Hindi Poem: नया सवेरा...

Ritu Chaudhry
Nov 10, 2018 · 1 min read
Personal Collection

असबाब ए मिक़दार तो नही, इस ज़िंदगी पर हक़ मेरा है।

आज साथ गर तू नही ग़म है, सीने में सोज़ आँखों में शबनम है, इन अंधेरों में एक सुकून सा है, क्या उनसे भी तेरा वबस्ता है, मेरी ज़िंदगी पर हक़ अब मेरा है।

अब अज़ाब ख़ुशी सब मेरे हवाले हैं, तू है आज़ाद तेरे बहुत चाहने वाले हैं, लौट मत आना तुझ से अनजान हूँ मैं, कोई पहचान ना दिखाना बदनाम हूँ मैं, मान भी ले इस ज़िंदगी पर हक़ मेरा है।

जो आएगा नया सवेरा वो भी मेरा है।

असबाब: सामान

मिक़दार: Mass, quantum, quantity

अज़ाब: दुखों से भरा

वबस्ता: सम्बन्ध

my tukbandi

हम स्वर्णिम पन्नों पर लिखा नहीं करते, हम लिखकर पन्नों को स्वर्णिम बना दिया करते हैं।

Ritu Chaudhry

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Just this. Not much.

my tukbandi

हम स्वर्णिम पन्नों पर लिखा नहीं करते, हम लिखकर पन्नों को स्वर्णिम बना दिया करते हैं।