Rakhi Singh
Sep 6, 2018 · 3 min read

गुरु

निकल पड़ी थी नई राह पर

हाथ में बस्ता, कंधे पर बोतल

वस्त्र भी पहने नए नए से

प्रवेश करते विद्यालय के प्रांगण में

थामा हाथ किसी मज़बूत हाथ ने

गुरु ही नहीं,

गुरूर है वो मेरा।


लेकर मुझे जब कक्षा में प्रवेश किया

प्रतीत हुआ किसी मेले जैसा

रंगों से भरी थी दीवारें

पर एक न उनमे मुझे सुहाई

सहमी हुई देख मुझे, कस कर पकड़ी उंगली उसने

गुरु ही नहीं,

गुरुर है वो मेरा।


धुंधली हो रही थी तस्वीरें

कपोलों से लुढ़कते मोती

नासिका के द्वार लेता

अभी चखे ही थे अश्रू

झट आकर उसने पोंछा

गुरु ही नहीं,

गुरूर है वो मेरा।


पहली बार जब नज़र उठाई

देखा तो वो माँ सी नज़र आई

वैसे ही कुण्डल, ठीक वैसी बिंदी

साड़ी ज़रा अलग नज़र आई

माँ की तरह मुझे हृदय से लगाया

गुरु ही नहीं,

गुरूर है वो मेरा।


थम गई थी सिसकियाँ

तब जाकर थोड़ी राहत आई

दीवारें रंगीन अब मुझे भी भाई

कुछ चित्र चिपकाये कुछ खेले हमने

निवाला भी उसने माँ सी बनाई

गुरु ही नहीं,

गुरूर है वो मेरा।


अब विद्यालय अच्छा लगता मुझको

जम कर कुर्सी पर भी बैठती

औरों से भी बातें करती

हँसती, ठिठलाती, उछलती, कूदती

उपस्थिति उसकी ढाढस देती

गुरु ही नहीं,

गुरूर है वो मेरा।


गिनती सही आती न मुझको

पर कक्षा था बदल गया

नई किताबें संग नई ख़्वाबें ले

नई कक्षा में प्रवेश किया

याद करके उसको नम हो जाती आंखें अब भी

गुरु ही नहीं,

गुरूर है वो मेरा।


वक़्त पकड़ चुका था रफ़्तार

बिना दिए अपने गुज़रने का एहसास

कक्षायें बदलती रही और सखाएँ भी

सीख रही थी कई नई भाषाएँ भी

अब याद कम आती थी उसकी

गुरु ही नहीं,

गुरूर है वो मेरा।


कपड़े जूते हो चले थे छोटे

बस्ते भी हो गए थे मोटे

कुछ किताबों की दुनिया में उलझे

कुछ बेपरवाह लड़कपन में

अब मिलना कम हो पाता था उससे

गुरु ही नहीं,

गुरूर है वो मेरा।


छूट गया फिर दामन विद्यालय का

पढ़ाई हो चली थी पूरी

मन में कई तरंगें थीं

उमड़ घुमड़ हिचकोले लेती

आतुर थी दुनिया से मिलने को

स्मरण न रहा मिलना उससे

गुरु ही नहीं,

गुरूर है वो मेरा।


पापड़ बेले कई किस्म के

सम्मुख नित नई चुनौती होती

सपनों का पीछा करते

दूर बहुत निकल पड़ी थी

रिश्तों में कई नए रम गई थी अब तक, भूल गई

गुरु ही नहीं,

गुरूर है वो मेरा।


एक दिन सहसा टकरा गई मैं उससे

पहचान न पाई उसके मुखड़े को

आंखों और मस्तिष्क में मतभेद हो गया मेरे

न बिंदी थी न कानों में कुण्डल

केश सफेद मानो रेशम के धागे

भौंचक्की रह गई ताकती

गुरु ही नहीं,

गुरूर है वो मेरा।


गौर किया काया पर उसके

चमक वही मुखमंडल पर थी

कमर कुछ झुक गए थे उसके

बाजुएँ भी शिथिल सी थीं

सिकुड़ गए थे चमड़े उसके

गुरु ही नहीं,

गुरूर है वो मेरा।


देखते ही मुझे पहचान लिया उसने

लबों पे उसके वही हँसी नज़र आई

बरसों बाद देखा था उसको

पर आज भी उसमें वही माँ नज़र आई

लिपट गले खूब रोई उसके मैं आज

गुरु ही नहीं,

गुरूर है वो मेरा।


प्रण किया आज मैंने उससे

अब न करूँगी ओझल खुद से

थाम कर रखूंगी उसी मज़बूती से

कंधे तेरे न बोझिल होने दूंगी

बारम्बार नमन है तुझको

गुरु ही नहीं,

तू गुरूर है मेरा।

Kyari

Khatte meethe ehsason ki kyaari

    Rakhi Singh

    Written by

    Rakhi Singh is a freelance writer who loves to pen her thoughts in the form of poetry as well as blogs. She is in love with Hindi and English literature.

    Kyari

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