न्वानयेरुवा: नारियों का एक संघर्ष

Image: Manas Mishra
“१९१४ में, नाइजीरिया के ब्रिटिश राज्यकर्ताओं ने प्रशासन का ढाँचा बदलने की तो पहल की, लेकिन परंपरागत सत्ताकेंद्रों की रचना पर कोई ध्यान नहीं दिया। अप्रत्यक्ष तरीके से नाइजीरिया पर शासन चलाने के लिए इग्बोलैंड प्रदेश में ब्रिटिश सरकार ने लोकल न्यायालयों की स्थापना की, और स्थानिक प्रतिनिधियों को वारंट चीफ (न्यायाधीश और पुलिस अफसर) का दर्ज़ा दिया। नाइजीरिया की औरतें, जिन्हें हर लगान, चुंगी या टैक्स से हमेशा छूट रही, उनसे भी इन वारंट चीफों ने टैक्स जबरन वसूलना शुरू किया।”

इग्बोलैंड की सत्ता पहले बहुत ही विकेन्द्रित थी। बड़े-बुज़ुर्ग और महिलायें सारे निर्णय लेते थे, लेकिन अब इन वारंट चीफ लोगों में सत्ता केन्द्रित हो गई, और वे अनिर्बंध तरीके से जनता पर अत्याचार करने लगे, मनमाना टैक्स वसूलने लगे। अब इग्बो परिवार अपना निर्णय खुद से नहीं ले सकता था। वारंट चीफ की मनमानी से उन पर निर्णय लादे जाते थे। यद्यपि इग्बो स्त्रियों के नेटवर्क बहुत ही सशक्त और सक्षम रहा करते थे और वे अभी भी कायम थे।

“महिलाओं को इग्बो समाज में बहुत ही अहम् स्थान प्राप्त था, और बुज़ुर्ग महिलाओं का पारंपरिक प्रशासन में बहुत बड़ा किरदार हुआ करता था। इग्बो समाज में महिलायें सर्वोच्च सम्मान पाती थीं, और कई बार समूहों की मुखिया भी होती थीं। ब्रिटिश सत्ता आने पर यह सब तेजी से बदलने लगा। विशेषकर, महिलाओं का महत्त्व कम होने लगा। अपने घरेलू निर्णय लेने में भी उन्हें वारंट चीफ के सनकी मनमानेपन से जूझना पड़ता। पहले महिलायें शादी के प्रस्ताव को नकारने का हक रखती थीं, मगर वारंट चीफ के दमनकारी शासन ने यह हक़ भी उन से छीन लिया। अपने पद का खूब गलत इस्तेमाल करते हुए, वारंट चीफ किसी भी औरत के मवेशी जब्त कर लेते, और उन्हें असहाय बनाकर, मजबूर करके उनका शारीरिक और आर्थिक शोषण करते।”

अक्तूबर १९२९ में, नाइजीरियन वृद्ध महिला न्वानयेरुवा के घर, एक जनगणना करनेवाला आया। उसे वारंट चीफ ने भेजा था। हर परिवार को कर देना होता था, और यह कर परिवार में सदस्य कितने हैं, इस पर निर्भर करता था। जनगणना वाले ने न्वानयेरुवा के परिवार के सदस्यों में उसके घर के गाय, बैल, मुर्गियों आदि जानवरों को भी गिना। वास्तव में स्त्रियों को कर मुआफ था। न्वानयेरुवा ने पूछा, ‘क्या अपनी माँ को भी गिनकर आए हो ?’ जनगणना करने वाला चला गया। न्वानयेरुवा ने अपने शहर ओकोलो की अपनी सारी सहेलियों के नेटवर्क में यह बात पहुंचाई, और सारी महिलायें जनगणना वालों के साथ ऐसे ही पेश आने लगीं। और छिड़ गया एक अहिंसक आन्दोलन, जो केवल महिलाओं ने चलाया, और सरकार को अपने आगे झुकने पर मजबूर किया।

न्वानयेरुवा

न्वानयेरुवा ने अपनी सहेलियों को खजूर के पत्ते दिए और उनसे कहा कि अब से खजूर के पत्तों का मतलब होगा, औरतें किसी भी वारंट चीफ को अपने घर में जनगणना करने नहीं देंगी। उन्होंने महिलाओं को टैक्स न देकर अपनी आजीविका चलाने के लिए भी प्रेरित किया। यह असहकार का मूक सन्देश उन्होंने सारे इग्बो महिलाओं तक खजूर के पत्तों के ज़रिये पहुँचाया। महिलाओं ने वारंट चीफ को अब अस्वीकार करना शुरू किया, और वारंट चीफ के महिलाओं से टैक्स न वसूल पाने के परिणामवश उनकी कमाई में घटौती होने लगी।

“अब तक ब्रिटिश सरकार ने इस असहकार को गंभीरता से नहीं देखा था। मगर १९२९ के नवम्बर तक, इग्बो महिलायें आकुल और क्रोधित होने लगी थीं। उन्होंने जुलूस और रैलियाँ आयोजित करना शुरू किया, और ब्रिटिश शासन चौंककर जाग गया। लेकिन फिर शासन एक गलती कर बैठा। महिलाओं के इस सुनियोजित और संघटित आन्दोलन को वे बस एक गुस्से का तात्कालिक विस्फोट समझ बैठे थे, जो कुछ समय में शांत हो जाता।”

ब्रिटिश शासनकाल में, खजूर की गुठलियों और पाम तेल की बिक्री इग्बो लोगों का आजीविका का मुख्य स्त्रोत बन चुका था। १९२५ में सरकार ने इन पर टैक्स लागू करना शुरू कर दिया, जो इस व्यवसाय करनेवाले सारे पुरुषों पर लगा था। फिर भी, महिलायें इस से बच नहीं पाईं, क्योंकि यह टैक्स इतना ज्यादा था की महिलाओं को अपने अपने पतियों को इस टैक्स को चुकाने में मदद करने के लिए अपनी आय का बड़ा हिस्सा देना पड़ता था। १९२९ में, वैश्विक मंदी के चलते पाम तेल के भाव तेजी से गिरे और इसका बुरा असर इग्बो अर्थव्यवस्था पर पड़ा। ब्रिटिश सरकार ने टैक्स घटाने से इनकार किया, और इग्बो लोगों की मुश्किलें और बढ़ गयीं। अफवाहें फैलने लगीं कि सरकार अब महिलाओं पर भी टैक्स लागू करेगी, और महिलाओं का गुस्सा बढ़ता चला गया।

१९२९ नवम्बर की शुरुआत में, १०००० महिलाओं ने एक टैक्स विरोधी धरना में हिस्सा लिया, और ओकोलो के वारंट चीफ से लिखित आदेश की माँग की जिससे महिलाओं को टैक्स में पूरी छूट मिलेगी। जिला ऑफिस के बाहर महिलायें कई दिनों तक बैठी रहीं, और फिर सरकार ने वारंट चीफ को आदेश दिया कि वे महिलाओं का टैक्स माफ़ कर दें। इसका कोई सबूत दस्तावेज में नहीं मिलता कि ब्रिटिश सरकार महिलाओं पर टैक्स लादने की पहल कर रहा था, लेकिन महिलाओं के इस आन्दोलन के परिणामस्वरूप महिलाओं की टैक्स माफ़ी का जो आदेश सरकार को देना पड़ा, यह इन महिलाओं के लिए बड़ी जीत थी। कई अत्याचारी वारंट चीफों को भी इसके चलते पदत्याग करने पर मजबूर होना पड़ा।

ओकोलो के वारंट चीफ ने आदेश तो दे दिया, लेकिन वह अपनी ताक़त दिखाना चाहता था। उसने लठैत भेजकर कई आन्दोलनकारी महिलाओं को अगवा करना और उनका उत्पीड़न करना शुरू किया। यह खबर ओकोलो में तेजी से फैल गई और आन्दोलन ने विकराल रूप धारण कर लिया। दो दिनों के बाद, सरकार ने वारंट चीफ पर मुक़द्दमा चलाया, और उसे २ साल की जेल सुनाई। न्वानयेरुवा इस आन्दोलन में अग्रस्थान पर रहीं और महिलाओं के इस आन्दोलन को उन्होंने एक अविश्वसनीय जीत दिलाई।

इग्बो महिलायें

ओकोलो का यह आन्दोलन इग्बोलैंड में सारी महिलाओं को जगा गया। एक सामान्य वृद्ध महिला के नेटवर्क से शुरू हुआ यह आन्दोलन, इग्बोलैंड की सारी महिलाओं को टैक्स से मुक्ति दिला गया और इस टैक्स को समूल जड़ से उखाड़ फेंका। नाइजीरिया के इतिहास में यह आन्दोलन ओगु उमुन्वान्ये यानि विमेंस वॉर नाम से मशहूर है। ओगु उमुन्वान्ये का इग्बो बोली में अर्थ है, ‘औरतों का जान बूझकर पुरुषों के सर चढ़कर बैठना’। अपना अपमान करने वाले, या उत्पीड़न करने वाले पुरुषों का इग्बो महिलायें पीछा करतीं और उसको उसके किये गलत काम की याद तब तक दिलाती रहतीं, जब तक अपराधी पुरुष पश्चात्ताप से पानी-पानी न हो जाए और फिर कभी गलती ना दोहराने का वचन दे।

“हर गाँव, शहर में औरतें वारंट चीफ के ऑफिस के बाहर धरना देतीं और उससे टैक्स माफ़ी का लिखित आदेश माँगतीं। छह हज़ार वर्गमील में फैले इग्बोलैंड की महिलाओं ने अपना टैक्स इस आन्दोलन के ज़रिये माफ़ करवा लिया और भ्रष्टाचारी वारंट चीफों को उनकी नौकरी से बेदखल करवाया।”

ब्रिटिश राज्यकर्ताओं ने इस आन्दोलन की भूमिका को न समझते हुए उसे दरिंदगी का दर्ज़ा दिया। अहिंसक निषेध करनेवाली औरतों के समूहों पर उन्होंने गोलियाँ और लाठियाँ भी चलाई। ५० इग्बो औरतें मारी गईं, और कई घायल भी हुईं। लेकिन यह बलिदान व्यर्थ न गया। यह आन्दोलन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, कि इग्बोलैंड की अशिक्षित महिलाओं ने अपने ऊपर होने वाली ज्यादती का अहिंसक मार्ग से मुकाबला किया, और उनसे अपने आप को मुक्त करवाया। महिलाओं के संघटित संघर्ष की शायद यह दुनिया में पहली मिसाल थी, और ब्रिटिश सरकार को नाइजीरिया में इसके बाद हर फैसला महिलाओं के मत को मद्देनज़र रखकर करना पड़ा।

लेकिन नाइजीरिया की औरतों को संगठित कर न्वानयेरुवा ने इस विशाल आन्दोलन को खड़ा किया और स्त्री शक्ति का जो प्रमाण पूरी दुनिया को दिया, वह विश्व के इतिहास में अतुलनीय है।

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