आएं, स्वतंत्रता को स्वतंत्र करने का व्रत लें।

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मां भारती की अमृत प्रजारूप मेरे भाइयो एवं भगिनियो! आज हम देश की स्वतंत्रता की 70 वीं वर्षगांठ मनाकर अपनी राष्ट्रभक्ति का परिचय दे रहे हैं। इस अवसर पर हो रहे राग रंगों की जगमगाहट में हमें यह भान तक नहीं है कि जिस स्वतंत्रता के लिये मंत्र सर्वप्रथम महर्षि दयानन्द सरस्वती ने इस देश को दिया और उस पर चलकर कितने ही क्रान्तिकारी वीर-वीरांगनाओं ने अपने रक्त से इस मां भारती का अभिषेक किया, वह अभागी स्वतंत्रता आज अपने ही राष्ट्रवासियों की अज्ञानता, स्वार्थ व अदूरदर्शिता के कारण स्वयं ही विदेशी बौद्धिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक दासता के क्रूर जाल में फंसी आर्तनाद कर रही है। आज कहने को यह भारत स्वतंत्र है परन्तु इसके (अधिकांश) संविधान, विज्ञान सहित सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली, चिकित्सा, आहार, विहार, भाषा, वेशभूषा, वैचारिक दृष्टि, सभी प्रकार की नीतियां सब कुछ विदेशी दासत्व से ग्रस्त हैं। देश का सेक्यूलर व प्रबुद्ध माना जाने वाला वर्ग इस दासत्व का सगर्व पोशक बनकर राष्ट्र की स्वतंत्रता, अस्मिता के साथ-2 इसके गौरवपूर्ण इतिहास, वैदिक व आर्ष ज्ञान-विज्ञान, प्राचीन संविधान एवं सभी प्रकार की प्राचीन गौरवमयी परम्पराओं का उपहास वा निन्दा करने को ही प्रगतिशीलता का प्रतीक मान रहा है। देश का वैज्ञानिक वर्ग, राजनैतिक नेतृत्व, शिक्षाविद् एवं मीडिया जगत् को यह दृढ़ विश्वास हो गया है कि हमारा राष्ट्र विदेशी बौद्धिक दासता के बिना संसार में पिछड़ जायेगा। आधुनिकता के नाम पर बौद्धिक आदि सभी प्रकार के दासत्व को अंगीकार करना उसको अपरिहार्य प्रतीत हो रहा है। भारत की युवा पीढ़ी की रग रग में कहें वा D.N.A. में यह समाया हुआ हैै कि हमारे पूर्वज मूर्ख व असभ्य थे एवं विदेशी आक्रान्ता बुद्धिमान् व सभ्य थे। इसी भ्रामक वा मूर्खतापूर्ण सोच के कारण आज मेरे कभी महान् रहे भारत (आर्यावर्त्त) का युवा वर्ग अपने ही पूर्वजों पर व्यंग्य करता है। ओह! इससे अधिक वेदना की और क्या बात होगी कि सन्तान ही अपने जन्मदाता माता-पिता, दादा-दादी, परदादा व परदादी को मूर्ख व असभ्य मानकर टी.वी. चैनलों, समाचार पत्रों वा पाठ्य पुस्तकों में उनकी निन्दा करें।

दुर्भाग्य से राष्ट्रभक्ति की भावनाओं को अपने हृदयों में संजोए मेरे राष्ट्रभक्त महानुभावों में भी ऐसा बौद्धिक सामर्थ्य नहीं कि वे इन सब विवादों में कोई सुदृढ़ समाधान देश को दे सकें बल्कि वे स्वयं भी बौद्धिक दासत्व की प्रतीक विदेशी शिक्षा व अन्य विचारों-नीतियों को अपनाने को विवश हैं।

मेरे देशवासियो! जरा विचारें कि आप कहाँ से स्वतंत्र हो। किस प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान व परम्परा को आप अपनाते हैं वा किस पर आपको गर्व है? क्या इस भूखण्ड व आपके शरीर के अतिरिक्त कुछ भी स्वदेशी बचा है? जो स्वदेशी कहा जा रहा है, उसके पीछे भी किसी विदेशी शिक्षा व तकनीक की छाया अवश्य है। तब क्या मात्र देशभक्ति के गीत गाने से ही हमारी स्वतंत्रता जीवित रह पायेगी?

मेरे देशवासियो! आज महान् विश्वनायक, वेद विज्ञान के महान् मनीषी, विश्वजित् योद्धा, वैदिक धर्म के महान् संरक्षक, महान् योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण जी महाराज का जन्मदिन भी है। आज मन्दिरों में श्रंगारी रासलीलाओं का बोलबाला है परन्तु किसी को गीता गायक, महाभारत नायक चक्रपाणि भगवान् श्रीकृष्ण के वास्तविक एवं शिवरूप का न तो ज्ञान है और न भान है। अनेक कथित प्रबुद्ध तो ऐसे महामानवों के इतिहास को कल्पित कहानियां मानकर उन पर व्यंग्य ही करते हैं। तब ऐसे महामानवों से प्रेरणा तो कौन लेगा?

भगवत्पाद योगेश्वर श्रीकृष्ण महाराज के भक्तो! क्या आपने कभी उस दिव्य आत्मा के व्यक्तित्व को महाभारत में पढ़ने का प्रयास किया है? क्या उस महात्मा के व्यक्तित्व को अपने हृदयों में जाग्रत करके अपनी स्वतन्त्रता देवी की स्वतंत्रता एवं राष्ट्र के महान् गौरव को पुनर्जीवित करने की इच्छा जगाएंगे?

मेरे प्यारे आर्यावर्त्त की तरुणाई! जाग, मैं तुझे सभी प्रकार की दासता की जड़ बौद्धिक दासता से मुक्त करने का मंत्र देना चाहता हूँ। मैं भारत के प्रबुद्धों में शीर्षरूप विराजमान उच्च कोटि के वैज्ञानिकों को वैदिक विज्ञान का शंखनाद सुनाते हुए उनसे निवेदन करता हूँ कि कब तक विदेशी वैज्ञानिकों के ही अनुचर बनकर जीने को विवश रहेंगे? कब आपके अन्दर अपने प्राचीन वैदिक विज्ञान की ओर सोचने की भावना जाग्रत होगी? यद्यपि ज्ञान-विज्ञान की सीमा देश व काल में नहीं बांधी जा सकती पुनरपि अपने विज्ञान की उपेक्षा करके विदेशी विज्ञान का अन्धानुकरण राष्ट्रीय स्वाभिमान का हनन कर डालता है। इसी हनन के कारण सभी प्रकार के दासत्वों का अभिशाप भोगना पड़ता है। इसी अभिशाप को आज हमारा प्यारा राष्ट्र भोग रहा है। हमारी स्वतंत्रता स्वयं ही परतन्त्र हो गयी है।
मेरे प्यारे वैज्ञानिको! क्या आप विचार भी करने का प्रयास करेंगे कि इस विदेशी विज्ञान से उत्पन्न तकनीक ने इस पृथ्वी के ऊपर कैसा भयंकर संकट खड़ा कर दिया है? इसके साथ ही क्या वे इस कटु सत्य को स्वीकार करने की इच्छा करेंगे कि वर्तमान सैद्धान्तिक भौतिकी में अनेकों गम्भीर अनसुलझी समस्याएं विद्यमान हैं तथा अनेक परस्पर विरोधी कल्पनाएं भी फल फूल रही हैं। दूसरी बात यह भी कि संसार की सभी माताएं आदरणीय हैं परन्तु अपनी जननी मां का चीरहरण करके नहीं। मैंने अनुभव किया है कि हमारे अधिकांष शीर्ष वैज्ञानिक विदेशी विज्ञान के ऐसे दास बने हैं, जिन्हें वैदिक भौतिकी की परम्परा ही मिथ्या दर्शन प्रतीत होती है। वे मुझसे यह आशा करते हैं कि मैं वैदिक भौतिकी को विदेशी चद्दर से ढककर उन्हें प्रस्तुत करूं। यही अन्धानुकरण की पराकाष्ठा है। मैं देश के भौतिक वैज्ञानिकों को विश्वास दिलाता हूँ कि मैं उनकी अनेक सैद्धान्तिक समस्याओं का समाधान कर सकता हूँ परन्तु उन्हें भी अपनी दृष्टि पर पुनर्विचार करना चाहिए। यदि वे ऐसा कर सके तो यह भारतवर्ष सैद्धान्तिक भौतिकी की दृष्टि से जगद्गुरु बन सकता है।

मेरे देशवासियो! इस राष्ट्र में कितने ऐसे स्वाभिमानी वीर वीरांगनाएं हैं जो भगवान् श्रीकृष्ण के जन्मदिन पर स्वतंत्रता की बलिवेदी पर आहुत होने वाले वीरों का सम्मान करते हुए अपनी स्वतंत्रता की रक्षा का संकल्प लेंगे?

-आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक
(वैदिक एवं आधुनिक भौतिक विज्ञान शोध संस्थान) भागलभीम, भीनमाल,
जिला-जालोर (राजस्थान) भारत, पिन- 343029
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