश्चित हैं कि कहीं मूल में ही कुछ चूक हो रही है — इस बात का हमें पता ही नहीं चल पा रहा।

स्वतंत्रता — गुलामी से आज़ादी

मनुष्य का मन बहु-आयामी है। हम इसके एक आयाम को स्वीकार कर के उसके अनुकूल भागते हैं — पुरुषार्थ करते हैं, कुछ प्राप्त करते हैं और प्राप्ति होने पर मालिकी का अनुभव करते हैं — यह मालिकी का भाव हमें आज़ादी की अनुभूति कराता है ; गुलामी से आज़ादी। लेकिन वास्तविकता में यहाँ उपलब्ध हर नयी मालिकी, एक नए प्रकार की गुलामी के द्वार खोलती है। और इसलिए मनुष्य चाहे किसी भी क्षेत्र में कितनी भी उपलब्धियाँ प्राप्त कर ले लेकिन आज़ादी की अनुभूति क्षणिक ही रहती है, निरंतर नहीं।

इतिहास प्रमाण है कि वर्षों पहले जब तकनीकी विकास का इस प्रकार विस्फोट नहीं हुआ था तब मनुष्य की गुलामी के अनुभव की मात्रा भी कम थी और मन की विक्षिप्तता भी सीमित थी। परंतु आधुनिक युग में विज्ञान के विकास ने जहाँ एक ओर मनुष्य का जीवन सुविधा व सुरक्षा से भरा है वहीँ दूसरी ओर मनुष्य का मन व्याकुलता व विक्षिप्तता से पीड़ित भी है। विज्ञान के नित-नवीन शोध मनुष्य के तन-मन का कार्यभार निरंतर उठाते जा रहे हैं परंतु गुलामी की मायूसी कम नहीं हो रही और आज़ादी का दावा होने पर भी आज़ादी के आनंद का अनुभव इस वर्तमान में नहीं हो रहा। कारण क्या ?

धर्म-ग्रंथों के ईशारे

यदि मनुष्य मात्र मन होता तो मन की प्राप्ति-अप्राप्ति उसे आनंद के क्षण उपलब्ध करा देती। लेकिन मनुष्य इतना संकुचित नहीं है। अस्तित्व के व्यापक विस्तार में मनुष्य का मन मात्र एक बिंदु से अधिक नहीं है। और जब हम छोटे से बिंदु से विराट सिंधु जैसे अनुभव की अपेक्षा रखेंगे तब हमारी यह मिथ्या आकांक्षा ही हमारी आज़ादी में अड़चन उत्पन्न करती है।

अस्तित्व की यथार्थ पहचान करवाने के उद्देश्य से ही सभी धर्म-ग्रंथों का अवतरण होता है। चाहे उपनिषद् हो या आगम, चाहे गीता हो या क़ुरान — इनके सभी वचन अस्तित्व के महा-आकाश की ओर ही ईशारा करते हैं जिसमें स्वतंत्रता की उड़ान भरी जा सकती है। जैसे उड़ान की संभावना आकाश में ही होती है, पिंजरे में नहीं ; उसी प्रकार स्वतंत्रता का अनुभव भी अस्तित्व के महा-आकाश में ही संभव है, मन के संकुचित दायरे में नहीं।

स्वतंत्रता की यथार्थ चाहत होते हुए भी मनुष्य उसके अनुभव तक नहीं पहुँच रहा तो कारण विज्ञान नहीं, मनुष्य का अज्ञान है। पिंजरों में उड़ने की लाख चाहतें हमें घायल और विक्षिप्त तो कर सकती है परंतु स्वन्त्रता के अनंत आकाश का अनुभव और तृप्ति असंभव होती है।

प्रत्यक्ष सद्गुरु की अनिवार्यता

इस समझपूर्वक किये हुए निर्णय के उपरान्त ही आवश्यकता महसूस होती है जीवन में — एक प्रत्यक्ष सद्गुरु की। एक तरफ हमारी धार्मिक संस्कृति और परंपरा ने हमें धर्म-शास्त्रों की बेजोड़ भेंट दी है तो दूसरी तरफ विज्ञान के अथाह प्रयास से अतुलनीय सामग्री उपलब्ध हुई है जो जीवन को सुगम करने की संपूर्ण व्यवस्था करता है। परंतु फिर भी मनुष्य आनंदित नहीं है, तनावरहित नहीं है, उत्सवपूर्ण नहीं है क्योंकि पिंजरों को सजाते-सजाते वह उसी को अपना घर मान बैठा है। कोई सद्गुरु आये जो पिंजरे की उपयोगिता और आकाश की अनिवार्यता समझाये। शरीर-मन-बुद्धि रुपी पिंजरे उपयोगी है परन्तु स्वतंत्रता के अनुभव के लिए, अस्तित्व के महा-आकाश में उड़ान अनिवार्य है।

सद्गुरु यानि शास्त्रों की जीवंत उपस्थिति। शास्त्र यानि भूतकाल में हुए सद्गुरु के अनुभव की अभिव्यक्ति। यह अभिव्यक्तियाँ शास्त्रों को पढ़ कर समझ नहीं आती परंतु जो वर्तमान में उपस्थित हैं उन्हें देख कर, सुन कर, उचित रूप से शब्द-पालन करके समझ में आती हैं। जिन्होंने अस्तित्व के महा-आकाश में उड़ान भरी है उनके वचन से होती अभिव्यक्ति और उनके समागम में होती अंतरंग अनुभूति ही मनुष्य में रहे अज्ञान का बंधन तोड़ने का सामर्थ्य रखती है। ऐसे समर्थ सद्गुरु का यथोचित आश्रय हममें स्वतंत्रता के नए आयाम उघाड़ता है और संकुचित पिंजरों में रहते हुए भी अनंत आकाश में उड़ान भरने का अभूतपूर्व साहस जगाता है।

सद्गुरु यानि शास्त्रों की जीवंत उपस्थिति। शास्त्र यानि भूतकाल में हुए सद्गुरु के अनुभव की अभिव्यक्ति।

स्वतंत्रता — स्व-आश्रित ही

यह स्वतंत्रता स्व-आश्रित ही होती है परंतु अनादि काल के विपरीत अभ्यास के कारण किसी सद्गुरु की प्रेरणा, उनका निष्कारण प्रेम व उनकी चैतन्य-सभर उपस्थिति हममें स्व-आश्रित होने की इस दिव्य-संभावना को सक्रिय करती है। स्वतंत्रता का संपूर्ण जगत हमारे भीतर आलोकित होता है परंतु एक सद्गुरु की प्रत्यक्ष उपस्थिति हमारे अनंत आकाश के अस्तित्व को प्रकाशित करती है।


कविता — स्वतंत्रता, बस होने को है!

स्वतंत्रता — बस होने को है ! यदि,
एक कदम
बढ़ चलें मन से, मनन की ओर
एक कदम
बढ़ चलें, स्वयं से शरण की ओर
एक नज़र
उठा के देखें दीवारों से पार
आकाश की ओर
एक अनुभव में खोते चलें
जो हो स्वतंत्रता के महा-आकाश की ओर…

– श्री बेन प्रभु

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