my tukbandi
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Pic by Ben White- Unsplash

तुम्हारी बात

बात तुमसे शुरू हुयी थी

तुम पे ही रुकी है अब तक

दो हाथों के बीच, दो होंठों के बीच,

दो जिस्मों के बीच कुछ जीता है

दो दिल जुड़े हैं अब भी, इनके तारों को कोई खींचता है

तेरा कहना कि बुझ चुका है ये रिश्ता…..

मेरे चेहरे पे आज भी तेरे चेहरे की छाप क्यों है?

तेरे अलमारी के खानों में आज भी मेरे ख़तों के पुर्ज़े क्यों है?

ये रिश्ता पूरा है, अधूरा नहीं,

न मैं तोड़ पायी हूँ न तू निकाल पाया है दिल से

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हम स्वर्णिम पन्नों पर लिखा नहीं करते, हम लिखकर पन्नों को स्वर्णिम बना दिया करते हैं।

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Namrita Swarup ( गुलनाज़ )

Namrita Swarup ( गुलनाज़ )

ख़याल मन को घेरते हैं या मन ख़यालों को? जवाब जो भी हो, ख़यालों को अगर लिख लिया जाए तो पढ़ने में बड़ा मज़ा आता है, आपका क्या ख्याल है? बताइयेगा :)

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