Hindi Story: छतरी

आज भी मैं ऑफिस के लिए उतनी ही लेट थी जितना रोजाना हुआ करती थी, कल रात से लगातार बारिश हो रही थी जो की सुबह तक हल्की बूँदा-बाँदी में तब्दील हो चुकी थी.

सुबह उठते ही जब तक चाय का एक प्याला गले से नही उतरता तब तक दिमाग़ मानो काम ही नही करता.चाय गैस पर चढ़ा कर, मैंने फ्रीज पे रखे धूल खाते हुए रेडियो को जो की ना जाने कितने जमाने से चालू नही हुआ था एकाएक चालू कर दिया | हल्की घरघराहट सी हुई, मैने बटन को इधर उधर किसी फ्रीक्वेन्सी पे सेट किया तो गाना बज उठा “कभी कभी मेरे दिल मे ख़याल आता है “ आहा पुरानी चीज़ो और पुराने गानो की बात ही अलग होती है, वो लंबे समय तक आपके साथ रहती है…….और उनके साथ एक अलग सा अपनापन महसूस होता है |

इसी सोच मे में डूबी हुई थी की ख़याल आया आहा चाय …मैं किचन की और भागी, कप में चाय निकालते हुए सोफे पे जा बैठी,

मुझे ऑफिस के लिए भले कितनी भी देर क्यूँ ना हो रही हो मैं चाय पीने में कभी जल्दबाज़ी नहीं करती, हर एक घूँट को बड़े ही अदब के साथ गले में उतारती हूँ… तैयार होने के बाद मे निकलने ही वाली थी की देखा बारिश अभी भी, बल्कि पहले से भी काफ़ी तेज हो चुकी है, रेडियो में भी एक के बाद एक पुराने गाने आने लगे.

रेडियो बंद करने के लिए जैसे ही हाथ उठाया तो गाना शुरू हुआ “रिमझिम गिरे सावन तरस तरस जाए मन” और मेरे हाथ वही रुक गए, सोचा बारिश तेज है तो, कम से कम गाने का ही लुफ्त उठा लिया जाए और फिर मौसम के मिज़ाज़ के साथ चाय का एक और प्याला तो बनता ही था|

गाने का लुफ्ट उठाते हुए मुझे ख़याल आ गया की आज तो छतरी ले जानी ही पड़ेगी, मुझे छतरी साथ रखना कभी पसंद नही रहा, बचपन से लेकर आज तक मैं भीगना पसंद करती थी, वो बड़ा वाला रेनकोट तक चलता था पर छतरी कभी नहीं , कभी नहीं !!!

मेरा मानना था की छतरी आपको बारिश से कुछ खास नही बचाती और बहुत सारे समान के साथ उसे पकड़ना भी मुश्किल हो जाता है….और तो और अगर हवा में वो पलट जाए तो पब्लिक मे जो एम्ब्रेसमेन्ट झेलना पड़ता है वो अलग, पर आज……. खैर मैं तो छतरी कभी खरीदने से रही, पर पापा को कौन समझाए ये जानते हुए की मेरी और छतरी की कितनी दोस्ती है, और मैं छतरी के बारे मे क्या सोचती हूँ, उसके बावजूद उन्होने मुझे बड़ी छतरी लाकर दी, वो भी बिल्कुल आउटडेटेड काले रंग की टिपिकल छतरी, खैर मुझे कभी ले जाना नहीं तो मैंने कुछ बोला भी नहीं , थोड़ी और बड़ी ले आते ये कह कर चुप हो गयी अपने मन में ही, इसी के साथ मैंने आज छतरी उठा ही ली और ऑफिस के लए निकल गयी |

शाम को करीब 6 बज रहे थे जब मे ऑफिस से घर की तरफ रवाना हुई, आसमान बिल्कुल साफ था और बारिश का नामो-निशान नहीं था मुझे छतरी को देख देख कर इतना गुस्सा आ रहा था, एक तो एक वो टिपिकल स्टाइल की, उपर से इतनी बड़ी और तो और उसका अब कुछ काम भी नहीं था,हाथ में क्या क्या पकडू, बैग पकडु , की टिफिन पकडु , की ये काली छतरी उपर से ये कीचड़ और पब्लिक ट्रांसपोर्ट सब कुछ एक साथ ही उफ्फ में झल्लाई सी ऑफिस से निकल पड़ी, बस स्टॉप पे पहुँची ही थी की बारिश ऐसे आई जैसे खाते मे आख़िरी तारीख से पहले पगार अनएक्सपेक्टेड, सब लोग इधर उधर भागने लगे में बस स्टॉप के नीचे खड़ी हो गयी, और मन ही मन सोचने लगी की अच्छा हुआ यहाँ तक पहुँच गयी नहीं तो खोलनी पड़ जाती ये काली छतरी |

स्टॉप पे खड़ी ही थी की नज़र सड़क के उस पार चली गयी, जहाँ एक छोटा सा बच्चा रो रहा था और उसकी माँ उसे घसीटते हुए पास बनी झोपड़ी के अंदर ले जाने की भरपूर कोशिश कर रही थी, मैंने सोचा इतनी बारिश में बच्चा ना जाने की ज़िद क्यूँ कर रहा है, तभी नज़र पड़ी की कुछ पत्थर ईंटो का घर सा बना हुआ है, ठीक वैसे ही जैसे बचपन में हम बनाया करते थे, सच कितना आसान होता था मकान बनाना अब तो इस बड़े शहर में मकान का ख्वाब भी सोच कर देखना पड़ता है ..

और ख़याल आया की ऐसे घर तो हम कुत्तों,बिल्लियों के बच्चो को छुपाने के लए बनाया करते थे..और हाँ मैं सही थी…. मैं युहीं बारिश मैं भागती हुई किसी तरह सड़क के उस पार पहुँची, उपर से नीचे तर बतर…तभी देखा की कुत्ते के चार छोटे-छोटे पिल्ले है, जो बारिश के कारण कूँ कूँ कर रहे है, कहीं जा भी नही पा रहे है और बारिश से बचने के लए एक दूसरे के उपर चढ़ रहे है, मुझे लगा उस झोपड़ी में रहने वाले बच्चे को खुद का पता नहीं और उसे पिल्लो की इतनी फिकर है, बस दो मिनिट के लिए में उसी जगह स्थिर सी खड़ी रह गयी, हर जगह भीड़ भाड़, सब लोग इधर उधर भागते हुए, कोई पेड़ के नीचे छुपने की जगह ढूंढ रहा था तो कोई छज्जा, या थोड़ी सी छत मिल जाए जहाँ अपना सर छुपा सके, पर इन पिल्लो का क्या इनके बारे मे सोचने वाला झोपड़ी में रहने वाला मासूम बच्चा ही था क्या,

और उस दिन मेरी काली छतरी उस मकान की छत बन गयी |

मैंने और उस बच्चे ने एक दूसरे को आत्मसन्तुष्टि की नज़रो से देखा ,और अपनी-अपनी झोपडी के लिए निकल पड़े |