मख़दूम मुकर्रम काज़ी अब्दुल जमील के नाम

जनाब मख़दूम मुकर्रम को मेरी बन्दगी तफ़क़्क़ुद नामा मरक़ूमा 21 सितम्बर मैंने पाया हज़रत के सलामत हाल पर ख़ुदा का शुक्र बजा लाया कोई महकमा तख़फ़ीफ़ में आए कोई गाँव मसलन लुट जाए आप का ओहदा आप को मुबारक आप का दौलतख़ाना सलामत हाँ वह जो अपने इब्नुल ख़ाल का इस महकमा मैं वकील होने का आप को खटका है अलबत्ता बजा है जब आप ज़ाहिर कर चुके हैं तो अब उसका अंदेशा क्या है हाकिम समझ लेगा वह वकील हैं महकम-ए-मुनसिफ़ी में न रहेंगे महकम-ए-सद्र-ए-अमीन-ओ-शशन जज में काम करेंगे मैं न तनदुरुस्त हूँ, न रंजूर हूँ ज़िन्दा बदस्तूर हूँ देखिए कब बुलाते हैं और जब तक जीता रहूँ और क्या दिखाते हैं वस्सलाम बिलवफ़्फ़ल एहतराम

A single golf clap? Or a long standing ovation?

By clapping more or less, you can signal to us which stories really stand out.