राम राम जी
आज सुबह से दिमाग में यही चल रहा है कि कुछ अच्छा लिखा जाय। किस विषय पर बात हो। सोच ने कहा कि यहां यानी पृथ्वी लोक पर हम क्यों आये हैं इसी पर चर्चा हो जाये।
इंसान का रूप प्राणी जगत में सबसे अच्छा है। यह जगत हमारी पाठशाला है। जहां हम सीखते हैं, अनुभव लेते हैं। आगे बढ़ते हुए अपनी आत्मा को या तो शुद्ध करते हैं या फिर अशुद्ध करते हैं।
हर इंसान बहुत बड़ा नाम नहीं कमा पाता है पर… जीवन भेड़ चाल में खोने की बजाय दुनिया में अमन चैन की एक नींव रखी जाय तो कुछ तो अच्छा कर के दुनिया से विदा होगें। सभी के दिलों में सालों राज करेंगे।यही करके अपनी आत्मा को शुद्ध रूप दे सकते हैं। परमात्मा के पास जायेगें तो अपने आप से संतुष्ट होकर जायेगें।
अपने आप में कोई भी संपूर्ण नहीं है। पर खुद को सुधारने का प्रयास तो कर सकते हैं। अगर आप निष्कपट और सकारात्मक सोच रखते हो तो ईश्वर खुद आपके साथ हैं। ढ़ोगीं मत बनिए। आप अपने आसपास के लोगों को मूर्ख बना सकते हैं, पर परमपिता परमेश्वर की नजर से नहीं बच सकते।
पंडितों से धर्म पुण्य का काम करवाना या दान करने से पहले एक बार तो सोचो क्या आप कुछ अपराध या पाप करने पर इसका पश्चाताप सबके सामने कर अपनी आत्मा की शुद्धि की है। किसी भी पंडित के पास क्षमा करने की शक्ति नहीं है। आत्मिक शांति तभी है जब आत्मा की शुद्धता की तरफ सोचे।
भगवान अच्छी आत्मा को ही संघर्षों के लिए चुनते हैं। इस लिए जीवन" में "तकलीफ़" उसी को आती है, जो हमेशा "जिम्मेदारी" उठाने को तैयार रहते है,
और जिम्मेदारी लेने वाले कभी हारते नही, या तो "जीतते" है, या फिर "सीखते" है. और इस दुनिया में अपने इस अनुभव से, लोगों को सीखने को बहुत कुछ मिले, इसके वो उदाहरण बन जाते हैं।
सब अच्छे होते हैं। बस सोच को बुरे से अच्छे कि तरफ दौड़ाना है।
आध्यात्मिक उन्नति ही आपको मृत्यु उपरांत अच्छे लोक की सैर करायेगी। इन सब के लिए साधु संत बनने की जरूरत नहीं है अपनी रोजमर्रा जिंदगी में भी कर सकते हैं।
हो सकता है आपने अपराध नहीं किया हो लेकिन बहुत से पाप किये हों। जैसे अपने लिए स्वार्थी होना, आप बुरे हो और यह मानना अपराधी होना नहीं है…..
परंतु…… स्वार्थ वश में किसी की सहायता, दान, दिखावा करने के लिए कुछ कार्य करना और यह सोच कि मुझे अगले लोक के लिए मुक्ति मिल जाये,… यह पाप है। दिखावा करना कि मै बुरा नहीं पुण्यात्मा हूं, मंदिर मस्जिद चर्च गुरूद्वारों में जाता रहता या रहती हूं… पाप है। मैंने गरीब को रूपये पैसे दिए और खाना खिलाया तो ईश्वर खुश होकर हमारे लिए स्वर्ग का द्वार खोल देंगे…… पाप है।बुरे लोग हैं बुरे कर्म करेंगे यह जानकारी होते हुए भी उनकी मदद करना…….. पाप है। अपनी आत्मा की शांति के लिए निस्वार्थ भावना के साथ कोई कार्य करना ही पुण्य हैं
धीरे-धीरे अपनी जीवन शैली को सकारात्मक ऊर्जा में बदलते रहना। एक दम शांति से एक एक कदम आगे बढ़ाओ। धीरज रखना होगा। अपने आप पर विश्वास रखते हुए करना है।
शुरू शुरू में बहुत ही मुश्किल लगेगा। फिर जैसे तन साफ करते हैं ऐसे ही मन की बुराइयों की साफ-सफाई होने लगेगी बहुत शकुन मिलेगा। आप दुनिया में अमन चैन का अच्छा सा बिगुल बजा कर जा पायेंगे।
कुछ बुनियादी तौर पर बुरी आत्मा के लोगों से, विरोधी विचार के लोगों से भी आपका सामना होगा जो आपको ढ़ोगीं नौटंकी बाज और ना जाने कितने अनेकानेक उपाधि से सम्मानित करें…… विचलित नहीं हो। पूरी ईमानदारी से उन्हें भी अपने भले कार्यप्रणाली में सम्मिलित करने की प्रक्रिया करें। अगर उनकी बातों से विचारों से बाधित हो रहे हो तो, वहां से हटना ही समझदारी रहेगी।
कुछ अच्छा करने की चाहत रखते हुए अपने जीवन काल में कुछ एक लोगों में ही सही एक नेक मंजिल की राह छोड़ कर जाना हैं।
आत्मा को निरंतर साफ करते रहें,
बुरी आत्मा को निरंतर माफ़ करते रहें..
परमात्मा को निरंतर याद करते रहें..!!
सविता