महादेवी वर्मा: एक नारी का छायावाद

महादेवी वर्मा के जीवन के कुछ क्षण तस्वीरों में

महादेवी वर्मा को छायावाद युग के सबसे प्रमुख रचनाकारों में गिना जाता है। छायावाद हिन्दी साहित्य का वह युग है जब प्रेम, प्रकृति और आत्मसात रचनायें अपने समय का प्रतिनिधित्व कर रहीं थीं। महादेवी वर्मा की रचनाओं में भी छायावाद एक अव्यक्त प्रेम की तरह अन्तर्निहित दिखाई पड़ता है। रचनाकार होने के साथ साथ एक नारी का प्रेम के प्रति दृष्टिकोण भी बहुत स्पष्ट रुप से दिखाई देता है। किन्तु नारी का जीवन हर आयु में अलग चरित्रों को निभाते हुए बीतता है। कभी वह बेटी है, कभी सखी, कभी प्रेमिका है और कभी माँ। परंतु इन सब जिम्मेदारियों को निभाते हुए वह एक दीप की भाँति जलती है जो प्रकाशित करती है उन सबका जीवन जो उसके सम्पर्क में आतें हैं।

महादेवी जी की रचनाओं में उन्होंने अपने जीवन को उकेरा है, अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है और उन सब को अंकित किया है जिनको उनके प्रेम ने प्रकाशित किया। उनकी रचनायें नारी जीवन का एक प्रतिबिम्ब हैं। हर अवस्था से होते हुए उनकी रचनावली उस शिखर पर पहुँची है जहाँ पर नारी की चंचलता, नारी के प्रेम, नारी के वात्सल्य, नारी के बलिदान और नारी के एकाकीपन की हर गाथा मिलती है।

प्रस्तुत है ‘छायावाद’ नामक पुस्तक से नामवर सिंह द्वारा लिखे गए कुछ विचार, छायावाद में नारी के अस्तित्व का उल्लेख करतीं महादेवी वर्मा की रचनाओं के दृष्टिकोण से।

“महादेवी की प्रतिक्रिया एक नारी की तरह घर की सीमा में ही हुई। परंतु उनकी भी आरंभिक रचनाओं में जो भावुक असंतोष और तीव्र पीड़ा मिलती है, वह अंत तक जाते-जाते बौद्धिक परितोष में शमित होने लगी। पहले जहाँ ‘अतृप्ति’ की प्रधानता थी, बाद में तृप्ति का काल्पनिक आनंद अनुभव किया जाने लगा। इतना होते हुए भी महादेवी को भीतर ही भीतर अपनी परिक्षीणता का अनुभव होता रहा। ऊपर-ऊपर आनंद और संतोष की फीकी हँसी थी तथा नीचे अपने मन से वे चुपचाप यही कहतीं थीं कि:

‘मधुर मधुर मेरे दीपक जल’

उन्हें अपने जलने में संतोष का अनुभव होने लगा। उन्होंने समझ लिया कि इसके अतिरिक्त जीवन कि अब और कोई गति नहीं है। इसलिए पीछे वे इस जलने कि क्रिया में और किसी भी तरह के बाहरी हस्तक्षेप को वारण करने लगीं। जिधर वह जा रही हैं, उधर जाएँ। कोई रोके क्यों? कोई दया क्यों दिखाए? जो होना है वह हो ले।

‘यह मंदिर का दीप, इसे नीरव जलने दो
अब ‘साँसों की समाधि-सा जीवन’ हो गया। कोई रास्ता नहीं सूझता।‘मसि सागर-सा पंथ बन गया।’

जो दीप पत्थर की कठोर दीवारों से बने हुए मंदिर में घिरा हो, उसका जीवन यदि साँसों की समाधि न हो जाये तो क्या हो? ‘यदि उसकी प्रतिध्वनि का इतिहास प्रस्तरों के बीच’ न खो गया होता तो क्या होता? निःसंदेह उसने उस निष्करुण मंदिर में अनेक मधुर गीत गाये, लेकिन जड़ देवता पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उन सबके उत्तर में बस ‘विहँसा उपल, तिमिर था खेला

उस दीप ने देखा कि उसकी आँखों के सामने ही न जाने कितने भक्त आये और अपने प्रणत शिरों से चन्दन कि देहली पर अंक छोड़कर चले गए। वरदान कि आशा में ‘झरे सुमन बिखरे अक्षत सित।’ और आशाओं की यह विफलता देखकर उसे विश्वास हो गया है कि इसी तरह ‘तम में सब होंगे अन्तर्हित।’

जो इतने भक्तों कि विफलता का साक्षी रहा है, स्वयं उस दीप का मन उन सबकी व्यथा तथा अपनी व्यथा से कितना व्यथित हो उठा होगा, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। इतने पर भी उसमें सुबह तक इसी तरह जलते रहने का आत्म संकल्प है। उसे अपने जलते हुए जीवन कि सबसे बड़ी सार्थकता यही प्रतीत होती है:

‘जब तक जागे दिन की हलचल
तब तक यह जागेगा प्रतिपल।’

जब दिन की हलचल जागेगी तो पता नहीं इतनी आत्माओं की समाधि-सरीखे इस मंदिर की क्या गति होगी? परंतु इस बीच वह मंदिर के आँगन का जो शून्य है, उसे ही गलाने की चेष्टा करना चाहता है। स्वयं तो उस मोमी दीपक को गलना ही है, इसलिए उस गलने को सार्थक करने के लिए वह अपने साथ-साथ उस अजिर का शून्य भी गलाना चाहता है! आखिर वह क्या करे? इतने पुराने मंदिर के पत्थर को वह अकेला दीप गला नहीं सकता। इसलिए वह लाचार होकर शून्य को ही गला रहा है। एक पीढ़ी की समाप्ति और दूसरी पीढ़ी के आने के बीच का जो अवकाश है, उसे अपनी क्षीण ज्योति से वह भरना चाहता है:

‘इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो।’

यही वह उदात्त भाव है, जो महादेवी के परवर्ती गीतों में भी इतनी गहरी पीड़ा उत्पन्न करता है।इसीलिए महादेवी के अंतिम गीत भी यथार्थ का गहरा पुट लिए हुए हैं। प्रसाद और पन्त की तरह उनमे आदर्श अथवा सुखद लोक में पलायन करने की भावना नहीं है। भारतीय नारी आखिर भागकर जा ही कहाँ सकती है? फिर भी आरंभिक गीतों की तीखी अतृप्ति में जो तड़प और ताजगी है, वह अंतिम गीतों के मंथर अवसाद में नहीं मिलती। पदावली और वाक्य रचना पर अवसाद हावी हो गया है। पहले के गीतों में जो ‘चोट’ है, वह तो कभी की गायब हो गई!”
 नामवर सिंह ( ‘छायावाद’ से)

इलाहाबाद में Crosthwaite college जहाँ महादेवी जी ने सुभद्रा कुमारी चौहान के साथ कविता लिखना प्रारंभ किया। महादेवी जी के अनुसार उनके जीवन के कुछ महत्वपूर्ण पाठ उन्होंने यहीं सीखे, कविता लिखने के अलावा।
वह पेड़ जहाँ सुभद्रा कुमारी चौहान के साथ वे बैठकर कवितायें लिखा करती थी जिसका जिक्र उन्होंने ‘मेरे बचपन के दिन’ में किया है
Crosthwaite college के गलियारे जहाँ रहकर कितनी ही रचनाओं की प्रेरणा जन्मी और छायावाद के युग की महान रचनाकार का आविर्भाव हुआ
प्रयाग महिला विद्यापीठ जहाँ महादेवी जी ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा कार्यरत रहकर बिताया और अनेकों महिला विद्यार्थियों एवं छात्राओं को अपने सानिध्य में शिक्षित किया। यहीं रहते हुए उन्होंने अपने बाद के जीवन की बहुत सारी रचनायें लिखीं।
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