दीपावली एवं भगवान् श्रीराम का अयोध्या आगमन

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एक जिज्ञासु सज्जन ने हमारे लेख कि भगवान् श्रीराम जी महाराज लंका विजय के पश्चात् चैत्र शुक्ला पंचमी को अयोध्या लौटे थे, के प्रमाण में वाल्मीकि रामायण का प्रसंग उद्धृत करने का आग्रह किया है। मैं ऐसे जिज्ञासु सज्जन का धन्यवाद करता हूँ कि उनके मन में यथार्थ जानने की इच्छा तो हुई। अब मैं उन सज्जन एवं अन्य ऐसे ही जिज्ञासुओं के लिए इसके प्रमाण प्रस्तुत करता हूँ-
वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड के 92 वें सर्ग में वर्णन है कि मेघनाद की मृत्यु से विक्षिप्त वा क्रोधित रावण भगवती सीता जी को ही मारने अशोक वाटिका में दौड़ा हुआ आया। वह उन्हें मारना ही चाहता था, तभी रावण के मंत्री सुपार्ष्व ने रावण को समझाते हुए कहा-
‘‘अभ्युत्थानं त्वमद्यैव कृष्णपक्षचतुर्दशी। कृत्वा निर्याह्यमावास्यां विजयाय बलैर्वृतः’’ (श्लोक 66, वाल्मीकि रामायण, गीताप्रेस गोरखपुर)
अर्थात् आज कृष्णपक्ष की चतुर्दशी है। अतः आज युद्ध की तैयारी करके कल अमावस्या के दिन सेना के साथ विजय के लिए प्रस्थान करो।
यहाँ महीने का संकेत नहीं है। इसके पूर्व भी मास का कहीं संकेत नहीं है। इस कारण यहाँ वर्ष का प्रथम मास चैत्र मानना चाहिए। जैसे कोई ईसवी सन् के प्रथम दिन से एक जनवरी का ही ग्रहण करेगा, न कि अन्य किसी मास की प्रथम दिनांक का ग्रहण करेगा। 
इसके पश्चात् श्री भगवान् राम जी पुष्पक विमान से अयोध्या लौट रहे थे, उस विषय में युद्धकाण्ड के 124 वें सर्ग के प्रथम श्लोक में कहा है-
‘‘पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पंचम्यां लक्ष्मणाग्रजः। भरद्वाजाश्रमं प्राप्य ववन्दे नियतो मुनिम्।।’’ अर्थात् मन को वश में करने वाले श्री राम जी ने चौहदवां वर्ष पूर्ण होने पर पंचमी तिथि को महर्षि भरद्वाज आश्रम में पहुँचकर मुनि जी को प्रणाम किया। 
यहाँ भी मास के नाम का संकेत नहीं होने से चैत्र मास का ग्रहण करना योग्य है। यहाँ यह भी स्पष्ट है कि उसी दिन उनके वनवास का चौहदवां वर्ष पूर्ण हुआ था। 
कोई यह पूर्वाग्रह करे कि हम बिना स्पष्ट कथन के चैत्र मास की पंचमी कैसे मानें? उनके लिए इतना तो स्पष्ट है कि न तो विजयादशमी के दिन रावण का वध हुआ और न ही श्रीराम दीपावली के दिन अयोध्या आये। वे शुक्ल पक्ष पंचमी को ही आये। अब चैत्र मास की स्पष्टता के लिए हमें यह जानना होगा कि उनका वनवास प्रारम्भ कब हुआ था?
अयोध्या काण्ड के तृतीय सर्ग के श्लोक संख्या 4 में महाराजा दशरथ ने महर्षि वामदेव एवं महर्षि वसिष्ठ आदि से कहा है-
‘‘चैत्रः श्रीमानयं मासः पुण्यः पुष्पितकाननः। यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम्।।’’ अर्थात् चैत्र मास बड़ा सुन्दर और पवित्र है। इसमें सारे वन-उपवन खिल उठे हैं, अतः इस समय श्रीराम का युवराज पद पर अभिषेक करने के लिए आप लोग सब सामग्री एकत्र कराइये। 
यहाँ तिथि नहीं परन्तु मास का नाम स्पष्ट है। हम यह भी जानते हैं कि भगवान् श्रीराम जी का वनवास ठीक चौदह वर्ष का था। जब वनवास प्रारम्भ चैत्र मास में हो रहा है, तब उसका अन्त भी चैत्र मास में ही होगा। उसकी तिथि भी निश्चित हम लिख चुके हैं। सुधी पाठक इस विषय में पूर्वाग्रहों को त्यागकर एक महान् ऋषि वाल्मीकि महाराज की बात का प्रमाण करें, न कि किंवदन्ती के आधार पर कोई धारणा बनाएं। 
किमधिकम्।

- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक
(वैदिक एवं आधुनिक भौतिक विज्ञान शोध संस्थान)
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