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Hindi Poem: मैं ज़िंदा हूँ

रोज़ाना हम मिलते थे

कितनी बातें करते थे

तू इतने वादे करता था

हर वादे से मुकरता था

तेरी इस आदत पर हम

दोनों कितना हँसते थे

एक मज़ाक़ लगता था

ख़ुद को महफ़ूज़ समझती थी

आलम ए बेफ़िक्री थी

आज सब जान गई

रग रग पहचान गई

चहरे पे जो चहरे थे

अब सब बेनक़ाब हैं

जूठ बे हिसाब हैं

बस ग़म ही ग़म है

आँखें मेरी नम है

मेरा भरोसा टूटा है

इंसानियत का जज़्बा

शायद झूठा है

यादें केवल सच्ची हैं

आज भले मैं तनहा हूँ

पर्दा फ़ाश हुआ शुक्र है

पता है तुझे मैं ज़िंदा हूँ

नहीं मैं शर्मिंदा हूँ।

Image : Unsplash

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हम स्वर्णिम पन्नों पर लिखा नहीं करते, हम लिखकर पन्नों को स्वर्णिम बना दिया करते हैं।

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Ritu Chaudhry

Ritu Chaudhry

Just this. Not much.

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