‘हिन्दी पखवाड़ा’ या ‘पिछवाड़ा’?

इधर मुम्बई में कई गणेश पंडालों में भक्त जब ‘बेबी को बेस पसंद है’ पर श्रद्धा से झूमें जा रहे हैं तो उधर पूरे भारत के सरकारी संस्थानों, पब्लिक सेक्टरों और बैंकों में श्रद्धालु ‘हिन्दी पिछवाड़ा’, माफ़ कीजियेगा, ‘हिन्दी पखवाड़ा’ बड़े ही धूम-धाम से मना रहे हैं।

अब ‘बेबी को बेस पसंद है’ और ‘हिन्दी पिछवाड़े’ में आपको कोई समानता दिखे न दिखे मगर श्रद्धा ज़रुर दिखेगी। गाने और मनाने में श्रद्धा होनी चाहिए। तो 14 सितम्बर आ गया है यानि ‘हिन्दी दिवस’। श्रद्धालु लोग ‘हिन्दी पखवाड़ा’ मनाने में लगे पड़े हैं। उन्हें लोक व्यवहार, लोक बोली, लोक-भाषा से कुछ लेना-देना नहीं है। उन्हें इस बात से लेना देना नहीं है कि बाज़ारनुमा पंडालों में जाने वाले श्रद्धालु कौन सी बोली बोल रहे हैं और किस तरह का व्यहार कर रहे हैं। ‘हिन्दी’ के उदासीन उर्फ़ पठासीन उर्फ़ श्री श्री बाज़ार की ‘हिन्दी’ से ख़फ़ा हैं। जबकि बाज़ार चलाने वाले, ‘अंग्रेज़ी’ मीडियम में पढ़े-लिखे एक्सपर्ट्स ‘थिंक लोकल’ पर ज्ञान बाँट रहे हैं और अपनी दुकान चमका रहे हैं। कुछ इन दोनों के बीच हैं। उनमें से कुछ ‘हिन्दी’ को रिक्शे, खोमचे वाले आदि-आदि की भाषा समझते हैं तो कुछ ‘हिन्दी’ को ‘एक्ज़ॉटिका’ समझते हैं। कुछ ‘हिन्दी’ को फ़िल्मी गाने समझते हैं तो कुछ ‘हिन्दी’ को ‘नल्ला’ समझते हैं (नल्ला — जिसका मतलब है बिना काम का यानि पढ़कर कोई नौकरी नहीं मिलने वाली)। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ‘हिन्दी’ को अपनी ‘बिन्दी’ समझते हैं और जो बचे-खुचे हैं उन्हें इन सब बकवास से फ़र्क नहीं पड़ता।

जैसे हर साल मनाया गया था उसी तरह इस साल भी मनाया जा रहा है ‘हिन्दी पखवाड़ा’! असल में 1953 से ऐसा बताया और मनाया जा रहा है मगर हिन्दी है कि ‘हैपेनिंग’ ही नहीं हो रही है। आखिर ये कैसी हिन्दी है जिसे पिछड़ना बहुत पसंद है। और, इसे पछाड़ कौन रहा है?

‘लो, कर लो बात, अंग्रेज़ी पर दोष मढ़ना बंद करो यार। काहे अंग्रेज़ी को बीच में घसीट रहे हो। मतलब काहे? ऐ मुन्ना, आओ तनिक पिछवाड़े चलें…और देखें कि क्या कहता है अपना विकीपीडिया’ —
“स्वतन्त्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर 14 सितंबर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जो भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343में इस प्रकार वर्णित है:संघ की राज भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रुप अंतर्राष्ट्रीय रुप होगा। चूंकि यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया था। इस कारण हिन्दी दिवस के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया था। लेकिन जब राजभाषा के रूप में इसे चुना गया और लागू किया गया तो गैर-हिन्दी भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे और अंग्रेज़ी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा। इस कारण हिन्दी में भी अंग्रेज़ी भाषा का प्रभाव पड़ने लगा।”

तो जैसा कि ज्ञानी लोगों को पता है, आज हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों जनभाषा हैं। जब दोनों एक साथ रहेंगी तो हिन्दी में अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी में हिन्दी का कोलाबोरेशन होना आर्गेनिक है मगर ‘हिन्दी पिछवाड़ा’ मनाने वाले ऐसा नहीं मानते वो अपनी दुनिया में ‘चिल’ कर रहे हैं।

ये नई पीढ़ी वाली हिन्दी ही ‘नईवाली हिन्दी’ है। जैसा बोलते हैं, वैसा लिखते हैं। ‘नईवाली हिन्दी’ को अंग्रेज़ी या इंग्लिश से कोई इश्यू नहीं है। उसे अपनी दूसरी मातृभाषाओं से भी कोई मतभेद नहीं है। वो 365 दिन, 24 घंटे जी जाती है चाय की चुस्कियों में, गलियों की गपशप में, गलियारों की गलबहियों में, कॉर्पोरेट कॉरिडोर्स की कानाफूसियों में, सोशल साइट्स की रैंट्स में, मीम्स में और चैटिंग की चटोरेपन में। हालांकि कॉरपोरेट वर्ल्ड में आज भी अंग्रेज़ी का ही बोलबाला है। लेकिन मीटिंग्स में माहौल को इनफॉर्मल बनाने के काम हिन्दी ही आती है।

तो भाईयों बात इतनी सी है कि भाषा नदी की तरह होती है, वो अपने रास्ते बनाते चलती है। अब रास्ते में कंकड़ मिले, पत्थर मिले, इंग्लिश मिले या विंग्लिश मिले, नदी सबको समेटते, छानते-मानते बहती है। वो समय-समय पर अपनी धाराएं बदलती भी चलती है शायद इसलिए ही वो सदानीरा रहती है। वो किसी ‘हिन्दी के पखवाड़े’ का इंतज़ार नहीं करती। उसे तो स्कूलों, कॉलेजों और कॉरपोरेटों में क्रमशः एक अच्छा हिन्दी टीचर, एक अच्छा प्रोफेसर और एक अच्छा प्रोफेशनल चाहिए जो बता सके कि हिन्दी सिर्फ़ प्रेमचंद से शुरू होकर गुलज़ार तक ख़त्म नहीं होती। हमें कोई ऐसा श्रद्धालु चाहिए जो बता सके कि हिन्दी जिस लिपि में लिखी जाती है उसे ‘देवनागरी’ कहते हैं और ‘देवनागरी’ में लिखी जाने वाली 120 भारतीय भाषाएँ हैं। हाँ, आपली मराठी भी।

सच पूछो तो हिन्दी का ‘Cool काल’ यही है ब्रो! इसका क्रेडिट गूगल और फेसबुक जैसी आईटी कंपनियों को जाता है। हिन्दी फ़िल्मों और हिन्दी विज्ञापनों को जाता है। आज ज़्यादातर विज्ञापन हिन्दी में सोचे और लिखे जाते हैं। आज की हिन्दी के उन प्रकाशकों को भी जाता है जो किसी सरकारी लाइब्रेरी में शोभा बढ़ाने वाली किताब की तलाश में नहीं हैं, बल्कि टेक-सैवी युवाओं के दिल में जगह बनाने के जुगाड़ में लगे हैं। इसका क्रेडिट उन युवा लेखकों को भी जाता है जो बिना हिन्दी के मठाधीशों के आशीर्वाद और बिना सरकारी सम्मानों के जी रहे हैं, लिख रहे हैं और पढ़े भी जा रहे हैं। हिन्दी अख़बारों और टेलीविज़न की भी अहम् भूमिका है। हिन्दी में छपने वाले पोर्टल्स और एप्प्स हिन्दी को आज के मिल्लेनियल्स के लिए एक्सेसिबल बना रहे हैं।

‘हिन्दी पखवाड़ा’ जैसे सरकारी अनुदानों से चलने वाले कार्यक्रम नहीं चाहिए। हिन्दी को ‘पिछवाड़े’ ले जाने वाले कर्त्ताधर्ता नहीं चाहिए। हिन्दी को किसी कॉरपोरेट हिंदुस्तानी-अंग्रेज़ का ठप्पा नहीं चाहिए। हिन्दी को कोई गॉडफादर नहीं चाहिए। हिन्दी को आप और हम चाहिए। दिल चाहिए। धड़कन चाहिए। 365 दिन। 24 घंटे। बिंदास। बेख़ौफ़। बेलाग।

इसलिए यहीं आकर दिल कह उठता है,

“जब भी तेरी बज़्म में होता हूँ मैं, एक मुकम्मल नज़्म होता हूँ मैं।”

अपनी प्रतिक्रिया देने में संकोच न करें — rupeshkashyap@gmail.com

One clap, two clap, three clap, forty?

By clapping more or less, you can signal to us which stories really stand out.