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तुम्हारी बात


बात तुमसे शुरू हुयी थी

तुम पे ही रुकी है अब तक

इतनी हिचकिचाहटों के बीच भी कोई चिंगारी बची है अब तक

दो हाथों के बीच, दो होंठों के बीच,

दो जिस्मों के बीच कुछ जीता है

दो दिल जुड़े हैं अब भी, इनके तारों को कोई खींचता है

तेरा कहना कि बुझ चुका है ये रिश्ता…..

मेरे चेहरे पे आज भी तेरे चेहरे की छाप क्यों है?

तेरे अलमारी के खानों में आज भी मेरे ख़तों के पुर्ज़े क्यों है?

ये रिश्ता पूरा है, अधूरा नहीं,

न मैं तोड़ पायी हूँ न तू निकाल पाया है दिल से

गये साल नज़र लगी थी किसी की

सुनते हैं कि अच्छा वख्त अब आया है….