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Hindi Poem: आज-कल…

Ritesh
Ritesh
Jul 17 · 1 min read

नदियों से आती हैं बाढ़ेँ,
खेत खलिहान सूखे ही रह जाते हैं!
जब तलक देखो समुन्दर भरा ही भरा है,
पर ये कबूतर प्यासे ही रह जाते हैं!


मंदिर मस्ज़िद से थोड़ा आगे तो बढे,
इसी बात में हम मगरूर हो गए!
चाँद तारो पे क्या देखी थोड़ी सी जगह,
अपने आशियानें से काफ़ी हम दूर हो गए!


अपनों से बातें कुछ कम सी हुईं,
दूसरों की खबर रोज़ पढ़ने लगे!
बुज़ुर्गों की ख्वाहिश ऐसे हुई पूरी,
कि बच्चे थोड़ी जल्दी ही बढ़ने लगे!
कि बच्चे थोड़ी जल्दी ही बढ़ने लगे!


— Ritesh

my tukbandi

हम स्वर्णिम पन्नों पर लिखा नहीं करते, हम लिखकर पन्नों को स्वर्णिम बना दिया करते हैं।

Ritesh

Written by

Ritesh

An engineer by profession who happens to be a blockchain, stock market, and poker newbie. A sensitive, thoughtful, and curious human.

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