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हवाएँ

और नारियल का एक पेड़

Photo by Ruben Gutierrez on Unsplash

रात हो चली थी
बारिश भी होने लगी थी
दिन भर की थकान थी आँखों में
पर दिल में कुछ खलबली सी थी

नींद शर्मा सी रही थी
दबे पाओं आती
मुस्कराती
फिर ओझल सी हो जाती
यहीं कहीं ही तो थी
पर दिखती न थी

रात भी कुछ खामोश न थी
बारिश समुन्दर को पसंद जो न थी
यूँ पैर पटकने लगा था
जैसे दहाड़ें मार के रो रहा हो कोई
कि सोने नहीं दूंगा

हवाएँ जागी हुईं थीं
इंतज़ार में ही थीं
घटाओं के छा जाने का
रात के हो जाने का
किसी को कुछ दिखाना था शायद
समुन्दर से दौड़ लगाने लगी थीं

आसमान छू आना है
किसी तारे को संग ले आना है
चाँदनी चाँद में नहीं जितनी
जवानी हम हैं उतनी
लहराती ऊपर जो वो चलीं
आसमान ने बाहें खोल दीं
तारों को न हो यक़ीं
चाँद भी गुमसुम कहीं
घटाएं गरजने लगीं
भौहें बिजलियों ने चढ़ा लीं
हवाएँ चिंघाड़ जो उठीं
धरती ये धड़कने लगी थी

नींद
नींद कहाँ अब आने वाली थी
महफ़िल अजब कोई सजने वाली थी
रात
रात कहर कोई बरपाने वाली थी

नारियल का एक पेड़ था वहीं
उसकी शामत थी आई हुई
हवाएँ जब ताव में आतीं
तो सम्भालना खुदको
मुश्किल हो रहा था उसको
जोर वो जितना लगाता
तना उसका उतना झुकता ही जाता
चटकता नहीं बस चटक ही जाता

पाओं उखड़े जा रहे थे
हाथ टूटे जा रहे थे
छटपटा उठता
तिलमिला उठता

क्या ये बला है
तुझको आज क्या हो गया है
आँखें लाल नीला चेहरा
बिखरे बाल गुस्सा गहरा
जाने किससे रूठ के आयी है
तबाही कैसी मचाने आयी है
बहुतों को मार चुकी है तू
जान क्या अब मेरी लेने आयी है

वैसे तो हूँ मैं तेरे लिए ही बना
नुकीले पंख मेरे और लम्बा चौड़ा तना
फूल पत्तियों से न किया कभी कोई मोह
सबसे ऊपर न कोई चाह न कोई विद्रोह
राह में पड़ जाता हूँ तेरी जो
राह बना दिया करता तेरे लिए दो
पर बात तूने कब मेरी मानी है
की हर बार तूने अपनी ही मनमानी है
रूप जो तू आज है दिखला रही
बनके मौत क्या मुझको है धमका रही

जानती नहीं है क्या तू मुझको
भीड़ में पहचाना नहीं मुझको
अनंत अजर अमर तू सही
अनल हूँ मैं क्षणिक ही सही
खिलौना समझ न तू मुझको
मिटा सकती नहीं ऐसे मुझको
धूल नहीं हूँ जो उड़ जाऊँगा
फूल नहीं हूँ जो बिखर जाऊँगा
साये अँधेरे कितने भी फैला ले तू
मैं वो नहीं जो डर के सो जाऊँगा
अगर मौत ही बनकर आयी है आज तू
फिर भी कबूल है तू मुझे
हंसकर गले लगाऊँगा

हवाओं ने जैसे कुछ सुना
पलट कर रुख जो अपना बदला
बाहें फैलाकर लपक वो उठा
बनकर मुठ्ठी हवा को जो पकड़ा
हवाएँ हंस पड़ीं
मुस्कराती उसकी ओर चलीं
कानों में उसके हलके से बोलीं
इतना क्या लड़खड़ाता है तू
देखा है हमने
झूमता ही नहीं
नाचता भी है तू

पकड़ कर हाथ उसके
खींचा जो उसे अपनी ओर
बिजली सी दौड़ गई तन में
उमंगें जाग उठीं मन में
बाहों में भर लिया उसने हवाओं को
निहारने लगा उन दिलकश निगाहों को
हवाएँ भी मस्ती में झूम गयीं
बनकर झूला बाहों में उसके झूल गयीं
इतराने वो लगीं चिढ़ाने वो लगीं
कभी उकसाने तो कभी समझाने वो लगीं
वो भी सब सुन रहा था
हाथ उसने थामे रखा था
फैलाकर पंख अपने
हवाओं में उड़ने वो लगा था
बनकर किनारा
लहरों को बाँध उसने रखा था

बारिश गुनगुनाने लगी थी
समुन्दर थिरकने लगा था
बादल मदहोश हो उठे थे
तारे खिलखिलाने लगे थे
महफ़िल अब सजने लगी थी
चाँद तो आया था ही
चाँदनी भी संग आयी थी
रात ने पलकें जो झुकाईं
नींद मुझे आने लगी थी

सोकर जब उठा
तो देखा
धूप निकली हुई थी
बारिश दूर दूर तक कहीं नहीं थी
समुन्दर आलस में लोटें मार रहा था
हवाएँ भी जैसे थक कर सो गयी हों
चिड़ियाएँ हरकत में आ चुकी थीं
डांटती फिर रही थीं सबको
और वो नारियल का पेड़
कंधे लटकाये
किसी बच्चे के माफिक चुपचाप खड़ा था
उसके आगे बड़े बड़े नारियल के पेड़ों की एक कतार थी
और वो उस कतार में सबसे पीछे
हवाएँ चल भी रही हों
तो उस तक कैसे पहुंचें
खड़े खड़े बोर हो गया था
उसकी भटकती नज़रें मुझ पर जो पड़ीं
तो एक शरारत सी दिखी उसकी आँखों में
इंतज़ार कर रहा हो जैसे
हवा के बस एक झोंके का

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