क्योंकि देवदास मरते नहीं..

तेरी बेरुख़ी के सदक़े मेरी ज़िन्दगी की खुशियाँ 
तू अगर इसी में ख़ुश है, तो ख़ुशी से कर जफ़ायें 
वो न आयेंगे पलट कर उन्हें लाख हम बुलायें 
मेरी हसरतों को कह दो कि ये ख़्वाब भूल
जाएं

दूर कहीं से साहिर को गाते, देवदास की पास आती आवाज़ की ओर सर उठा के देखा तो लगा मानों वह बैसाख की किसी दोपहर से दौड़कर आ रहा हो। आते ही हमेशा की तरह, साथ बैठकर कॉफ़ी पीने की दिक करने लगा।

मैंने कहा ‘बिज़ी हूँ अभी, नहीं सुनने तुम्हारे उदासी के क़िस्से

वो माना ही नहीं, सिगरेट पर सिगरेट फूंकता रहा।

मैंने कहा ‘क्यों दाढ़ी बढ़ाये घूम रहे हो मियाँ, सिगरेट शराब में डूबे हुए होना भर देवदास होना है क्या?’

वो बोला ‘नहीं संसार में रहकर बैरागी होना सीख रहा हूँ… देवदास का चोला भर पहनना नहीं है देवदास होना। देवदास होना उसकी मोहब्बत को, शिद्दत को सहेजना और जीना सीखना है। मैं वही सीख रहा हूँ।’

‘चल, तेरे संग चाय पीते हैं फ़िलहाल’

और कोई काम तो ये जनाब होने नहीं देंगे।

जब बात मोहब्बत की होगी तो मुस्कुराहटों का सैलाब उमड़ेगा। कुछ किस्से दर्ज होंगे, कुछ नग़मे गाये जायेंगे, कायनात मुस्कुरायेगी, ये धरती गुनगुनायेगी… लेकिन कुछ और भी होगा इस सबके साथ। कुछ ज़ख्म भी उभरेंगे, कुछ स्मृतियाँ भी चहलकदमी करेंगी, कुछ टूटे दिल के टुकड़ों में भी स्पंदन होगा…देवदास की याद भी आयेगी।

वही अपना देवदास जो बैसाख की किसी दोपहर में स्कूल से भाग जाया करता था, वही देव जो पत्तो यानी पारो की चोटी भी खींचता था और उसे कूटता भी था, वही देव जो ज़माने से हमकदम होकर चलने के लिये मजबूर किया तो गया लेकिन ज्यादा दिन चल न सका…वही देव जिसने पारो के अभिमान पर चोट का टीका लगाकर विदा किया और उसकी मोहब्बत सीने में लिए ज़िन्दगी भर सुलगता रहा…शरत बाबू के उपन्यास में भले ही वो मोहब्बत में जान दे बैठा हो लेकिन मरा अब भी नहीं। देवदास मरा नहीं…क्योंकि देवदास मरते नहीं…

शरत बाबू की दुनिया से आज यूनिवर्सिटी कॉलेज, दफ़्तरों तक पहुँचते-पहुँचते यह देव थोड़ा दुनियादार भी हुआ है। अब वो जानता है कि प्रेम माने मजबूत आर्थिक आधार। वो भुवन बाबू जैसे दोस्तों के साथ चंद बूंदें गटक लेने में बुराई नहीं मानता लेकिन उसे उठकर सुबह वक्त पर ऑफ़िस पहुँचने की पाबंदी याद रहती है। मोहब्बत के नशे में डूबा आज का देव अक्खड़ भी है, गर्वीला भी और मोहब्बत से सराबोर भी।

देवदास इश्क़ में दर्द सह रहे आशिक़ का मिथक बन चुका है। आज हर इश्कज़दा लड़का इश्क़ में ज़रा सी खरोंच आते ही ‘देवदास हो गया…’ जैसे जुमलों से नवाज़ा जाता है। हर आशिक़ के पिता के भीतर नारायण मुखोपाध्याय साँस ले रहा है।

पारो तब भी निर्भीक थी, ज़माने के कहे-सुने से बेपरवाह, आत्मसम्मान से भरपूर और साँस-साँस मोहब्बत करने वाली वो अब भी निडर है। प्रेम में समर्पण करने को दिलो-जान से आतुर भी, आत्मसम्मान बचाने को कटिबद्ध भी और मोहब्बत को इबादत बनाकर जीने का सलीका बना लेने वाली भी।

कभी ज़माने के आगे, जाति-पाँति, वर्ग-भेद की दीवारों और अहंकार से चाहते हुए भी न भिड़ पाने वाले, ज़माने के साथ चलने की कोशिश करने वाले लेकिन इश्क़ के जुनून में सब कुछ लुटा देने वाले देवदास को तो ज़माने के साथ बदलना ही था। कुछ हैं जो बदल पा रहे हैं कुछ अब भी हार मान लेने को मजबूर हैं।

ज़माने के एक सिरे पर खड़ी पारो देवदास से कहती है:

‘ मैं अपनी यात्रा पूरी करने को तैयार हूँ? क्या तुम हो?’

नये ज़माने के देवदास के पास अब नारायण मुखोपाध्याय यानी अपने पिता का मुँह देखने की फ़ुरसत नहीं। उनके फ़रमान पर जबरन कलकत्ता चले जाने की बेचारगी नहीं। आज का देवदास दर-दर भटककर पारो के लिए बिसूरना नहीं चाहता। वो बिसूरने को, जुदाई को उठाकर परे रख आना चाहता है। वो पिता की संपत्ति चंद्रमुखी पर लुटाकर, अपनी ज़िन्दगी को बीमारियों के हवाले करके मौत के हवाले करने को, अपनी पारो को किसी और के साथ जाते देखने को राज़ी नहीं।

यह सच है कि 1917 से 2016 तक देवदास की मिथकीय अवधारणाओं ने एक लंबी यात्रा तय की है लेकिन जो एक बात तब भी थी, अब भी है वो है मोहब्बत की शिद्दत। कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि प्रेम को ज़ाहिर किस तरह किया गया। बात तो सिर्फ इतनी है कि प्रेम है किस कदर गहन। गुलाब के फूल, टेडी बियर, चॉकलेट, सिनेमा, वॉट्सएप, फ़ेसबुक ऐसे नहीं कि इनमें प्यार की ख़ुशबू नहीं होती होगी लेकिन ये हैं महज इज़हार के माध्यम ही। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने और बहुत सारे माध्यमों ने एक काम बुरा किया कि मोहब्बत के बीज को मन की, ज़ेहन की धरती के अंदर ठीक से पनपने नहीं दिया। इससे पहले कि ठीक-ठीक महसूस हो सके कि हाँ, यही प्यार है…इसके पहले कि मोहब्बत रगों में दौड़े और आँखों में तकलीफ़ का समंदर उमड़ आये, इसके पहले कि खुद को समझ सकें, भावनायें अभिव्यक्त हो चुकी होती हैं। कच्चे अहसासों की कच्ची अभिव्यक्ति का सफ़र बीच में ही डगमगाने लगता है और इल्ज़ाम प्यार के माथे पर आता है।

जो बीच सफ़र से लौट रहे हैं वो नहीं जानते देव होने का असल अर्थ कि देव होना इश्क़ के कभी न उतरने वाले नशे में पैठना है, जिसमें बीच से लौट जाने का या रास्ता बदल लेने का कोई चुनाव नहीं। उन्हें समझना भी है कि दाढ़ी बढ़ाकर घूमना, नशे में सराबोर होना और चंद दिन पारो की याद में बिताकर नई पारो या चंद्रमुखी की तलाश में निकल पड़ना नहीं है देव होना।

शरत बाबू के देवा ने आज के देव-डी तक तमाम तमाम यात्रायें तय की हैं। देह की वर्जनाओं में उसे अब यकीन नहीं। मरने को वो तैयार नहीं, जीने में यकीन करता है, और पारो को किसी क़ीमत पर किसी भुवन बाबू के संग ब्याह दिये जाने को चुपचाप देखने को वो राज़ी नहीं। हालांकि प्रेम का अभीष्ट विवाह नहीं है फिर भी आज प्रेम-विवाहों की संख्या बढ़ रही है। भले ही देवदास एक टूटे हुए आशिक़ का मिथक बन चुका हो लेकिन सच यह भी है कि देवदास होना आसान नहीं। मोहब्बत को, दर्द को, जुदाई को बूंद-बूंद पीना आसान नहीं। सामने प्राणप्रण से न्योछावर चंद्रमुखी हो तो भी पारो के प्रति एकनिष्ठता को गले लगाये रखना आसान नहीं। देवदास होना, अफ़ेयर होने और ब्रेकअप होने जैसी शब्दावलियों से बहुत पार की चीज़ है। यह एक ब्रेकअप के चंद लम्हों या महीनों बाद ही ‘इन अ रिलेशनशिप’ जैसे स्टेटस से बहुत दूर की बात है।

देव या पारो होना इश्क़ के समंदर में बिना तैरना आये कूद जाने जैसा है…

आज का देव तनिक हड़बड़ी में है…

ऐसे में शरत बाबू का देवा मुस्कुराकर कहता है,

‘तुम मत जाने देना पारो को…किसी के भी कहे सुने में आकर…’
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