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जयपुर और उसकी यादें

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं Kanishka Jaroli

अंजानी सी एक जगह पर,
अंजाने थे चेहरे।
नई जगह थी,
नई सुबह भी,
सब नए-नए थे चेहरे।
कदम रखा था नए घर में,
अपना सा अहसास न था।
दूर छोड़ अपने शहर को,
एक नया घर अपनाना था।
लोग मिले,
काफ़िला बना,
बेशकिमती सफ़र पर अब निकलना था।
कुछ अजनबियोों को अपनाया तो कुछ अपने अजनबी बनने को थे।
लेकिन उजियारे की मूरत वो,
चीर अंधेरे आयी थी।
अपने अलग एक जहान से मेरी पहचान कराई थी।
अंजानी सी, अनोखी भी,
काफी अनूठी थी वो।
कुछ तो अजीब कायदे उसके,
बस उनमेंं ही जी थी वो।
जरुरत नाम से मैं उसे पुकारती,
कब जरुरत बनी पता न चला।
चांद और उसकी रोशनी,
थे हमारी एक शुरुआत के मोहसिन,
कब मिन्टों की बातेें घण्टों में बदली पता न चला।
शायद बहुत सुन्दर लिखा करती थी वो,
हाँ उसकी कलम ही तो थी जो उसकी ओर खींचा करती थी।
कुछ तो अलग बात थी उसमें,
शायद इसिलिए मैं उसे अपना एकलौता साथी मानती।
जीवन जीना सिखाती थी वो,
कुछ तो अनोखे उसके तौर तरीके,
खुद अंदर से आधी टूटी,
और यहाँ मेरे टूटे पर मरहम लगाती।
कभी कहा नहीं उससे,
आज कहने को आई हूँ।
तुम न होती अगर,
उस जगह, उस समय वहाँ
तो वह घर शायद घर सा न होता।
वहाँ रहना,
वह सब सहना,
शायद आसान सा न होता।
आज खुदा से सिर्फ इतनी इल्तेजा,
भुलू ना वो लम्हे ना वो बातें,
फलक तक ले जाऊं वो सारी रातें।
चार साल कुछ जल्द ही निकले,
खत्म हुआ एक अनमोल सफ़र था।
अपनी छोटी दुनिया छोड़,
फिर अपने घर लौट आए हैं।
लेकिन अपना सा अहसास न था,
कुछ अपने जो छोड़ आए हैं।
फ़िर अंजान हुआ यह शहर,
बस कुछ यादें साथ थी,
और
अंजाने से उस शहर के,
वो कुछ जाने पहचाने चहरे।

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हम स्वर्णिम पन्नों पर लिखा नहीं करते, हम लिखकर पन्नों को स्वर्णिम बना दिया करते हैं।

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