स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया

पिछले कुछ माह से भारत के लोगों ने “स्टार्ट-अप” शब्द काफी सुना है. अखबारों में, चैनलों में तथा विभिन्न विचार मंचों एवं सेमिनारों में स्टार्ट अप के बारे में चर्चाएं और लेख गाहे-बगाहे दिखाई दे रहे हैं, सुनाई दे रहे हैं. 16 जनवरी को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एक विश्व स्तरीय सम्मेलन में भारत के स्टार्ट-अप, स्टैंड-अप कार्यक्रम का शुभारंभ करके इस दिशा में सरकार की नीतियों को सार्वजनिक करेंगे एवं उचित दिशानिर्देश देंगे. इससे पहले हमें समझना होगा कि वास्तव में “स्टार्ट-अप” आखिर है क्या?

तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत के युवाओं ने अपने ज्ञान, कार्यशैली एवं बुद्धिमत्ता के झण्डे समूचे विश्व में गाड़े हैं. भारत के IIT (भारतीय तकनीकी संस्थान) अपने-आप में एक ब्राण्ड बन चुके हैं IIT-IIM से पास-आउट होने वाले छात्रों को लाखों रूपए के वेतन पर विश्व की जानी-मानी कम्पनियाँ हाथोंहाथ ले रही हैं, क्योंकि उन्हें इन युवाओं पर पूरा भरोसा है कि ये लोग उन कंपनियों को नई ऊँचाइयों पर ले जाएँगे. परन्तु पिछले दो-तीन वर्ष में इस अवधारणा में बदलाव आ रहा है और यह बदलाव मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद और भी तेज हुआ है. यह बदलाव है मानसिकता का. अब भारत के प्रतिभाशाली युवाओं को यह लगने लगा है कि उनकी बुद्धि, उनके नव-नवीन आईडिया और विचारों का लाभ दूसरी कंपनियों को क्यों मिले? क्यों न वे खुद ही अपने विचारों को मूर्तरूप देने के लिए स्वयं अपनी कम्पनी शुरू करें. कहीं दूसरी जगह नौकरी करने की बजाय क्यों न खुद के साम्राज्य की नींव रखें. यह बदलाव आया है नई पीढ़ी (यानी वह पीढ़ी, जो नरसिंहराव द्वारा 1991 में आर्थिक उदारीकरण अपनाने के बाद आज पच्चीस वर्ष की हो चुकी है) के आत्मविश्वास से और मोदी सरकार की उद्योग-उन्मुख नीतियों से. कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे प्रतिभाशाली और बुद्धिमान युवा उद्यमी जो कम्पनियाँ शुरू (Start) कर रहे हैं, उन्हें संक्षेप में “स्टार्ट-अप कम्पनी” कहा जाता है. स्टार्ट-अप अर्थात, एक नवोन्मेषी विचार (New Idea) लेकर, छोटी पूँजी और छोटे इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ शुरू की गई कम्पनी को “स्टार्ट-अप” कहते हैं. यह शब्द भारतीयों के लिए भले ही नया हो, परन्तु अमेरिका, हांगकांग और जर्मनी जैसे देशों में यह शब्द आम प्रचलन में है. अमेरिका की सिलिकॉन वैली में कई भारतीय युवाओं ने एक से बढ़कर एक स्टार्ट-अप शुरू किए हैं, और उनके विचारों एवं मेहनत को देखकर अब बड़े-बड़े कार्पोर्रेट घराने इन स्टार्ट-अप कंपनियों में रूचि दिखाने लगे हैं, उन्हें प्रायोजित करने लगे हैं अथवा बड़ी पूँजी लगाकर उन्हें प्रोत्साहित भी कर रहे हैं और इनके सुनहरे भविष्य को देखते हुए अपना मुनाफा भी अभी से सोचने लगे हैं. आज से पन्द्रह साल पहले अमेरिका में
फेसबुक और उबर टैक्सी जैसी महाकाय कम्पनियाँ भी तो “स्टार्ट-अप” ही थीं, लेकिन नवोन्मेषी विचार और युवा एवं मेहनती उद्यमियों की वजह से आज इनका टर्न-ओवर अरबों डॉलर का हो चुका है.

कहने का तात्पर्य यह है, कि अब अमेरिका की तर्ज पर ही पिछले दो-तीन वर्ष में भारत में भी स्टार्ट-अप कंपनियों की बहार आई हुई है. जहाँ एक ओर स्टार्ट-अप कम्पनियाँ देश के विकास इंजन में सर्वाधिक ईंधन प्रदान करने वाली ऊर्जा बनने जा रही हैं वहीं दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था एवं रोजगार उत्पन्न करने में भी अव्वल होने जा रही हैं. इसीलिए विदेशी निवेशक तो इन कंपनियों की तरफ आकर्षित हैं ही अब इन्फोसिस और विप्रो जैसी कम्पनियाँ भी इन देशी छोटी कंपनियों में पैसा लगाने के लिए तेजी से आगे आ रही हैं. ग्लोबल इंटरप्रिन्योर मॉडल द्वारा किए गए शोध के अनुसार वृद्धि की अधिक संभावना वाली कम्पनी का उद्यमी तीन गुना अधिक रोजगार उत्पन्न करता है, बजाय कम संभावना वाली बड़ी कम्पनी के. जिस तरह से अत्यधिक प्रतिभावान एवं बुद्धिमान युवा नौकरी का मोह छोड़कर स्टार्ट-अप में रूचि दिखा रहे हैं, उसी का नतीजा है कि पिछले दो वर्ष में भारत की स्टार्ट-अप कंपनियों की फंडिंग में 125% की वृद्धि हुई है. 2014 में जहाँ स्टार्ट-अप कंपनियों में निवेशकों ने 2.2 अरब
रूपए लगाए थे, वहीं 2015 में यह आँकड़ा बढ़कर 4.9 अरब रूपए हो गया है. जबकि 2010 से 2014 के कुल चार वर्षों में यह निवेश सिर्फ 3.2 अरब रूपए ही था. इससे ज़ाहिर होता है कि सरकार और स्टार्ट-अप के युवाओं में निवेशकों का विश्वास बढ़ रहा है. पिछले पांध वर्ष में भारत के रोजगार परिदृश्य को देखें तो लगभग 80% रोजगार स्टार्ट-अप कंपनियों द्वारा ही मुहैया करवाए गए हैं. इसी प्रकार अमेरिका में भी पिछले 37 वर्ष का रिकॉर्ड देखें, तो सिर्फ छः वर्ष ऐसे हुए हैं जहाँ स्थापित कंपनियों ने रोजगार अधिक दिए, जबकि 31 वर्ष तक स्टार्ट-अप कम्पनियाँ ही सर्वाधिक रोजगार दे रही हैं.

एक सर्वे के मुताबिक़ सबसे अच्छी बात यह है कि भारत की 72% स्टार्ट-अप कंपनियों के संस्थापकों की आयु 32 वर्ष से कम है. इसके अलावा गत वर्ष की तुलना में स्टार्ट-अप शुरू करने वाली महिलाओं की संख्या में 50% का इज़ाफा हुआ है. अपनी लगन एवं दमदार प्रस्तुति के कारण अब वारबर्ग पिंकस और चीन की अलीबाबा जैसी कम्पनियाँ भी भारत के स्टार्ट-अप में लगभग पचास करोड़ डॉलर का निवेश करने जा रही हैं. NASSCOM के अनुमान के मुताबिक़ अगले दस वर्ष में भारत में लगभग एक लाख नई स्टार्ट-अप कम्पनियाँ अस्तित्त्व में होंगी और निश्चित रूप से पाँच सौ अरब रूपए के टर्नओवर तथा कम से कम चार करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मुहैया कराने में सक्षम होंगी. इसी से सिद्ध होता है कि देश की अर्थव्यवस्था के
लिए स्टार्ट-अप कितनी जरूरी हैं.

16 जनवरी को प्रधानमंत्री की उपस्थिति में नीति आयोग द्वारा स्टार्ट-अप कंपनियों संबंधी नीतियों की घोषणा की जाने वाली है. इस कार्यक्रम में उबर के संस्थापक ट्रेविस कैलानिक, सॉफ्ट बैंक के अध्यक्ष और सचिव तथा “वी-वर्क” जैसी कम्पनी के सीईओ भी उपस्थित रहेंगे. इनके अलावा कम से कम दो हजार संभावित निवेशक तथा उद्योगपति भी भारत की तमाम स्टार्ट-अप कंपनियों पर अपनी पैनी निगाह गड़ाए रहेंगे. सभी को उम्मीदें हैं कि मोदी जी इन कंपनियों का व्यापार, उद्यमिता एवं अनुसंधान को बढ़ाने के लिए कुछ आकर्षक घोषणाएँ कर सकते हैं. संभव है कि इस अवसर पर मोदी सरकार “AIM” (अटल इनोवेशन मिशन) की भी घोषणा कर सकती है, जिसमें युवा उद्यमियों, नवोन्मेषी विचारों, शोध एवं अध्ययन को बढ़ावा देने हेतु कई उपाय सुझाए जाएँगे तथा स्टार्ट-अप कंपनियों की अधिकाधिक मदद कैसे की जाए, इस पर विचार होगा.

स्वाभाविक रूप से स्टार्ट-अप कंपनियों के सामने कई चुनौतियाँ हैं. चूँकि ऐसी कंपनियों में नए-नए आईडिया और तकनीक को अधिक महत्त्व दिया जाता है, इसलिए शुरुआत में इन्हें संभालने की अत्यधिक जरूरत है. चूँकि “व्यापार” एक निर्मम प्रक्रिया भी है, ऐसे में जरूरी नहीं कि इन प्रतिभाशाली युवाओं को “मार्केट” आधारित व्यापार और इससे निकलने वाली कई समस्याओं से निपटने का पर्याप्त अनुभव हो. ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी अधिक बढ़ जाती है, कि वह इन युवा उद्यमियों को उचित संरक्षण प्रदान करे. जब भी कोई स्टार्ट-अप कम्पनी शुरू होती है, तो सामान्यतः वह मालिक के बचत के पैसों, परिवार की संपत्ति, मित्रों एवं रिश्तेदारों से उधार लिए गए धन से ही आरंभ होती है, क्योंकि बैंक भी किसी नए विचार हेतु पैसा लगाने को आसानी से तैयार नहीं होते. यदि एक-दो वर्ष में कंपनी की गाड़ी ठीकठाक चल निकली तभी निवेशक उसकी तरफ आकर्षित होते हैं. प्रत्येक
बाहरी निवेश के साथ जो मूल संस्थापक होता है वह अपने थोड़े-थोड़े शेयर भागीदारी में देता जाता है (यदि स्टार्ट-अप का मालिक दुर्भाग्यशाली रहा तो संभव है कि कोई बड़ी मछली इस छोटी मछली को निगल ले), और यदि वास्तव में वह बहुत भाग्यशाली है एवं उसकी कम्पनी बहुत तेजी से तरक्की कर जाती है तो पैसा उगाहने के लिए उसके पास शेयर बाज़ार का IPO लाने का विकल्प भी है. परन्तु एक नया विचार लेकर, नई कम्पनी बनाना, उसे चलाना और फिर बाज़ार की जरूरतों के मुताबिक़ उसे ढालना अपने-आप में एक खतरा उठाने वाली बात है, इसलिए इस तमाम प्रक्रिया में उसे सरकार की मदद और सुरक्षा का भरोसा चाहिए होता है.

स्टार्ट-अप कंपनियों की इन चिंताओं को दूर करने हेतु सरकार के पास कई विकल्प हैं. जिनमें सबसे पहला है स्थापना के नियमों को आसान बनाना. विदेशों में कम्पनी स्थापित करने के लिए “वास्तविक” एकल खिड़की की प्रक्रिया है. वहाँ अधिकाँश कार्य ई-मेल पर ही हो जाते हैं, कागज़ों की भरमार नहीं होती और उद्यमी को कम्पनी स्थापित करने में अधिक मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता. भारत में भी ऐसे ही नियम बनाए जाने चाहिए. इसके बाद नंबर आता है बैंकों, वित्तीय संस्थाओं एवं विदेशी निवेशकों से धन प्राप्त करने की प्रक्रिया का सरलीकरण. कोई ऐसी नीतिगत प्रक्रिया बननी चाहिए, जिससे युवा उद्यमी को अपनी स्टार्ट-अप हेतु शासकीय बैंकों द्वारा कम से कम ब्याज दरों पर आसानी से ऋण की प्राप्ति हो जाए. एक सर्वे के अनुसार पिछले पाँच वर्ष
में बैंकों के अनुत्पादक ऋण (NPA) में जितनी भी वृद्धि हुई है, उसमें सर्वाधिक योगदान किंगफिशर जैसी कई बड़ी-बड़ी कंपनियों का है. जबकि मझोली कंपनियों एवं छोटे किसानों-व्यापारियों ने अपने ऋण ईमानदारी से चुकाए हैं. इसलिए स्टार्ट-अप कंपनियों को उदारतापूर्वक ऋण दिए जाने चाहिए. यदि वह स्टार्ट-अप सफलतापूर्वक दो-तीन वर्ष में अपना कारोबार बढाती है, उसकी ग्राहक संख्या और विश्वास में वृद्धि होती है तो किसी देशी अथवा विदेशी निवेशक का निवेश सुगम पद्धति से होना चाहिए. तीसरा नंबर आता है सरकारी बाबुओं की लालफीताशाही और भ्रष्टाचार से मुक्ति.

स्टार्ट अप कम्पनियों को सबसे अधिक दिक्कत होती है शासकीय लालफीताशाही, बाबूगिरी और भ्रष्टाचार से. थकाऊ कागजी कार्रवाई, विभिन्न विभागों से मंजूरी, तमाम तरह से लायसेंस और फीस आदि के चक्करों में जब स्टार्ट-अप कम्पनी पड़ती है तब धमाकेदार शुरुआत संबंधी उसका आधा उत्साह तो वैसे ही ख़त्म हो जाता है. इसलिए सरकार को यह सारी प्रक्रियाएँ आसान बनाना चाहिए. “सिंगल विंडो” का अर्थ वास्तव में सिंगल विंडो ही होना चाहिए, जहां कम्पनी की स्थापना, कागजी खानापूर्ति, फीस, लाईसेंस, अनुमति, अनुज्ञापत्र वगैरह सब एक ही विभाग और न्यूनतम अधिकारीयों के जिम्मे हो. सर्वे में लगभग नब्बे प्रतिशत उद्यमियों ने कहा कि स्टार्ट-अप से सम्बन्धित अधिकाँश प्रक्रिया और समस्त दस्तावेजीकरण इत्यादि ऑनलाइन होना चाहिए.

स्टार्ट-अप कम्पनियां का आकार एवं उनकी शुरुआत में उनकी सीमित विस्तार क्षमता को देखते हुए वे बैंकों अथवा वित्तीय संस्थानों से बड़ी मात्रा में ऋण नहीं ले सकतीं. परन्तु चूंकि अंततः है तो यह व्यवसाय ही, ज़ाहिर है की इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ अन्य खतरे भी हैं ही. इस स्थिति को देखते हुए मोदी सरकार से यह अपेक्षा की जाती है की जिस तरह बड़ी-बड़ी महाकाय कंपनियों के ना सिर्फ ऋण समायोजित किए जाते हैं, उन्हें “रि-स्ट्रक्चर” किया जाता है और समय-समय पर उन्हें टैक्स में छूट आदि दी जाती है, यही सारी सुविधाएँ स्टार्ट-अप कम्पनियों को भी मिलनी चाहिए. जिस तरह “स्पेशल इकोनोमिक ज़ोन” वगैरह बनाकर बड़ी कंपनियों को जगह और आधारभूत संरचना लगभग मुफ्त में उपलब्ध करवाई जाती हैं उसी प्रकार स्टार्ट-अप कंपनियों को एक विशेष ज़ोन बनाकर अथवा “स्टार्ट-अप पार्क” स्थापित करके उन्हें एक ही छत के नीचे अथवा एक विशाल
क्षेत्रफल में स्थान-बिजली-पानी आदि सुविधाएँ न्यूनतम दरों पर दी जानी चाहिए. जैसा की एसोचैम के सर्वे में बताया गया है कि अक्सर बड़ी कम्पनियां ही टैक्स चोरी के मामलों में आगे रहती हैं फिर भी उन्हें टैक्स छूट दी जाती है. इसलिए स्टार्ट-अप कंपनियों एवं उनके मालिकों का साफसुथरा पूर्व रिकॉर्ड देखते हुए इन कंपनियों को भी स्थापना के शुरुआती पांच वर्षों में “टैक्स-रिलीफ” दिया जाना चाहिए, ताकि छठवें वर्ष से जब वे मजबूती से अपने पैरों पर खड़ी हो जाएँ तो सरकार को अधिकाधिक टैक्स चुकाकर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अपना योगदान दें. आज से कुछ वर्ष पूर्व फ्लिपकार्ट भी एक स्टार्ट-अप कंपनी ही थी, लेकिन देखते-देखते इसी कंपनी ने कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नींद उड़ा दी.

जिस प्रकार हम चिड़िया के बच्चे को उसके उड़ने से पहले उसकी सहायता करते हैं ताकि वह अपने पंखों को ठीक से तौल सके, साफ़ कर सके और उड़ान भर सके, इसी प्रकार केन्द्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि देश के अगले बीस वर्ष की अर्थव्यवस्था एवं रोजगार निर्माण को ध्यान में रखते हुए स्टार्ट-अप कंपनियों की साज-संभाल करे, फिर देखियेगा ये चिड़िया के बच्चे बड़े होकर कैसे ऊँची उड़ान भरते हैं और दुनिया को चमत्कृत करते हैं.