Ranjana Mishra
Feb 23, 2017 · 5 min read

क्या है ज्ञान? और किसलिए ज्ञान?

हमारे सामने दो ही सच्चाइयाँ हैं, एक जीवन दूसरी मृत्यु. इनके बीच की सारी स्थितियाँ परिवर्तन और संघर्ष से उपजी विभिन्न भावात्मक, मानसिक और शारीरिक स्थितियाँ हैं जो बदलती रहती हैं.

मृत्यु के विषय में दो राय नहीं हो सकती — यह अंतिम और अकाट्य सत्य है और अगर मृत्यु सत्य है तो जीवन भी उतना ही सत्य है, क्योंकि एक दूसरे के बिना दोनो अधूरे हैं. ज्ञान का कोई औचित्य नहीं अगर वह इन दोनो में से किसी भी सच्चाई से जुड़ा नही, उसके विविध आयामों की चर्चा नहीं करता, संकट की घड़ियों में हाथ थामकर नहीं चलता और इन दोनो के बीच समन्वय नहीं करता.

जीवन गतिमान है, मूर्त और अमूर्त दोनो है, ज्ञान पाने और उसे परखने का अवसर है. पर चलायमान, गतिमान जीवन में ज्ञान कैसे स्थूल और स्थिर हो सकता है? जीवन तो हर क्षण बदल रहा है, जो ज्ञान पिछले क्षण हाथ थाम कर चल रहा था कोई ज़रूरी तो नहीं इस क्षण भी हाथ थाम कर रास्ता दिखाए. बदलते हुए जीवन के साथ आनेवाला ज्ञान बदलता जाता है, पर हमारी कंडीशनिंग उसे देख कर भी अनदेखा करती है, स्वीकार नहीं करती या उससे संघर्ष की स्थिति में रहना चाहती है. कम शब्दों में कहें तो हम अपने कंफर्ट ज़ोन में रहना चाहते हैं. हम सब के अपने अपने कंफर्ट ज़ोन हैं, और एक दूसरे से अलग हैं, जैसे हर इंसान एक जैसा नहीं, उसके कंफर्ट ज़ोन्स भी एक जैसे नहीं. इसलिए किसी एक का ज्ञान दूसरे का अज्ञान बन जाता है, किसी एक का विस्तार दूसरे की सीमा बन जाता हैै .पर यह भी उतना ही सच है कि हर आने वाला क्षण, असीमित संभावनाओं के साथ आता है. हर क्षण हम ज्ञात या अज्ञात रूप से अपने कॉम्फर्ट ज़ोन में बने रहने का निर्णय लेते हैं या इसे छोड़कर आगे बढ़ जाने को तैयार रहते हैं. और यही चुनाव अंततः हमारी नियति निर्धारित करता है.

पर इस बदलते हुए ज्ञान के पीछे कोई और शाश्वत तत्व है जिसकी झलक हमें कब और कैसे मिलेगी, बता पाना मुश्किल है. वह चिरंतन है, काल के चक्र से परे है.

उम्र के इस पड़ाव में मुझे प्रेम से बड़ा ज्ञान कुछ भी नहीं लगता. प्रेम ही समाधान दिखता है मुझे. सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं हर किसी के लिए. प्रेम पूर्ण हो जाना , या फिर संघर्ष और कटुताओं के बाद भी अपने भीतर प्रेम को बचाए रखने की कोशिश करना, यही सबसे कठिन काम है. संकट तब होता है, जब प्रेम हमारे भीतर सूखने लगता है, हमारे भीतर की नमी ख़त्म होने लगती है, प्रेम विहीन अन्तस्तल की मिट्टी पर ज्ञान का पौधा नहीं पनपता और अगर थोड़े समय के लिए पनप भी जाए तो अधिक देर तक जीवित नहीं रहता, ज्ञान की तपिश इसे मुरझा देती है.

संसारी अर्थ में प्रेम में विनिमय भी होता है, एक्सचेंज. जहाँ प्रेम नहीं मिले वहाँ भी प्रेम देते जाना बिना किसी कड़वाहट के, सचमुच मुश्किल है, कई बार हम अपने अतीत को इतना महत्व देते हैं कि वह भविष्य का मार्ग अवरुद्ध कर देता है. रूढ़ परंपराओं, स्मृतियों और व्यक्तियों से जुड़े रहकर वर्तमान को जीना भूल जाते हैं. प्रेम करनेवाला मन तो बहती नदी की तरह होता है, कहीं रुक जाना इस नदी का पोखर में बदल जाना है. यहाँ कोई नैतिकता काम नहीं करती, और अधिकतर जिसे हम नैतिकता कहते हैं, वह भी तो कंडीशनिंग ही होती है. जब जीवन ही गतिमान है तो इसके मूल्य कैसे स्थिर, स्टेटिक हो सकते हैं.

प्रेम सहज ही आता है, अगर आप प्रेम के एक्सचेंज का माध्यम मान लें खुद को. किसी प्रेमपूर्ण क्षण में रास्ते चलते लोग अच्छे लगते हैं, फूहड़ लिपस्टिक लगाई हुई लड़कियाँ अच्छी लगती हैं, झगड़ते हुए बच्चे अच्छे लगते हैं, चुगली करते बूढ़े बुढ़ियाँ सभी अच्छे लगते हैं, क्योंकि इन सबके भीतर संभावनाओं से भरा जीवन है, तो मेरा मार्ग शायद प्रेम का मार्ग है, एक समय था जब ज्ञान ही मुझे समझ आता था, दुखी थी मैं — चीज़ें जैसी हैं वैसी क्यों हैं, जो घटा वो क्यों घटा, (सवाल और भी थे, अब भी हैं. पर अब वे दूसरे हैं). पिछली सीढ़ी की समझ अगर आगे का रास्ता न दिखाए तो क्या औचित्य? ज्ञान अगर हमारी मिट्टी ज़्यादा नम न करे और प्रेम भरा हृदय ज्ञान की तरफ खुद ब खुद न खिंचा चला जाए, आकृष्ट न हो तो क्या फायदा? प्रेम और ज्ञान जब दोनो एक दूसरे का हाथ पकड़कर चलें हमारे भीतर, तो किस मोक्ष की ज़रूरत ! यात्रा ही अपने आप में मोक्ष न हो जाए भला ! इसलिए मैं नास्तिक हूँ, क्योंकि लोगों में ही मुझे जीवन और जीवन के स्त्रोत दिखते हैं, उनके भीतर पूरा संसार दिखता है, इस संसार के अलग अलग लेयर्स दिखते हैं, संभावनाएँ दिखती हैं — संभावनाएँ प्रेम की और ज्ञान की. यही सौंदर्य है. अपूर्णता से पूर्णता की ओर की निरंतर यात्रा. व्यक्ति की, समाज की, देश की या फिर इस अखिल ब्रह्मांड की, और इनके आलोक में अंतिम सत्य कोई ग़ूढ चीज़ नहीं रह जाती फिर. ‘ अहम ब्रह्मास्मि ‘ और ‘ शिवोSहम ‘ का नाद खुद ही मुखर हो उठता है भीतर.

निर्वाण या मोक्ष कोई स्थाई अवस्था नहीं, इसके क्षण आते जाते रहते हैं जीवन में और यहीं मेरा सत्य है.

मृत्यु के विषय में हमारी सच्चाई बस यही है कि एक दिन हम सब उस अनंत यात्रा की ओर चल निकलेंगे जो अज्ञात है. मृत्यु भय की तरह आती है क्योंकि सिर्फ़ ज़िंदा लोग ही मृत्यु का दुख झेलते हैं, मृत लोग नहीं. मृत लोग हमें बताने नहीं आते कि जीवन अच्छा है या मृत्यु! रहस्य के आवरण के पीछे की अधिकतर चीज़ें हमें डराती हैं, अस्थिर करती हैं. इसलिए मृत्यु हमें डराती है और इस डर का सामना करने के लिए हम कितने ही सहारे लेते हैं, और हर सहारा हमें और असुरक्षित करता जाता है, क्योंकि उसके मूल में भय होता है. इस भय को अगर हम प्रेम से बदल दें तो क्या मृत्यु इतनी ही भयावह लगेगी, इतनी ही यातना पूर्ण लगेगी? क्या जीवन भी एक कंफर्ट ज़ोन नहीं और मृत्यु इससे बाहर जाने का द्वार?

मैं नहीं जानती मृत्यु से संबंधित जो अनुभव मुझे हुए थे, उन्हें किस श्रेणी में रखूं पर मैं खुश हूँ, खुद को भाग्यशाली समझती हूँ कि वे अनुभव मुझे हुए, और अब मैं मृत्यु से नहीं डरती, पीड़ा से डरती हूँ पर ये भी जानती हूँ कुछ भी स्थाई नहीं, सब कुछ बीत जाता है, बह जाता है.

समंदर किनारे से देखा, शायद महसूस भी किया होगा, लहरें आती हैं जाती हैं और समंदर वहीं का वहीं, अपने पूरी विशालता और फैलाव के साथ. ठीक समंदर की लहरों की तरह, जीवन और मृत्यु काल से किनारों पर बह आने वाली लहरें हैं जो हमें बार बार छूती रहती हैं और इन सबके परे, एक विशाल समंदर है.

यही है मेरी सच्चाई, मेरा विश्वास जो मेरे अंदर जी उठता है समय आने पर, और कठिन संकट भरे समय में मेरा हाथ थाम लेता है.

तुम्हारी - तुम जानते हो, या ढूँढ लोगे.

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Thanks to Bhole Vishwakarma

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