बातें गीतों की

एक गीत जिसका संगीत इतना सुन्दर और शब्द इतने अर्थपूर्ण, उस गीत से विजय आनन्द और क्या कर सकते हैं?

जादू!

और गाइड फ़िल्म के हर गाने की तरह, यहाँ भी वही जादू है.

और महान निर्देशक विजय आनन्द महज चार दृश्यों में ही ये जादू कर डालते हैं.

सोचिए, एस.डी. बर्मन और शैलेन्द्र को क्या समझाया गया होगा, इस हिन्दी सिनेमा के इतिहास के सबसे गंभीर दृश्य के लिए.

एक महिला (वहीदा रहमान), जिसने अपने पति से अलग होने का निर्णय ले लिया है. देव आनन्द (पेशे से एक गाइड) उस महिला की मदद कर रहे हैं उस शादी के मुखौटे को निकालकर फेंकने और जीवन को जीने में. वह जीवन जिसके लिए वह व्याकुल है. वह आज़ादी जो हर किसी को मिलनी चाहिए. पर फिर, इस गाइड के पास उस महिला के लिए प्रेम का प्रस्ताव है. यह महिला जो समाज के नियमों से प्रताड़ित है. वह जानती है कि सिर्फ अपने पति से अलग होना ही समाज की नज़रों में उसे नीचे गिराने के लिए बहुत है, उसके बाद एक प्रेमी के साथ जीवन??

नहीं, कभी नहीं!!

यहाँ निर्देशक एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा उठा रहा है जिसके लिए वह एस.डी. बर्मन और शैलेन्द्र की मदद लेता है. और ये दोनों उसे वह गीत देते हैं जो अमूल्य है.

अब निर्देशक की बारी है. यह निर्देशक का निर्णय है कि जनता क्या सुने और क्या देखे. लोकेशन से लेकर लाईटिंग, वेशभूषा से लेकर कलाकारों की अभिव्यक्ति, सब कुछ.

और वह निर्णय लेता है कि यह गीत होगा एक झील के किनारे.

महिला (वहीदा रहमान) सफ़ेद साड़ी में हैं. यह एक पूरा सफ़ेद दागरहित कपड़ा है. शायद जीवन की नयी शुरुआत. या फिर विधवा स्त्री का पहनावा. समय, सांझ का समय है जब सूरज डूब गया है पर अभी अँधेरा नहीं हुआ है.

निर्देशक का विश्लेषण, दिन बीत गया है और आगे अँधेरी-लम्बी रात है पर एक सुबह की भी तो आशा है.

एक धुन बजती है और फिर मोहम्मद रफ़ी की सुरीली आवाज.

देव वहाँ वहीदा के पास जाते हैं और उनका हाथ पकड़कर गाते हैं,

“तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं,
ओ जहाँ भी ले जाएँ राहें हम संग हैं”

अब कैमरा ट्रॉली पर है. अगले ‘मुखड़े’ में, उस महिला की बात होती है. वह स्वयं से लड़ रही है. वह देव से अलग हो जाती है और दूर चली जाती है.

तारशहनाई का संगीत बजता है उस अंतराल में और देव महिला की तरफ बढ़ते हैं, पर वह दूर चली जाती है. देव फिर से गाते हैं,

“मेरे तेरे दिल का तय था एक दिन मिलना,
जैसे बहार आने पर, तय है फूल का खिलना,
ओ मेरे जीवन साथी।”

अबकी बार के ‘मुखड़े’ पर, वह देव की तरफ मुड़ती है और उन्हें एक क्षण के लिए गले लगा लेती है. सैक्सोफोन की मादक आवाज अंदर के तूफ़ान का अनुनाद हम तक पहुँचाती है.

पूरा छंद और अद्भुत पंक्तियाँ, एक अद्वितीय सोच, शैलेन्द्र के शब्दों में, इतने बढ़िया तरीके से फ़िल्मायी गयी और वो भी सिर्फ एक दृश्य में.

सैक्सोफोन, अब तक जो मंथर था, और भी मादक और तीव्र हो चला है, उस महिला की दुविधा की ही तरह.

यदि पिछला दृश्य विजय आनन्द की प्रतिभा का द्योतक था तो अगला दृश्य सिनेमा के कद्रदानों के लिए एक अजूबा है. एक अन्तराल धुन का, फिर एक छंद, फिर एक अन्तराल धुन के साथ और फिर एक छंद, और फिर अंत में मुखड़ा, सब कुछ सिर्फ एक दृश्य में.

यह भावी निर्देशकों के लिए सबसे बड़ा सबक है. सब कुछ करना अप्रत्यक्ष रूप से बहुत कठिन है क्योंकि हम सब अपनी योग्यता दिखाने में विश्वास रखते हैं, छिपाने में नहीं.

यही विजय आनन्द को और भी महान बनाता है. यह पढ़ने से पहले शायद ही हममें से किसी ने इस पर ध्यान दिया हो. यहाँ निर्देशन इतना सुन्दर है कि कुछ भी कमतर नहीं लगता. अभिव्यक्ति, शब्द, संगीत. हर शब्द का मतलब निकल कर आता है. देव अपनी पंक्तियों के साथ अंततः वहीदा को अपने प्रेम का यकीन दिला देते हैं. वह अपने भीतर के द्वन्द को समाप्त करती है और देव के प्रेम को स्वीकार करती है. वे उस रात का सामना करने एक साथ चलते हैं और उनका प्रेम गोचर हो जाता है.

“तेरे दुःख अब मेरे, मेरे सुख अब तेरे
तेरे ये दो नैना,चाँद और सूरज मेरे।”

फिर से एक अन्तराल धुन के साथ और वाह! सैक्सोफोन (मनोहरी सिंह) और संतूर (शिव कुमार शर्मा) के बीच एक जुगलबंदी.

और फिर अंतिम छंद,

“लाख मन ले दुनिया, साथ न ये छूटेगा,
आके मेरे हाथों में, हाथ ने ये छूटेगा।”

मोहम्मद रफ़ी की सुरीली आवाज, संगीत और कलाकार, सब कुछ अद्भुत. और उस पर शैलेन्द्र के शब्द, अलौकिक. यहाँ गौर करने वाली बात है कि किस प्रकार से इस गीत के ही माध्यम से उस महिला के द्वन्द से उसके प्रेम के स्वीकार करने तक की मनः स्थिति बदलती है.

कौन सी महिला नहीं स्वीकार करती इस गीत के बाद?

और इस गीत के बारे में बात हो और मनोहरी सिंह का नाम न आये, तो यह एक अपराध होगा. बहुत से कलाकार वाद्य-यंत्र बजाते हैं, पर असली कलाकार वह हैं जो अपने वाद्य-यंत्र के माध्यम से एक संवेदना जगा देते हैं. मनोहरी उनमें से एक थे.

और एस. डी. बर्मन, शैलेन्द्र और विजय आनन्द का यह गीत… अमर है.

(लेखक: दिनेश शंकर शैलेन्द्र 
अनुवाद: मानस मिश्रा)