गाँवों के लड़के

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गाँवों के लड़के निर्धारित नही करते,

रुचियों से अपना भविष्य,

बल्कि भविष्य निर्धारित करता है रुचियाँ।

चलते जाते है, अंधे ही, किसी भी रास्ते पर,

माता-पिता के दबाव में, अवसरों के अभाव में,

बनाने एक मुकाम, जैसे घिसती रस्सियां,

बनाया करती हैं कुओं पे अपना निसान।।

कभी-कभी जब आप अकेले होते हैं,

तो सोचते हैं कि, काश कोई ऐसा तो होता,

जिससे हम साझा कर सकते,

अपने दिल की बातें, अपनी दिमाग की बातें।

खत्म करते जुबान का कारावास,

जिससे लफ़्ज़े भरती एक नई उड़ान,

विस्तृत होती हमारी अभिव्यक्ति,

टूटते मठ और गढ़ सब,

जैसा कि कभी मुक्तिबोध ने कहा था।।

my tukbandi

हम स्वर्णिम पन्नों पर लिखा नहीं करते, हम लिखकर पन्नों को स्वर्णिम बना दिया करते हैं।

Raghvendra Pandey

Written by

Interested In Poetry, Politics, History, Religion, Philosophy, Statistics, Data Science.

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हम स्वर्णिम पन्नों पर लिखा नहीं करते, हम लिखकर पन्नों को स्वर्णिम बना दिया करते हैं।