भगवत्कृपा से विश्व में पहली बार Aitery Brahman का 2765 पृष्ठीय वैज्ञानिक व्याख्यान पूर्ण कर लिया है जो अब प्रकाशन के लिए तैयार है।

हमारे सभी सहयोगी एवं प्रशंसक सज्जनों को मैं सहर्ष सूचित कर रहा हूँ कि ऐतरेय ब्राह्मण का मेरा वैज्ञानिक व्याख्यान का कार्य परमपिता परमात्मा की कृपा तथा सभी सहयोगी जनों के सहयोग से पूर्ण हो गया है। अब यह ग्रन्थ प्रकाशनार्थ सर्वथा तैयार है। जैसे ही इस हेतु आवश्यक धन (लगभग 40 लाख रुपये) उपलब्ध हो जावेगा, प्रकाशनार्थ प्रेस को दे दिया जावेगा। मैंने इस ग्रन्थ के व्याख्यान का कार्य 8 मई 2008 को प्रारम्भ किया था, जो अन्तिम प्रूफ रीडिंग आदि के चलते कल दिनांक 24/09/2017 को पूर्ण हो गया है। ये व्याख्यान *‘‘वेदविज्ञान-आलोक’’* नामक 2765 पृष्ठ का ग्रन्थ होगा। इसके 4 भाग (Volume) होंगे। इसको पहले मैंने रफ रूप में लिखा था, पुनः फेयर रूप में लिखा। यह सम्पूर्ण कार्य कॉपीराइट हो गया है। इस ग्रन्थ में चारों वेद संहिता, इनके विविध भाष्य, कुछ संस्कृतज्ञों वा विद्वानों के कुछ ग्रन्थों के साथ *62 आर्ष ग्रन्थों* को मिलाकर कुल *94 वैदिक व संस्कृत ग्रन्थों तथा 30 वर्तमान भौतिकी के उच्च स्तरीय ग्रन्थों* को उद्धृत किया है। इस ग्रन्थ को समझने के लिये 420 पृष्ठ की पूर्वपीठिका (Preface) लिखी गयी है।

यह ग्रन्थ ऐसा ग्रन्थ है, जो वर्तमान सैद्धान्तिक भौतिक वैज्ञानिकों को आगामी 100 वर्षों तक अनुसंधान के लिये प्रचुर सामग्री देने में सक्षम होगा। वर्तमान वैज्ञानिक शोध प्रक्रिया को नई दिशा देने तथा उनका मार्ग सुगम बनाकर राष्ट्र व विश्व के वैज्ञानिकों के समय व धन की बचत करने में सहायक होगा। वर्तमान भौतिकी विशेषकर Cosmology, Astrophysics, Quantum Field theory, Particle physics, String theory, Nuclear physics एवं Plasma physics आदि क्षेत्रों में विद्यमान गम्भीर अनसुलझी समस्याओं को सुलझाने में विशेष सहयोग करेगा।

इसके साथ ही वर्तमान में वेद व आर्ष (ऋषियों के) ग्रन्थों पर किये जा रहे शोधकार्य को सर्वथा नई एवं वैज्ञानिक दिशा प्रदान करेगा। यह ग्रन्थ उन्हें वैदिककालीन देवों, ऋषियों व गन्धर्वों के समय की वैदिक वैज्ञानिक परम्परा को समझने में अप्रत्याशित रूप से सहायक होगी। ध्यान रहे, इस परम्परा का लोप महाभारत युद्ध के कुछ काल पश्चात् ही हो गया था, जिस कारण वेदादि शास्त्रों का विज्ञान सर्वथा लुप्त हो गया और हमारे राष्ट्र को पाश्चात्य विज्ञान पर पूर्णतः निर्भर होना पड़ा है। मैं यह नहीं कहता कि यह ग्रन्थ वर्तमान सम्पूर्ण शिक्षा पद्धति का विकल्प बन सकता है परन्तु इतना अवश्य विश्वास है कि यदि इस ग्रन्थ को शासन का पूर्ण संरक्षण मिले और इसी शैली से अन्य वैदिक ग्रन्थों की वैज्ञानिक व्याख्या की जाये तो यह राष्ट्र बिना विदेशी शिक्षा के एक ऐसी बहुआयामी शिक्षा का निर्माण कर सकता है, जो विश्व में सर्वश्रेष्ठ होगी। इससे भारत बौद्धिक दासता से मुक्त होकर राष्ट्रीय स्वाभिमान से सुसम्पन्न हो जायेगा, साथ ही जगद्गुरु का भी पद प्राप्त कर सकेगा। हाँ, इस कार्य को लगभग 50 वर्ष लग सकते हैं।

एक अन्य लाभ इसका यह भी होगा कि इस ग्रन्थ से ईश्वर की सत्ता के अस्तित्व एवं उसके mechanism की ऐसी वैज्ञानिकता का बोध होगा कि उच्च प्रबुद्ध नास्तिक भी आस्तिक बनने को विवश होंगे और आस्तिकों का नाना सम्प्रदायों और अपने कथित धर्मगुरुओं के अन्धविश्वासों और पाखण्डों से मुक्ति मिलकर एक वैज्ञानिक धर्म का बोध होगा। उधर विज्ञान ऐसे वैज्ञानिक धर्म से संगति करने को विवश होगा। इससे विश्व शान्ति व समग्र कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा।

- *आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक*
(वैदिक एवं आधुनिक भौतिक विज्ञान शोध संस्थान) 
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वैदिक विज्ञान अनुसंधान परिचय का द्वितीय संस्करण जिसमें कुछ अध्यायों की वृद्धि की गयी है तथा अन्य अध्यायों में कुछ संशोधन व परिवर्धन हुआ है…