पिंजर — अमृता प्रीतम (सार-संक्षेप)

सुख के लम्हें शायद कुछ देर को भूल जाएँ पर दुःख के दिन भुलाए नहीं भूलते। और दुःख भी ऐसा जिसने जीवन की दिशा और दशा बदल कर रख दी हो तो उसे भूलना असंभव होता है। यूँ तो हिंदुस्तान — पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर कई उपन्यास लिखे गए लेकिन पिंजर का उनमें अपना अलग और महत्वपूर्ण स्थान है। जब उपन्यास की घटनाएँ जीवन की घटनाओं के इर्द-गिर्द से ली गई हो तो काल्पनिक घटनाओं का चित्रण भी विश्वसनीयता से ओत-प्रोत प्रतीत होता है। 1950 के आस-पास लिखा गया यह उपन्यास बंटवारे के दौरान अमृता प्रीतम के खुद के पाकिस्तान छोड़ हिंदुस्तान आने और उन दिनों के हालात से प्रभावित हो कर लिखा गया हो तो कोई आश्चर्य नहीं।

घटनाक्रम आज़ादी से पहले का है। उपन्यास की नायिका पूरो, गुजरात जिले के छत्तोआनी गाँव की है। परिवार ने अमीरी के बाद पनपी गरीबी झेली है जहाँ पुश्तैनी बर्तन तक गिरवी रख दिए गए। छोटी बच्ची पूरो के पिता और चाचा काम की तलाश में सियाम चले जाते हैं और फिर धीरे-धीरे उनकी कमाई से गरीबी की ज़मीन से समृद्धि का पौधा फूटता है।

14 साल की पूरो का जब पास के गाँव में रिश्ता तय होता है तो उस समय उसकी माँ छठे बच्चे को जन्म देने वाली होती है। अमृता ने उस समय की परिस्थिति का सजीव चित्रण करते हुए कहीं भी किसी प्रथा को सही या गलत ठहराने की कोशिश नहीं की है। विवाह में अदला-बदली के संबंधों को उकेरती हुई लिखती हैं कि पूरो के ब्याह के बदले पूरो के 12 वर्षीय भाई की सगाई पूरो के होने वाले पति की बहन से होती है जो 12 वर्ष से भी बहुत कम की है।

15 वर्ष की होते-होते, पूरो के शरीर पर यौवन के लक्षण दिखते हैं और मन में ‘होने वाले पति’ से मिलने की उत्कंठा भी उत्पन्न होती है। शादी की तैयारियां हो रही हैं और माँ बेटी को एक दूसरे से बिछड़ने का ग़म भी सता रहा है। अमृता लिखती हैं “हर लड़की का यौवन उसे अपनी माँ से अलग कर देता है ।”

इन्ही तैयारियों के बीच पूरो एक दिन अपनी छोटी बहन के साथ बाहर निकलती है जहाँ उसी के गाँव का 22–24 वर्षीय रशीद घोड़ी पर आता है और उसका अपहरण कर लेता है। रशीद पहले भी एक-दो बार पूरो को छेड़ चुका था पर सहेलियों ने कहा था कि यौवन की दहलीज़ पर कदम रखते ही ऐसी बातें तो होती ही हैं और यही वजह थी कि पूरो ने इस घटना की चर्चा तक घर में नहीं की थी।

गाँव से बाहर किसी घर में पूरो को रशीद कैद करके रखता है। पूरो वहाँ से भाग जाना चाहती है लेकिन उसका प्रतिरोध घर की दीवारों और किवाड़ से ज्यादा मजबूत नहीं साबित होता। रशीद रोज़ आ कर खाना दे जाता है जिसे पूरो हाथ तक नहीं लगाती। 15 दिन हो चुके हैं, कमजोरी से पूरो की प्रतिरोध करने की क्षमता कम होती जा रही है और ऐसे में रशीद उसके सामने लाल रेशम का जोड़ा रखते हुए कहता है कि कल मौलवी आ कर हमारा निकाह पढ़ा देगा। अब पूरो के लिए चुप रहना मुश्किल था, अल्लाह का वास्ता देते हुए वह रशीद से पूछती है कि उसने उसके साथ ऐसा क्यूँ किया?

पूरो, हमारे शेखों के घराने में और तुम्हारे शाहों के घराने में दादा, परदादा के समय से बैर चला आ रहा है। तेरे दादा ने पांच सौ रुपये में गिरवी रखे हुए मकान पर ब्याज दर ब्याज लगाया था और कुर्की कराकर शेखों के घराने को घर से बेघर किया था। सिर्फ इतना ही नहीं, उनके मुंशियों-कारिंदों ने हमारे घर की औरतों को बोल-कुबोल कहे और मेरे दादा की बड़ी लड़की को तेरे दादा के बड़े लड़के ने जबरदस्ती तीन रात घर में रखा। मेरे दादा के देखते-देखते यह सब हुआ। पर उस समय शेखों का घराना पेरे हुए गन्ने की भांति था। सब खून के आँसू पी कर रह गए, पर मेरे दादा ने मेरे चाचा-ताउओं को और मेरे पिता को कुरान उठवा कर कसमें दिलवाई थीं, कि वे इसका बदला ले कर ही रहेंगे। उसकी अगली पीढ़ी के समय बात ‘सो’ गई। अब जब तेरा काज इसी गाँव में रचा जाने लगा, मेरे चाचा-ताउओं के लहू में पुराना बदला खौलने लगा। उन्होंने मुझे कसमें दिलाई, मेरे लहू को ललकारा और मुझसे कौल कराए कि मैं शाहों की लड़की को ब्याह से पहले किसी भी दिन उठा ले जाऊं ।

लेकिन रशीद सिर्फ बदले की भावना में नहीं जल रहा, वह पूरो को चाहता भी है। 15 दिनों तक घर में रखने के बाद भी उसने पूरो को हाथ नहीं लगाया। रशीद पूरो से कहता भी है

पूरो ! पहले ही दिन जब मैंने तुझे देखा, ख़ुदा गवाह है, मुझे तुझसे इश्क हो गया। एक तो तेरी मुहब्बत का जोर, दूसरे मेरी पीठ पर सारा शेख घराना। मैं तुझे ले आया हूँ, पर मुझसे कसम ले ले, मुझसे तेरा दुःख नहीं देखा जाता ।

पूरो को लगता है अब जल्द ही कुछ किया जाना चाहिए। वह रशीद से उसको अपने माँ-बाप से मिलाने की मिन्नत करती है। लेकिन रशीद कहता है

ओ नेकबख्त ! अब उस घर में तेरे लिए कोई जगह नहीं। उनकी बिरादरी का कौन हिंदू फिर शाहों के घर का पानी पिएगा? तू मेरे घर में पूरे पंद्रह दिन रह चुकी है ।

पूरो को अब भी तसल्ली नहीं। पूछती है मेरे घर वाले मुझे ढूँढ़ कर परेशान हो रहे होंगे, पर रशीद कहता है —

वे रोते-कलपते रहे, पर उसी तरह जैसे मेरे दादा, मेरा पिता, मेरे चाचा मेरी बुआ के चले जाने पर रोए थे। पुलिस भी बहुत खोज-खबर लगाकर हार गई, पर उन्हें भी कोई अता-पता नहीं लग सका। उन्हें पता लग भी कैसे सकता ! पुलिस ने पूरा पाँच सौ रुपया खाया है। तू तो जानती ही है कि इस समय हमारा पलड़ा भारी है। सारा गाँव मुसलमानों का है। कोई हिन्दू का बच्चा आँख उठा कर हमारी ओर देख नहीं सकता। यही ग़नीमत है कि उनकी जान-माल सलामत है। उन्हें अपनी जान प्यारी है, वे कुछ बोल नहीं सकते। अगर वे हमारे घर की ओर उँगली भी उठाते तो हमारे आदमी उन्हें नहर भी पार करने न देते।

लेकिन पूरो मानने तो तैयार नहीं। शरीर में थोड़ी ताकत बची रहे इसलिए वह उस शाम थोड़ा खाना खाती है और रात में किसी तरह वहाँ से भाग निकलती है। रात के अँधेरे में पूरो अपने घर पहुँचती है जहाँ उसके अरमान टूट कर बिखर जाते हैं जब उसके पिता कहते हैं ,

लोग इकट्ठे हो जाएँगे ! बेटी, तेरी किस्मत ! अब हमारे बस का कुछ नहीं ! अभी शेखों के यहाँ से लोग आ जाएंगे और हमारे बच्चे-बच्चे को पेर डालेंगे।

पूरो हारकर अपनी माँ की तरफ देखती है लेकिन वहाँ से भी निराशा हाथ आती है,

हम तुझे कहाँ रखेंगे? तुझे कौन ब्याहकर ले जाएगा? तेरा धर्म गया, तेरा जन्म गया। हम जो इस समय कुछ भी बोले तो हमारे लहू की एक बूँद भी नहीं बचेगी ।”

हाय, मुझे अपने हाथ से ही मार डालो” पूरो चीख पड़ी।

बेटी जनमते ही मर गई होती ! अब यहाँ से चली जा !शेख आते ही होंगे। तेरे पिता, तेरे भाई का कहीं पता भी नहीं मिलेगा। वे सबको मार डालेंगे।” माँ ने फैसला सुना दिया।

पूरो वापस मुड़ चली, किसी ने उसे रोका नहीं।

आते समय पूरो ज़िंदगी से भेंट करने आ रही थी, उसके हृदय में लालसा थी, जीने की, माता-पिता से मिलने की। बहुत डरती-काँपती आई थी। लौटते समय वह मौत से भेंट करने चली थी। अब उसके मन में कोई डर नहीं था, कोई भय नहीं था। मौत से बढ़ कर कोई उसका क्या कर सकता था !”

पूरो को सामने से रशीद आता दिखा। रशीद उसे पकड़कर फिर उसी घर में ले गया। तीसरे दिन मौलवी को ले कर आया और पूरो से उसका निकाह हो गया। पूरो अब किसी भी तरह के प्रतिरोध की स्थिति में नहीं थी।

निकाह के समय पूरो का नाम हमीदा रखा गया।

दिन की रोशनी में पूरो हमीदा बन जाती थी, रात के अंधकार में वह पूरो रहती। किंतु पूरो सोचती थी वह वास्तव में न हमीदा थी, न पूरो, वह केवल एक पिंजर थी, केवल पिंजर, जिसका कोई रूप न था, कोई नाम न था।

रशीद पूरो को एक दूसरे गाँव ले आया जहाँ पूरो चुपचाप समय गुज़ारती रही और 9 महीने बाद एक बेटे को जन्म दिया।

रशीद का मन गर्व से भर उठा। उसने पूरो पर विजय प्राप्त कर ली थी, इस जुए में उसने सारी की सारी पूरो को जीत लिया था। पूरो अब केवल उसकी भगाई हुई रखैल नहीं थी, वह अब केवल घर में डाली हुई स्त्री नहीं थी, वह अब उसके पुत्र की माँ थी।

लेकिन पूरो अभी भी हालात को स्वीकार नहीं कर पाई थी।

“गर्म गुड़ और पिसे हुए बादाम कुछ चम्मच लेकर जब पूरो के शरीर में कुछ जान आई तो उसने देखा कि उसके बच्चे का नरम-नरम चेहरा उसकी बाँह से लग रहा है। पूरो के शरीर में एक कँपकँपी सी आ गई। लगा कि एक नरम सफ़ेद कीड़ा उसके शरीर पर चढ़ रहा है। पूरो को नफरत सी हुई। मन किया अपनी बाँहों से लगे हुए कीड़े को वह तोड़ डाले, अपने पास से उसे दूर फेंक दे, ऐसे जैसे कोई चुभे हुए काँटे को नाखूनों में ले कर निकाल देता है, जैसे कोई चिमटी हुई किलनी को नोचकर अलग कर देता है, जैसे कोई चिमटी हुई जोंक को तोड़ फेंकता है….”

“बच्चा पूरो का दूध पीता रहा। फिर पूरो को लगा, यह लड़का जबरदस्ती उसकी नसों से दूध खींच रहा है, जबरदस्ती……जबरदस्ती……इसके बाप ने भी तो उसके साथ जबरदस्ती की थी, लड़का भी तो अपने बाप का ही बेटा था, अपने बाप का रक्त था, अपने बाप का मांस था, जबरदस्ती यह उसके शरीर में धरा गया था, जबरदस्ती ही उसके पेट में पल गया था और अब जबरदस्ती ही उसकी नसों से दूध खींच रहा था….”

अमृता ने इस उपन्यास में दो किरदार और रखे हैं जो पूरो की संवेदनाओं को उभारते हैं। कम्मो पूरो के गाँव में ही रहती है। कम्मो बिन माँ की बेटी है और उसका पिता भी उसे गाँव छोड़ शहर चला गया। कम्मो अपनी चाची के यहाँ रहती है और उसके ताने सहा करती है। कम्मो को घर में प्यार नहीं मिलता और पूरो कम्मो में अपना बचपन देखती है। पूरो कम्मो का ध्यान रखती है उसे नए जूते और कपड़े देती है। कम्मो हिंदू थी और पूरो मुस्लिम, खुल कर न तो मिल सकते थे और न ही पूरो कम्मो को कुछ खिला सकती थी फिर भी जहाँ तक संभव हुआ पूरो ने कम्मो का ध्यान रखा। कम्मो के बारे में सोचते हुए,

पूरो सोच रही थी, जब माँएँ मर जाती हैं तब बाप भी पराए हो जाते हैं…. सोचते-सोचते उसका ध्यान अपनी ओर चला गया, माँएँ जीवित हों फिर भी पिता पराए हो जाते हैं, माँएँ भी परायी हो जाती है।”

दूसरा किरदार एक पगली का है जो अचानक ही एक दिन गाँव में आ जाती है। मैले-कुचैले कपड़े पहने पगली गाँव में दौड़ लगाती रहती है और जो मिल जाए माँग कर खाती है। गाँव में खलबली तब मचती है जब पगली का पेट निकलने लगता है। किसी ने पगली को अपनी हवस का शिकार बना डाला। गाँव के लोग उसे गाँव से बाहर छोड़ आते थे लेकिन पगली फिर गाँव में आ जाती थी।

वह कैसा पुरुष था ! अवश्य ही कोई पशु होगा, जिसने इस जैसी पागल की यह दुर्दशा बना दी।” पूरो सोचती रहती थी “जिसके पास न हुस्न था, न जवानी थी, मांस का एक शरीर, जिसे अपनी सुध न थी, जो केवल हड्डियों का एक पिंजर था, एक पागल पिंजर…..चीलों ने उसे भी नोच-नोच कर खा लिया…..”

रात के पिछले पहर उस दिन जब पूरो खेत गई तो उसे पेड़ के नीचे कोई आकृति सी गिरी दीख पड़ी, पास जा कर उसने देखा तो पगली थी। उसने एक बच्चे को जन्म दिया था और प्रसव के दौरान उसके प्राण-पखेरू उड़ गए थे। पूरो दौड़ कर रशीद को बुला लाई। गाँव वालों ने शव को ठिकाने लगा दिया और पूरो बच्चे को अपने घर ले आई। बच्चा जब भली-भाँति पलने लगा तो गाँव में हिंदुओं ने चर्चा शुरू कर दी,

पगली हिंदू थी, उसके बच्चे को मुसलमानों ने ले लिया है। सारे गाँव में देखते-देखते उन्होंने हिंदू बच्चे को मुसलमान बना लिया है ।”

बात बढ़ी और एक सम्मानित हिंदू के घर सब जमा हुए और रशीद को बुलवाया गया। न चाहते हुए भी रशीद और पूरो को बच्चे को इन लोगों के हवाले करना पड़ा। लेकिन चार-पांच दिन में ही बच्चे की तबीयत बिगड़ गई और मरणासन्न स्थिति में गाँव वाले बच्चे को फिर पूरो के पास छोड़ गए। पूरो के प्यार ने बच्चे को बचा लिया। अब हिंदू बच्चे में किसी की कोई रुचि नहीं थी।

घर में अभी भी पूरो ख़ामोश ही रहती थी। “घर के चूल्हे में आग जलती जरूर थी, पर घर की बोल-चाल पर और ज़िंदगी की हरियाली पर कोहरा जम गया था।” ऐसे में जब पड़ोस की एक बुढ़िया अपनी आँख के इलाज के लिए उसे अपने साथ रत्तोवाल गाँव चलने को कहती है तो पूरो के मन में झंझावात शुरू हो जाता है। उसे याद आता है कि रत्तोवाल गाँव में ही रामचंद से उसका लगन होने वाला था। मन ही मन सोचने लगती है एक बार रामचंद का चेहरा देख तो लूँ और बुढ़िया के साथ चलने की हामी भर देती है।

तय दिन को वह बुढ़िया के साथ रत्तोवाल गाँव पहुँचती है। बुढ़िया का इलाज चार दिनों तक चलेगा। पूरो दिन भर गाँव में पता करने की कोशिश करती है, कहीं से रामचंद का पता चल जाए। और तीसरे दिन उसे रामचंद खेत में मिल जाता है, पूरो उसे कुछ नहीं कहती। उस रात पूरो बैचैन हो कर फिर उसी खेत में जाती है और रामचंद को भी वहां पाती है। रामचंद उससे पूछता है

क्या तू पूरो है? जो तू पूरो है तो मुझे एक बार बता जा ! मैं सारी रात इन खेतों में घूमता रहा। पता नहीं क्यूँ मेरा दिल गवाही देता था, तू फिर आएगी। मेरा दिल गवाही देता है, तू पूरो है।”

पूरो तो कब की मर चुकी” पूरो ने कहा और वापस आ गई। अगले दिन बुढ़िया के साथ अपने गाँव आ गई।

1947 में देश का बँटवारा हुआ और चारो तरफ दंगे का दंश फ़ैल गया। पूरो के गाँव में, जो अब पाकिस्तान में आ गया था, मुसलमान ज्यादा थे, गाँव के सारे हिंदू एक हवेली में छुपे थे। यदि कोई हवेली से बाहर आता तो मार दिया जाता था। एक रात जब हिन्दू मिलिट्री के ट्रक गाँव में आए तो लोगों ने हवेली में आग लगा दी। मिलिट्री ने आग बुझा कर लोगों को बाहर निकाला।

“आधे जले हुए तीन आदमी भी निकाले गए, जिनके शरीर से चर्बी बह रही थी, जिनका मांस जलकर हड्डियों से अलग-अलग लटक गया था। कोहनियों और घुटनों पर से जिनका पिंजर बाहर को निकल आया था। लोगों के लारियों में बैठते-बैठते उन तीनों ने जान तोड़ दी। उन तीनों की लाशों को वही फेंककर लारियाँ चल दीं। उनके घर वाले चीखते-चिल्लाते रह गए, पर मिलिट्री के पास उन्हें जलाने-फूंकने का समय नहीं था ।”

“पूरो के मन में कई तरह के प्रश्न उठते, पर वह उनका कोई उत्तर न सोच पाती। पता नहीं चलता था कि अब इस धरती पर जो कि मनुष्य के लहू से लथपथ हो गई है, पहले की तरह गेहूं की सुनहरी बालियाँ उत्पन्न होंगी या नहीं….इस धरती पर, जिसके खेतों में मुर्दे पड़े सड़ रहे हैं, अब भी पहले की तरह मकई के भुट्टों में से सुगंध निकलेगी या नहीं…..क्या ये स्त्रियाँ इन पुरुषों के लिए अब भी संतान पैदा करेंगी, जिन पुरुषों ने इन स्त्रियों की अपनी बहनों के साथ ऐसा अत्याचार किया था?”

दोनों तरफ के लोग काफ़िले बना कर एक दूसरे तरफ जा रहे थे। हिंदुस्तान जाता हुआ एक काफ़िला पूरो के गाँव में रुका। शाम हो गई थी, काफ़िला वहीँ रुक गया। पूरो जानती थी जिधर से काफ़िला आया है वह रास्ता रत्तोवाल का है। उसे लग रहा था शायद रामचंद भी इसी काफ़िले में हो, शायद आख़िरी बार मुलाकात हो जाए। पूरो सामान बेचने के बहाने काफ़िले में गई और उसने रामचंद को देखा। दोनों ने एक दूसरे को पहचाना। रामचंद ने बताया कि पूरो के चले जाने के बाद उसके माता-पिता ने पूरो से छोटी बहन की शादी रामचंद से करवा दी और रामचंद की बहन का ब्याह पूरो के भाई से हो गया। रामचंद ने ये भी बताया कि काफ़िला चलने से पहले उसकी बहन लाजो को गाँव के ही मुसलमान उठा कर ले गए। रामचंद पूरो से मिन्नतें करता रहा कि लाजो का कुछ पता लगाए।

अगली सुबह काफ़िला हिंदुस्तान चला गया लेकिन पूरो के मन में अब उसकी भाभी लाजो को बचाने की बात घर कर गई थी। उसने किसी तरह रशीद को मनाया और दोनों रत्तोवाल गए। पूरो ने पता लगाया कि मुसलमान लड़के ने न केवल लाजो पर कब्ज़ा जमा रखा था बल्कि रामचंद के घर पर भी उसी का कब्ज़ा था। पूरो किसी तरह रशीद की मदद से लाजो को भगाकर अपने गाँव ले आई। अब लाजो और पूरो इंतज़ार कर रहे थे कि रामचंद का कोई संदेशा आए लेकिन कोई खबर नहीं आ रही थी।

एक दिन रशीद खबर लाया कि रामचंद आया है। साथ में कुछ हिंदुस्तानी पुलिस हैं और कुछ पाकिस्तानी। लोग इसी तरह अपने बिछड़े लोगों को ढूँढ रहे हैं। रशीद ने रामचंद को पाँच दिन बाद लाहौर में मिलने को कहा क्योंकि गाँव में लाजो को सौंपने पर हंगामा हो सकता था। पाँच दिनों में पूरो का भाई भी हिंदुस्तान से लाहौर आ जाएगा।

पाँच दिन बाद पुलिस के पहरे में लाहौर में लाजो अपने भाई रामचंद और अपने पति, पूरो के भाई से मिली। पुलिस की लारी तैयार थी। हिंदुस्तानी पुलिस के सिपाहियों ने आवाज़ दी

उधर जाने वाले हिंदू एक ओर हो जाएँ, लारी तैयार है।

रामचंद ने रशीद को बार-बार गले लगाकर धन्यवाद कहा, पूरो ने लाजो को विदा किया और भाई से अंतिम बार मिलते हुए उसके गले से लग गई।

पूरो मेरी बात सुन, इस समय……” पूरो के भाई ने कहा और पूरो भाई की बात समझ गई।

जो मैं इस समय कह दूँ, मैं एक हिंदू स्त्री हूँ तो वह मुझे इस सबके साथ लारी में बिठा कर ले जाएँगे। मैं भी लौट सकती हूँ, मैं भी लाजो की तरह, देश की हजारों लड़कियों की तरह……”

लेकिन पूरो ने धीरे से अपने भाई से अपना हाथ छुड़ाया, रशीद के पास जा खड़ी हुई और अपने बच्चे को उठा कर गले से लगा लिया। उसने कहा,

लाजो अपने घर लौट रही है, समझ लेना कि इसी में पूरो भी लौट आई। मेरे लिए अब यही जगह है।

चाहे कोई लड़की हिंदू हो या मुसलमान, जो लड़की भी अपने ठिकाने पहुँचती है, समझो कि उसी के साथ पूरो की आत्मा भी ठिकाने पहुँच गई।

पूरो ने अपने मन में कहा और अपनी आँखों को धरती की ओर झुकाकर रामचंद को अंतिम प्रणाम किया।

लारी चल पड़ी। खाली सड़क पर धूल उड़ने लगी। पूरो आज कहीं पीछे छूट गई थी। हमीदा अपने बच्चे और रशीद के साथ वापस चल पड़ी।

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