आज छोड़ चलते हैं…

2015 is coming to an end, and with that a phase of life draws to a close. In wishing you all a very happy 2016, and indeed, the rest of your life, I also wish goodbye to the days that have passed… This poem is a celebration of the era that draws to a close today — childhood, with all its vicissitudes and victories, with all its charms and challenges, with all its memories.

I hope you had a great 2015. I wish you all the love, hope, strength, and fulfilment in 2016!

आज छोड़ चलते हैं…

आज छोड़ चलते हैं इस घर को,

अब और ठिकाना अपना है,

एक उम्र बिताई है इसमें,

अब और ज़माना अपना है…


इस ही के आँगन में पहली बार,

साँस भरी थी सीने में,

रंगों को नज़रों से चखा था,

होंठों पे आयी थी पहली किलकारी,

जब माँ ने गोद में रखा था,

उन किलकारियों के स्वर भूल गए ,

अब और तराना अपना है…


इस ही की बैठक में वॉकर में बैठे,

धीरे से, सहमे से क़दम बढ़ा,

अचानक यूँ ही चलने लगा था,

माँ के हाथों रसोई किनारे नहा,

सज-धज के “बाबू” बनने लगा था,

बाबू अपना आज मैनेजर हो गया,

अब और उठाना अपना है…


इन्हीं बरामदों में आँसू बहाए थे,

ज़िद्द की थी, मिन्नतों पर उतरना पड़ा था,

स्कूल बड़ी भयंकर सज़ा लगती थी,

पर याराना हुआ लफ़्ज़ों से ऐसा,

जैसे उसकी यही रज़ा लगती थी,

इस यार से मैंने, इसने मुझसे वफ़ा रखी है,

अब और निभाना अपना है…


इस ही की छत पर रातों-रात,

कभी ख़ुद से, कभी उनसे,

और अक्सर चाँद से गुफ़्तगू की थी,

चेहरे बदले पर चाहत वही रही,

इक बार इबादत की आरज़ू की थी,

दिल को बहकाया बहुत, बहलाया बहुत है,

अब दिल को लगाना अपना है…


इस ही के रोशनदानों से आती,

सुबह की किरणों में डूब कर,

ख़ुद को उस सूरज-सा करना चाहा था,

ख्वाहिश की थी एक मक़सद की,

कभी न मरना चाहा था,

वो किरणें आज पुकारती-सी खड़ी हैं,

आस्माँ पर कदम चढ़ाना अपना है…


यादें बहुत है इस घर में बैठी,

दोस्तों, रिश्तों, और फ़रिश्तों की,

जिन के साथ शामें जानी थी,

साथ हँसे थे, खूब रूठे थे,

लिखी यह सारी कहानी थी,

पर बचपन अब तुझसे विदा लेनी है,

इक नए दौर का बुलाना अपना है…


एक उम्र बिताई है इसमें,

अब और ज़माना अपना है…


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