आदम और हव्वा

एक जान तू है,

एक साँस मैं हूँ ,

एक तार्रुफ़ तू है,

एक पहचान मैं हूँ ,

एक सोच तू है,

एक ख्याल मैं हूँ ,

एक हर्फ़ तू है ,

एक लफ्ज़ मैं हूँ ,

एक घर तू है ,

एक सराय मैं हूँ ,

एक आइना तू है

एक काँच मैं हूँ ,

एक पैराहन तू है,

एक कफ़न मैं हूँ ,

एक शौक तू है ,

एक ख़्वाब मैं हूँ ,

एक अँगार तू है ,

चिंगारी मैं हूँ ,

एक सफ़ा तू है ,

एक किताब मैं हूँ ,

तू तराशता है अपना ख़ुदा ,

मुझे अपना रब भी नसीब नहीं .

गर हैं हम यकसान ,

तो तेरे कायदे दोहरे क्यों हैं ?

ये आदम और हव्वा की दास्तान क्यों है ?

नहीं मंज़ूर मुझे किसी हाल में ये.

अपना एक जहाँ बसाऊँगी मैं,

तब आना तुम वहाँ ,

तुमको भी बुलाऊँगी मैं .

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