एक प्रेम कविता

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खिंचता सा चला जा रहा हूं,

तुम्हारी तरफ,

एक अदृश्य बहाव,

एक अद्भुत लगाव,

सब कुछ तो है।

पर डरता हूं इस बहाव से,

डूबने की संभावनाएं,

अनगिनत भावनाएं,

सब रोकती हैं मुझे,

कहती हैं रुक जाओ,

वरना डूब जाओगे।।

मैं रुक भी जाता हूं,

कुछ एक दिन,

बंद हो जाता है,

बातों का सिलसिला।

फिर अचानक ये धैर्य,

टूट ही जाता है,

चूर-चूर हो जाता है,

पुरुषोचित घमंड,

रोक नहीं पाता खुद को

तुम्हें संदेश भेजने से

और तुम से बातें,

फिर से होने लगती है।।