
एक लड़की को देखा था,
अधूरी सी दास्तान लिखा करती थी,
जाने अनजाने न जाने क्या खूब लिखा करती थी|
शायद वही उसकी खूबसूरती थी|
बाहर से सख्त पर अंदर से कुछ नरम मालूम होती थी,
कोरा कागज़ थी वह शायद खुली किताब बनने से डरती थी|
जो बातें ना सुनाई पड़ती उसे कभी,
अब उन्ही बातों पर बौखलाया करती थी|
ना जाने यह हंसते खेलते दिल पर यह किसका साया है,
जिसने हसीन उस मुख को बहुत रुलाया है,
चेहरे की वह चमक सलवटों में कहीं दब गई,
आंसुओं ने आंखो को अब घर बनाया है,
काला साया वह किसका उस ने इस जिस्म में अब पनहा को पाया है|
अंधेरी रातें अनगिनत चीखो से सब भर जाता है,
यह खाना वह पीना यह सब उसको अब कहां भाता है|
कल उस दोस्त की आवाज जो शांत करती उसे,
अब सब शोर साबित होती है,
अकेलेपन में अब कहीं उसे बस अपनी तलाश रहती है|
कैसे पूरी करे वह दास्तान अब सब अधूरा ही तो लगता है,
मन की एक छोटी ही तो आस है,
अब उसमें भी जी सीसकता है|
टूटा दिल या,
टूटे सपने,
पूरा किसको करें अब?
खुद की जिंदगी सवारे,
या दूसरों की सुने अब|
वह आंसुओं के बाद मुस्कान के जो दिन थे,
वह भी सब अधूरे अब उस इंसान के बिन थे|
रातों में नींद की तलाश,
और रोशनी में अंधेरे की खोज थी,
बस बहुत हुआ अब
उसके लिए यह जिंदगी भी बोझ थी|
खूब रोई चीखी वह उस दिन,
क्या वह इतनी बुरी थी?
क्यों ना अश्रु पूछें मैंने?
एक आईने की ही तो दूरी थी|
बस हुआ बहुत देख चुकी में,
सूखे मुरझाए फूल को अब पानी देने जाना है,
बाहरी पत्थर तोड़ उस दिल का उस,
अब उसे भी प्यार दिखाना है|
अज़लत के उन पलों में,
कुछ धुनों का ही तो साथ था,
इन उलझनों को सुलझाने में,
खुद के सिवा और किसका हाथ था?
जहमतों से नवासा जिसने,
उसी से सुकून की आस थी,
जब यह भ्रम टूटा,
मैं खुद ही के कुछ और पास थी|
स्वार्थपरता क्या है,
इस तिलिस्म को मैंने जाना,
समेट के अपने अक्ष को,
अब खुशियों को ही है पाना|
भूलकर कुछ समय अब दूसरों को,
अब खुद को प्यार दिखाना है,
तूफानों से बाहर निकल,
अब सिर्फ नदी पार ही है जाना|
हुई मुलाकात और कुछ बातचीत,
आज लड़की को फिर आईने में देखा था,
आज भी अधूरी ही दास्तां लिखा करती है,
काफी खुश थी वो,
न जाने खुद को क्या समझती है|
खैर छोड़ो,
शायद वही उसकी खूबसूरती है|
