फूल वाली बच्ची…

Image : Manish Gupta

यही कोई बारह तेरह की उम्र रही होगी, ट्रैफिक सिग्नल पर ऑटो रुका और वह बगल में आ गई। फूल थे हाथों में, पीले गुलाबी। उसे लगा शायद मैं खरीद लूँगी, इसलिए बड़ी आशा से मेरा चेहरा देखने लगी और इशारे से फूल खरीदने को कहने लगी। मैने कुछ जवाब नहीं दिया तो कहने लगी-

‘दीदी ले लो न। तुम्हारे लिए कम कर दूँगी, बीस रुपये दे देना बस।’

कितने ही तो बच्चे दिखते हैं, हर ट्रैफ़िक सिग्नल पर। छोटे छोटे बच्चे, कुछ ना कुछ बेचते हुए। कभी-कभी भीख भी माँगते हुए। कई बार उनसे दोस्ती करने की सोचती हूँ। कोशिश भी की एकाध बार, पर जान गई कि मैं और मेरे जैसे लोगों का इनकी अंदरूनी दुनिया में प्रवेश वर्जित है। कुछ पाने का ज़रिया हो सकती हूँ इनके लिए, पर स्वीकार नहीं करते ये बच्चे हमें।

कहाँ से आते हैं ये बच्चे? कौन हैं उनके माँ बाप? रोज़ सुनते हैं ख़बरों में, अख़बारों के पन्ने रंगे रहते हैं, सरकारी योजनाओं से - ‘आज इतने बच्चे किसी मजदूरी की जगह से छुड़ाए गए’। पर हर रोज़ बच्चे तो दिखते ही हैं सड़कों पर, बस उनके काम करने की जगह बदल जाती है। एक सिग्नल से दूसरे सिग्नल पर, एक चौराहे से दूसरे चौराहे पर।
इस एक शहर में न जाने कितनी गलियाँ हैं और उन गलियों में न जाने कितने घर। हर घर एक दुनिया है अपने आप में, तमाम तरह की अच्छाईयों बुराईयों के साथ! किसी ना किसी घर से तो आते हैं ये बच्चे, जहाँ ये सिर्फ़ बोझ और मजबूरी होते होंगे। शायद इसीलिए फेंक दिए जाते हैं इन शहरों में, अपने परिवार और दलालों के लिए कमाने को। मगर कितना सोचे कोई? और भी तो काम हैं करने को! सरकार क्या करेगी? आख़िर हमने वोट किसलिए दिया है? सब एक ही दिन में ठीक थोड़े ना हो जाता है! हमारे पास अपने तर्क वितर्क तो होते ही हैं! जिनकी आड़ में छिपकर हम अपना जीवन सरल बना लेते हैं।

बहरहाल, वो बाहर खड़ी बड़ी आशा से मेरा चेहरा देख रही थी और इशारे से फूल खरीदने को कह रही थी। मैं अहमदाबाद जाने को घर से निकली थी। थोड़ी देर भी हो गई थी। पर उसे सामने देखकर लगा फूल खरीद लूँ। एक ही गुच्छा बचा था उसके पास। मुझे वो बेचकर शायद उस दिन का काम हो जाता उसका। फिर सोचा अब रास्ते में फूल कहाँ रखूँगी। घर तो जा नहीं रही कि कहीं सजा दूँगी, यात्रा में अपना सामान क्यों बढ़ाऊँ!

मुझे क्या पता था यात्रा में सामान का बोझ न बढ़ाने की व्यावहारिकता मेरे मन का बोझ कितना बढ़ा देगी।

दुबली पतली साँवली सी बच्ची। गंदी सलवार कमीज़। दुपट्टा भी था गले से लिपटा। उलझे रूखे बाल, सूखे होंठ, पर सुन्दर कोमल चेहरा और पनीली आँखें, जैसे बोलती हुई सी, देखती रह गई बस। उसे शायद कुछ समझ नही आया, लोग या तो फूल खरीदते होंगे या फिर भगा देते होंगे। जो भी हो, वो मुझे अपने और मैं उसे अपने कारणों से देखती रही।

इसी कशमकश में सिग्नल हरा हो गया और ऑटो आगे बढ़ने लगा। अचानक उसके चेहरे पर घोर निराशा दिखी और मुझे अपनी ग़लती का अहसास हुआ। समझ नही आया क्या करूँ, चलते ऑटो से बस हाथ थाम लिया उसका। वो भी थोड़ी तेजी से ऑटो के साथ चलने लगी। और सच कहूँ तो शर्म आई अपने आप पर, क्या होता अगर फूल खरीद ही लेती! इतनी देर क्यों लगाई सोचने में, कितना कुछ तो खरीदते रहते हैं हम लोग, इतना नही सोचती तो क्या फ़र्क पड़ जाता!

पर्स से पैसे निकालने का समय नहीं था और आटो की स्पीड भी बढ़ रही थी। वो अब भी चलती जा रही थी ऑटो की बगल में। शायद दो चार सेकेंड, उसके हाथ मेरे हाथों में थे, पर वो दो चार सेकेंड मुझे अपनी अब तक की ज़िन्दगी के सबसे शर्मसार करने वाले दो चार सेकेंड लगते हैं।

ऐसे खुरदरे और सूखे हाथ किसी बच्चे के नहीं हो सकते, इतने कोमल और सुन्दर चेहरे वाली बच्ची के हाथ इतने कठोर कैसे हो सकते हैं? लकड़ी के टुकड़े जैसे सूखे हाथ! पता नहीं उन हाथों ने कैसे कैसे काम किए थे, कितने बोझ उठाए थे जो इस छोटी सी उमर में ही अपनी कोमलता खो बैठे थे! मुझे कई उन बच्चों के हाथ याद आ गए, जिनके माँ बाप उन्हें ज़रा सी चोट लगने पर आसमान सर पर उठा लेते हैं! कैसा समाज है हमारा, जहाँ कुछ बच्चों के चेहरे की कोमलता को खबर भी नही होती और उनके हाथों में बुढ़ापा आ जाता है! किसी न किसी घर से आते ही हैं ये बच्चे, क्या एक बार भी हम अपने घर के बच्चों को ऐसी असहाय, आशाविहीन जीवन देने की कल्पना भी कर सकते हैं? छी, मैं भी क्या सोचने लगी! सचमुच, क्या हमें हक़ है खुद को सभ्य कहने का? अंदर से तो हम सब असभ्य ही हैं, तभी तो हमारे बच्चे सड़कों पर मजदूरी करते है और हम अपनी ज़िन्दगी बस जिए जाते हैं। अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से परे सोचने और देखने की फ़ुर्सत ही नहीं हमें!
क्या पता कैसे कैसे हाथ थामेंगे उसे, कैसे कैसे और कहाँ कहाँ छुएँगे उसे, आज एक दलाल के लिए फूल बेचती बच्ची कल दूसरे दलाल के लिए खुद बिक जाएगी।

इस बात को दो तीन महीने हो चुके हैं। अब भी याद आती है वह बच्ची। कभी ट्रैफ़िक सिग्नल पर रुकती हूँ तो आँखें ढूँढती हैं उसे। शायद मिल जाए कभी। चेहरा तो ठीक से याद नही पर उसकी आँखें और हाथ अभी भी ताज़ा हैं ज़ेहन में। पहचान ज़रूर लूँगी। शायद कुछ और बेचती होगी, किसी और सिग्नल पर।

इससे ज़्यादा सोचने की हिम्मत नहीं होती!

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