शकेब जलाली

‘शकेब’ अपने तआ’रुफ़ के लिए ये बात काफ़ी है;

हम उस से बच के चलते हैं जो रस्ता आम हो जाए

शकेब जलाली उन नामवर शूअरा में से हैं जिन के शुमार के बग़ैर 20 वीं सदी की उर्दू शायरी की बिसात नहीं रखी जा सकती। शकेब की शायरी में नयापन है, नयी तरक़ीबें हैं। आज़ादी के बाद के अज़ीम शोअरा में शकेब का नाम आज बड़ी इज़्ज़त से लिया जाता है, लेकिन शकेब की सलाहियतें ज़िन्दगी रहते गुमनामी के अंधेरों में ही रहीं। ये नेक लेकिन कमज़ोर दिल शायर, महज़ 32 बरस की उम्र में नागवार हालात में दुनिया से रुख़्सत हो गया।

दुनिया वालों ने चाहत का मुझ को सिला अनमोल दिया
पैरों में ज़ंजीरें डालीं हाथों में कश्कोल दिया

शकेब जलाली की पैदाईश 1 अक्टूबर 1934 की है। इनका असल नाम सईद हसन रिज़वी था। इन के पुरखों का तअल्लुक़ अलीगढ़ के क़रीब एक छोटे से गाँव साद्दत जलाली से था। शकेब की इब्तेदाई तालीम बदायूँ (उतर प्रदेश) से हुई, इसके बाद ये अपनी बहनों के साथ रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) मुन्तक़िल हो गए और वहां से इंटर का इम्तेहान पास किया। बाद में बी. ए. की डिग्री सिआलकोट से हासिल की।

कहाँ रुकेंगे मुसाफ़िर नए ज़मानों के
बदल रहा है जुनूँ ज़ाविए उड़ानों के

शकेब की शायरी का सफ़र सही मानों में हिंदुस्तान की आज़ादी के बरस यानी 1947 से शुरू हुआ। इस बीच शकेब ने सिआलकोट में कई नामी रिसालों के लिए काम किया, लेकिन माली हालात इतने ख़राब थे कि इस मनपसंद काम से रोज़ी-रोटी के लाले रहते थे। बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में बाद में लाहौर आ गए। फिर मईशत के लिए थल डेवेलपमेंट अथॉरिटी में नौकरी कर ली और ज़ोहराबाद और भक्कड़ में मामूर रहे। 1956 में बियाह कर लिया, जिससे इन्हें एक बेटा सईद हुसैन रिज़वी (आली) और एक बेटी हिना बतूल हैं।

ग़म-ए-हयात की लज़्ज़त बदलती रहती है
ब-क़द्र-ए-फ़िक्र शिकायत बदलती रहती है
नहीं कि तेरा करम मुझ को नागवार नहीं
ये ग़म है वज्ह-ए-मसर्रत बदलती रहती है

शकेब बचपन से ही अपनी अम्मी की बेवक़्त दर्दनाक मौत के चलते नफ़्सियाती तौर पर बीमार रहे। शकेब महज़ 10 बरस के थे जब उसके वालिद ने उनकी अम्मी को निहायत बेदर्दी से एक चलती हुई रेल के आगे धक्का दे दिया। ये भयानक नज़ारा शकेब ने अपनी छोटी बहनों की मौजूदगी में देखा और इस ख़ौफ़नाक मंज़र ने इन के दिल पर गहरा असर लिया। यही मंज़र शकेब को ता ज़िन्दगी तड़पाता रहा और आखिरकार 32 बरस की उम्र में 12 नवंबर 1966 को शकेब ने सरगोदा में ख़ुद को एक चलती हुई रेल के आगे झोंक दिया।

हम-जिंस अगर मिले न कोई आसमान पर
बेहतर है ख़ाक डालिए ऐसी उड़ान पर
हक़ बात आ के रुक सी गई थी कभी ‘शकेब’
छाले पड़े हुए हैं अभी तक ज़बान पर

ये शकेब की बदक़िस्मती थी कि उर्दू शायरी के लिए उनकी बेशक़ीमती ख़िदमात को वक़्त रहते नहीं आँका गया। 1972 में इनके इंतेक़ाल के बाद इनकी शायरी पहली मर्तबा ‘रोशनी ए रोशनी’ के नाम से शाया हुई।

ख़ामोशी बोल उठ्ठे हर नज़र पैग़ाम हो जाए
ये सन्नाटा अगर हद से बढ़े कोहराम हो जाए
‘शकेब’ अपने तआ’रुफ़ के लिए ये बात काफ़ी है
हम उस से बच के चलते हैं जो रस्ता आम हो जाए