Literary Impulse
Published in

Literary Impulse

तू अभी तक ज़िंदा है

ये कैसे यकीन आ जाता है

Photo by T R A V E L E R G E E K on Unsplash

तू अभी तक ज़िंदा है ये कैसे यकीन आ जाता है
तसवीरें सारी जला चूका हूँ तू फिर भी याद आ जाता है

मुठ्ठी भर से दिल में जैसे एक समुन्दर को बाँध रखा है
दीवारें पत्थर की नहीं हैं पानी आँखों तक आ जाता है

इंतिहा नहीं इन हसरतों की एक बाज़ार सा लगा रहता है
जैसे तैसे एक को हासिल करो तब तक दूसरा आ जाता है

झूठ की पहरेदारी को तहज़ीबों के हिजाब का नाम न दो
आँखें खुद-ब-खुद झुक जाती हैं जब सच सामने आ जाता है

मेरी ज़ुबान मेरी पहचान जैसे सियासती तिजोरियों में हो बंद
इस कदर बेबसी का आलम कि खून में उबाल सा आ जाता है

जला दो दफना दो या बहा दो इससे क्या तय हो जाता है
सौरभ एक ही जगह है मरने के बाद सब समझ में आ जाता है

--

--

A space for LITERARY FICTION, POETRY, PHILOSOPHY, POLITICS AND DIALOGUE with a mission of ‘social change through creative endeavours’.

Get the Medium app

A button that says 'Download on the App Store', and if clicked it will lead you to the iOS App store
A button that says 'Get it on, Google Play', and if clicked it will lead you to the Google Play store